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ट्रंप ने पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम को आधा घंटा क्यों करवाया इंतजार? आर्मी चीफ मुनीर भी थे साथ, क्या हुई बात

पाकिस्तानी वजीर-ए-आजम शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर ने ट्रंप से मुलाकात की। इस हाई-प्रोफाइल मीटिंग के लिए न्यूयॉर्क में दोनों को लंबा इंतजार करना पड़ा। इस्लामाबाद की कूटनीतिक बेबसी की यह कहानी पूरी दुनिया ने देखी। पाकिस्तान के दो सबसे ताकतवर लोगों ने आखिरकार क्या 'कीमत' चुकाई?

सूत्रों की मानें तो दोनों हाई-प्रोफाइल नेताओं को ट्रंप से मिलने के लिए बंद कमरे के बाहर करीब आधा घंटा इंतज़ार करना पड़ा। एक तरफ पाकिस्तान जहां आर्थिक कंगाली से जूझ रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसकी कूटनीतिक 'हैसियत' भी तार-तार होती दिखी।

Shehbaz Sharif and Asim Munir with Donald Trump

जिस देश का प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख दुनिया के सबसे ताकतवर लीडर से मिलने के लिए दरवाजे पर खड़ा रहे, उस देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है। यह घटना दर्शाती है कि अमेरिका की नज़र में पाकिस्तान की मौजूदा अहमियत कितनी कम हो चुकी है।

ट्रंप ने क्यों करवाया पाक PM शहबाज को इंतजार?
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ आसिम मुनीर के साथ डोनाल्ड ट्रंप की बैठक अपने तय समय से लगभग आधा घंटा देर से शुरू हुई। इस देरी का कारण यह था कि ट्रंप उस समय व्हाइट हाउस में एक अलग महत्वपूर्ण काम में व्यस्त थे।

दरअसल, ट्रंप चीन की कंपनी टिकटॉक से जुड़ी डील पर एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर पर हस्ताक्षर करने के बाद पत्रकारों से बात कर रहे थे। बैठक को वाशिंगटन समयानुसार शाम 4:30 बजे शुरू होना था, लेकिन ट्रंप के प्रेस इंटरैक्शन के कारण इसमें देरी हुई। इस देरी पर हल्के-फुल्के अंदाज़ में टिप्पणी करते हुए ट्रंप ने कहा, 'वे आ रहे हैं, और शायद अभी इस कमरे में ही हों। मुझे नहीं पता, क्योंकि हम थोड़े लेट हैं।' यह पूरी घटना सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में रही।

क्या हुई बात?

व्हाइट हाउस में ओवल ऑफिस के बाहर यह 'अपमानजनक' इंतज़ार सहने के बाद शहबाज़ शरीफ़ ने ट्रंप से बंद कमरे में मुलाकात की। इस मुलाकात का मुख्य एजेंडा साफ था:

ट्रंप का साथ और आर्थिक मदद

शहबाज शरीफ़ का मुख्य उद्देश्य ट्रंप का विश्वास जीतना था, ताकि पाकिस्तान को आर्थिक पैकेज और ऋण राहत मिल सके। पाकिस्तान यह संदेश देने की कोशिश कर रहा था कि वह क्षेत्रीय सुरक्षा में अमेरिका का महत्वपूर्ण सहयोगी बना रहेगा।

क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद पर बात

चूंकि आर्मी चीफ आसिम मुनीर खुद साथ थे, इसलिए क्षेत्रीय सुरक्षा, अफगानिस्तान की अस्थिरता और सीमा पार से होने वाले आतंकवाद पर विस्तृत चर्चा हुई होगी। ट्रंप अतीत में पाकिस्तान को 'आतंकवादियों का सुरक्षित ठिकाना' कह चुके हैं, इसलिए मुनीर ने अमेरिका को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की होगी कि पाकिस्तान अब 'भरोसेमंद पार्टनर' है।

भारत-विरोधी कूटनीति का दांव

पाकिस्तान ने ट्रंप के साथ अपने संबंध तब और गहरे किए जब मुनीर ने उन्हें भारत-पाक सीजफायर में भूमिका के लिए नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नॉमिनेट कर दिया। इस बैठक में शहबाज़ शरीफ़ ने ट्रंप-मोदी के तनावपूर्ण संबंधों का फ़ायदा उठाने की पूरी कोशिश की होगी, ताकि अमेरिका से भारत के ख़िलाफ़ रियायतें हासिल की जा सकें।

ट्रंप-शरीफ़ की 'नई दोस्ती' का रहस्य

दिलचस्प बात यह है कि कभी पाकिस्तान को धोखा देने वाला कहने वाले ट्रंप अब शहबाज़ और मुनीर दोनों को 'ग्रेट लीडर्स' कह रहे हैं। इसकी मुख्य वजह है:

व्यापारिक फायदा: अमेरिका और पाकिस्तान ने एक व्यापार समझौता किया है जिसके तहत अमेरिका पाकिस्तान के तेल भंडार के विकास में मदद करेगा।

भू-राजनीतिक बदलाव: रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत का रूस से तेल खरीदना और मोदी का ट्रंप को सीजफायर का क्रेडिट न देना, अमेरिकी प्रशासन को पाकिस्तान की ओर धकेल रहा है।

कुल मिलाकर, पाकिस्तान के वज़ीर-ए-आज़म और आर्मी चीफ का ट्रंप के दरवाज़े पर 30 मिनट इंतज़ार करना सिर्फ एक कूटनीतिक चूक नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान की अंतर्राष्ट्रीय मजबूरी और गिरती साख का एक कड़वा सच है। इस इंतज़ार ने दिखा दिया कि व्हाइट हाउस में सत्ता का समीकरण बदल चुका है और पाकिस्तान को अपनी 'रिलीफ' के लिए अब भी अमेरिका के आगे झुकना पड़ रहा है।

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