नेपाली सेना ने ब्लैकलिस्ट चीनी कंपनी से की 26 बख्तरबंद वाहन खरीदने की डील, पीएम प्रचंड बोले- कैंसिल करो
नेपाल की सेना चीन से महंगे दाम पर हथियारबंद गाड़ियां खरीद रही है। भारतीय कंपनी इसे कम दाम में दे रही है लेकिन नेपाल की सेना लगभग दोगुने दामों पर चीन की विवादित कंपनी से डील करना चाहती है।

नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड 31 मई से तीन जून तक भारत की यात्रा पर रहेंगे। इस यात्रा से कुछ दिन पहले ही रिपोर्ट आई है कि नेपाल सेना, चीन के नॉर्थ इंडस्ट्रीज ग्रुप कॉर्पोरेशन लिमिटेड से 6 अरब रुपये के 26 बख्तरबंद वाहन खरीदने की योजना बना रही है।
द काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक नेपाली सेना इसी चीनी कंपनी से 10 हजार सीक्यू राइफल भी खरीदने जा रही है। हैरानी की बात ये है कि नेपाली सेना जिन चीनी गाड़ियों को खरीद रही है, वे भारतीय कंपनी की तुलना में कहीं ज्यादा महंगे हैं।
इन बख्तरबंद वाहनों का उपयोग विभिन्न शांति अभियानों में तैनात नेपाली शांति सैनिकों द्वारा किया जाना है। इस रिपोर्ट के आने के बाद से हंगामा इसलिए भी मचा हुआ है क्योंकि नोरिन्को नामक इस चीनी कंपनी को अमेरिका सरकार ने ब्लैकलिस्ट कर रखा है।
इससे पहले नेपाली सेना को नेपाल सेना कल्याण कोष के माध्यम से चीन से 26 एपीसी मिलने वाला था। इस पर निर्णय तब लिया गया था जब शेर बहादुर देउबा प्रधानमंत्री थे और रक्षा मंत्रालय की देखरेख भी कर रहे थे।
इस डील के तहत नेपाल की सेना या फिर नेपाल सरकार को पहले पैसा देना था। चीनी वाहनों की डिलीवरी के बाद संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन कार्यालय इस पैसे को उसे लौटा देता।
लेकिन इसमें एक झोल ये है कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने चीनी कंपनी नोरिन्को को प्रतिबंधित कर रखा है। अब नेपाल सरकार और वहां का स्थानीय हिमालया बैंक इस दुविधा में फंस गया है कि अगर इन वाहनों को चीन से खरीदा गया तो उसे पैसे फंस सकते हैं।
वहीं, एक पूर्व रक्षा सचिव ने कहा कि "अगर हम ब्लैक लिस्टेड चीनी कंपनी से एपीसी और अन्य सैन्य आपूर्ति खरीदते हैं, तो अमेरिका, नेपाली शांति सैनिकों के लिए समस्या पैदा कर सकता है।"
पूर्व रक्षा सचिव ने कहा कि नोरिन्को वैश्विक प्रतिबंधों के तहत म्यांमार की सरकार को हथियार और गोला-बारूद मुहैया कराने में भी शामिल है।
उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में अमेरिकियों की बहुत बड़ी हिस्सेदारी है। इसलिए यदि हम किसी ब्लैक लिस्टेड कंपनी से APCs खरीदते हैं, तो वे बाधाएं पैदा कर सकते हैं।
हालांकि इस विवाद के बीच नेपाली सेना ने चीनी कंपनी से बख्तरबंद वाहनों की खरीद को ही सिरे से खारिज कर दिया है। नेपाली सेना के प्रमुख जनरल प्रभु राम शर्मा ने शुक्रवार को कहा कि सेना को इस समय किसी हथियार की जरूरत नहीं है लेकिन उसे कुछ वाहनों की जरूरत पड़ सकती है।
उन्होंने कहा, 'हमने 1989-1990 के बाद से चीन से कोई हथियार नहीं खरीदा है। यदि नेपाल सेना को हथियार खरीदने की आवश्यकता है, तो यह सरकार की पूर्व स्वीकृति लेगी।'
रिपोर्ट में कहा गया है कि देउबा की मंजूरी के बाद नेपाली सेना ने चीन और भारत की कंपनियों से बातचीत करना शुरू किया। इसके बाद चीन से 26 और भारत से 4 गाड़ियों के खरीदने पर सहमति बनी।
हालांकि दोनों देशों के वाहनों की कीमत में भारी अंतर है। भारत के एक हथियारबंद वाहन की कीमत जहां 4 करोड़ रुपये है, चीनी वाहन जो कि खूबियों में भारतीय वाहन जैसा है उसकी कीमत 7.7 करोड़ है।
मामले की जानकारी रखने वाले सेना और रक्षा मंत्रालय के दो अधिकारियों ने द काठमांडू पोस्ट से कहा कि इस डील को सहमति देने या न देने लिए नेपाल सरकार में काफी माथापच्ची हुई थी।
सेना ने 17 अप्रैल को हिमालयन बैंक में सभी दस्तावेज पेश किए, जिसमें व्यक्तिगत चालान और अनुबंध शामिल थे। हालांकि प्रचंड की भारत यात्रा से ठीक पहले चीन से इन वाहनों के नहीं खरीदने के लिए राजनीतिक दबाव पड़ने और अमेरिका के ब्लैक लिस्ट करने के खुलासे के बाद अब बैंक ने इस डील पर रोक लगा दी गई है।
वहीं नेपाली सेना इन महंगी चीनी गाड़ियों को खरीदने के लिए आतुर दिखाई पड़ रही है। अब प्रचंड ने रक्षा मंत्री को तलब किया है और साफ कह दिया है कि भारत दौरे से ठीक पहले इस डील को नहीं करें। प्रचंड ने कहा कि देश की आर्थिक हालत ठीक नहीं, ऐसा में इतने महंगे हथियार खरीदने का ये मुफीद वक्त नहीं है।












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