विश्वास बनता है, सिर्फ हवाई बातों से नहीं आता... फ्रांस की दोस्ती देख बोले एक्सपर्ट, दोस्ती निभाना सीखे US
PM Modi France Visit: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले महीने अमेरिका का राजकीय दौरा किया था और उस दौरान भारत और अमेरिका के बीच कई समझौते किए गये थे, लेकिन अमेरिका के ऊपर अभी भी भारत का विश्वास कायम नहीं हो पाया था। जबकि, अमेरिका ने क्रिटिकल टेक्नोलॉजी को लेकर भी भारत से समझौता किया है।
लेकिन, बात जब विश्वास की आती है, तो जियो-पॉलिटिक्स की कम जानकारी रखने वाले लोग भी एक शब्द में कह सकते हैं, कि अमेरिका पर आंख मूंदकर विश्वास नहीं किया जा सकता है। आखिर ऐसा क्यों? आज हम फ्रांस की दोस्ती से इसे जांचने और परखने की कोशिश करेंगे, कि कैसे रूस के बाद फ्रांस ही भारत का एक मात्र ऐसा विश्वासपात्र दोस्त रहा है, जिसपर भारत आंख मूंदकर विश्वास कर सकता है। एक्सपर्ट भी इसी बात की तरफ इशारा कर रहे हैं।

विश्नसनीय दोस्त रहा है अमेरिका
अमेरिका ने पिछले चंद सालों से हथियारों के लेकर भारत से समझौता करना शुरू किया है, जब चीन उसके लिए खतरा बन गया है। लेकिन, रूस और फ्रांस दो ऐसे देश रहे हैं, जिन्होंने हमेशा से भारत को डिफेंस सेक्टर में मदद दी है।
इसमें कोई शक नहीं, कि अगर आज चीन शक्तिशाली नहीं होता, तो अमेरिकी किसी भी हाल में भारत के साथ रक्षा समझौते नहीं करता। इसका उदाहरण कारगिल युद्ध से लगाया जा सकता है, जब अमेरिका ने भारत को जानकारियां देने से मना कर दिया था।
लेकिन, फ्रांस की बात अलग है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आज से फ्रांस का दौरा शुरू हो रहा है और भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी पश्चिम में नई दिल्ली के सबसे पुराने रणनीतिक साझेदार के साथ संबंधों को और गहरा करने के लिए पेरिस जा रहे हैं, जिसमें कई हाई-प्रोफाइल रक्षा सौदे होने की उम्मीद है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इंडो-पैसिफिक में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए हाई-प्रोफाइल रक्षा सौदा करना दोनों देशों की एक नई संयुक्त योजना है।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने पीएम मोदी को बैस्टिल दिवस समारोह में सम्मानित अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। परेड में भारत की सेना, नौसेना और वायु सेना की इकाइयां भी भाग लेंगी। इस परेड में दो भारतीय राफेल विमान भी भाग ले रही हैं, जिसे भारत ने फ्रांस से करीब 9 अरब डॉलर में खरीदा था। भारत ने फ्रांस से 36 राफेल विमान खरीदे थे।
भारत सरकार ने बुधवार को एक बयान में कहा है, कि "पीएम मोदी की यह यात्रा रणनीतिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, शैक्षणिक और आर्थिक सहयोग जैसे विभिन्न क्षेत्रों में भविष्य के लिए साझेदारी की रूपरेखा तैयार करने का अवसर प्रदान करेगी।"
इस वर्ष दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी की 25वीं वर्षगांठ है, और अगले 25 सालों के लिए दोनों देश नया विजन तय करने वाले हैं, जिसके तहत भारत और फ्रांस के बीच कई रक्षा सौदे होने वाले हैं।
फ्रांस क्यों रहा है विश्वसनीय दोस्त
फ्रांस दशकों से यूरोप में भारत के सबसे करीबी साझेदारों में से एक रहा है। 1998 में भारत ने जब परमाणु परीक्षण किया था, तो फ्रांस एकमात्र यूरोपीय देश था, जिसने भारत पर प्रतिबंध नहीं लगाया था।
दस साल बाद, जब भारत को अपनी असैन्य परमाणु योजनाओं के लिए परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह से छूट मिली, तो फ्रांस इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला पहला देश था।
भारत पिछले चार दशकों से फ्रांसीसी लड़ाकू विमानों पर निर्भर है। 2015 में डसॉल्ट एविएशन (AM.PA) राफेल खरीदने से बहुत पहले, भारत ने 1980 के दशक में फ्रांस से ही मिराज जेट खरीदे थे, जिसमें अभी भी वायु सेना के दो स्क्वाड्रन शामिल हैं। ये वो दौर था, जब अमेरिकी हथियार के बारे में सोचना भी भारत के लिए सपने की बात थी। अमेरिका उस दौर में चीन और पाकिस्तान के करीब था।
साल 2005 में, भारत ने फ्रांस से 188 अरब रुपये (2.28 अरब डॉलर) में छह स्कॉर्पीन श्रेणी की डीजल पनडुब्बियां खरीदीं थीं, जिनका निर्माण फ्रांसीसी नौसेना समूह के साथ साझेदारी में मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स (एमडीएल) (एमएजेडजी.एनएस) में किया गया है और इस पनडुब्बी ग्रुप की आखिरी पनडुब्बी को अगले साल चालू कर दिया जाएगा।
अब जब रूस यूक्रेन युद्ध में फंसा है और कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का सामना कर रहा है, तो रूस के लिए भारत की रक्षा जरूरतों को पूरा करना काफी मुश्किल है। वहीं, भारत अब ऐसे रक्षा सौदों को अंजाम दे रहा है, जिसमें मेक इन इंडिया शामिल हो। लेकिन, इस प्रोसेस में वक्त लगना है और डिफेंस सेक्टर में मेक इन इंडिया का परिणाम दिखने में करीब 15 से 20 सालों का वक्त लगेगा।
उस वक्त तक के लिए भारत फ्रांस से तीन स्कॉर्पीन पनडुब्बियां खरीद सकता है और माना जा रहा है, कि पीएम मोदी के फ्रांस दौरे के दौरान इसकी घोषणा हो सकती है। इन तीनों पनडुब्बियों को भारत में ही एमडीएल और नौसेना ग्रुप द्वारा बनाया जाएगा। हालांकि, नई दिल्ली और पेरिस में सरकारी सूत्रों ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया है, कि सौदों की कीमत पर अभी सहमति नहीं बनी है।
हालांकि, इंडियन नेवी के लिए 26 राफेल-एम फाइटर जेट खरीदने को लेकर दोनों देशों के बीच सहमति बन चुकी है।
नौसेना के लिए खरीदे गये इन राफेल विमानों को आईएनएस-विक्रांत पर तैनात किया जाएगा, जिसे पिछले साल अगस्त में इंडियन नेवी को सौंपा गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, राफेल विमान ने आईएनएस विक्रांत पर अमेरिकी फाइटर जेट सुपरहॉर्नेटएफ18 से बेहतर प्रदर्शन किया था।
भारत और फ्रांस दोनों ही देश, अपने द्वीपीय क्षेत्रों के माध्यम से हिंद महासागर में गहरे हित रखते हैं और इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता से चिंतित हैं। हालांकि, इस क्षेत्र के लिए दोनों देशों की क्या योजना है, फिलहाल इसकी कोई जानकारी नहीं है।
विदेश मामलों के जानकार और इंडो-पैसिफिक एक्सपर्ट डेरेक ग्रॉसमैन का भी यही मानना है। उन्होंने एक ट्वीट करते हुए कहा, कि "विश्वास शब्दों से नहीं, बल्कि आपके कर्मों से आता है। अमेरिका को इस बात पर ध्यान देना चाहिए।"
उन्होंने कहा, कि "फ्रांस दशकों से यूरोप में भारत के सबसे करीबी साझेदारों में से एक रहा है। 1998 में भारत द्वारा परमाणु परीक्षण किए जाने के बाद पेरिस एकमात्र पश्चिमी राजधानी थी, जिसने नई दिल्ली पर प्रतिबंध नहीं लगाया था..."।
आपको बता दें, कि परमाणु परीक्षण के बाद भारत पर सबसे पहले प्रतिबंध लगाने वाला देश अमेरिका ही था और अमेरिका के बाद तमाम यूरोपीय देशों ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिए थे। हालांकि, भारत पर इसका काफी कम प्रभाव पड़ा था, लिहाजा बाद में प्रतिबंधों को हटा लिया गया। वहीं, अब जब यूरोप के साथ साथ अमेरिका के लिए चीन सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है, तो ये देश भारत के साथ संबंधों का विस्तार कर रहे हैं। लेकिन, अगर इन्हें वाकई भारतीय जनता के मन में विश्वास बनाना है, तो इन्हें फ्रांस जैसी दोस्ती करनी होगी।












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