ऐतिहासिक: ऐस्टरॉइड पर हमले के लिए रवाना हुआ NASA का स्पेसक्राफ्ट, जानिए कैसे बचाई जाएगी धरती?
नासा ने कहा है कि धरती से करीब 68 लाख मील की दूरी पर ये टक्कर होगी। उस दौरान ये ऐस्टरॉइड धरती के करीब होगा, लिहाजा वो वक्त टक्कर के लिए काफी बेहतरीन होगा।
वॉशिंगटन, नवंबर 23: हमारी धरती से एस्टेरॉयड के टकराने का डर हमेशा बना रहता है और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा हर वक्त ऐसे एस्टेरॉयड पर नजर रखे हुए रहती है, जो धरती के करीब होते हैं। लेकिन, क्या होगा अगर किसी एस्टेरॉयड के धरती से टकराने की नौबत आ जाए, ऐसी स्थिति में धरती को तबाही से बचाने के लिए अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने ऐतिहासिक मिशन लॉंच कर दिया है, जिसमें अंतरिक्ष में ही एस्टेरॉयड को मार गिराया जाएगा। नासा के इस मिशन पर पूरी दुनिया की निगाह बनी हुई है। ऐसे में आईये जानते हैं, नासा के इस ऐतिहासिक मिशन से जुड़ी हर जानकारी।

स्पेसएक्स के साथ मिशन
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने एलन मस्क की स्पेस कंपनी स्पेसएक्स के साथ मिलकर 'डार्ट मिशन' को लॉंच किया है। जिसके जरिए धरती से लाखों किलोमीटर दूर अंतरिक्ष में चक्कर काट रहे एस्टेरॉयड से नासा का स्पेसक्राफ्ट टकराएगा। नासा अपने इस मिशन से यह जांचने की तैयारी करेगा, कि क्या टक्कर के बाद एस्टेरॉयड की दिशा में कोई परिवर्तन आता या फिर नहीं? नासा का ये मिशन अगर कामयाब होता है, तो इससे भविष्य में पृथ्वी को बचाने में काफी ज्यादा मदद मिलेगी। यानि, अगर कोई एस्टेरॉयड पृथ्वी की कक्षा में आता या फिर उसके पृथ्वी से टकराने की कोई भी संभावना बनती है, तो उस संभावना के बनने से पहले ही नासा उस एस्टेरॉयड को स्पेसक्राफ्ट से टकराकर उसकी दिशा बदल सकता है।

एस्टेरॉयड से होगी टक्कर
नासा का ये मिशन अभी तक के हिसाब से पूरी तरह समय के मुताबिक है। हालांकि, अगर किसी वजह से इस मिशन की लॉन्चिंग टल जाती, तो फिर फरवरी 2022 तक का विंडो नासा के पास होता। लेकिन, नासा का ये मिशन अभी तक कामयाब है। नासा द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक, नासा का ये स्पेसक्राफ्ट 24 हजार 140 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से एस्टेरॉयड से टकराएगा और फिर नासा यह देखेगा, कि क्या टक्कर के बाद एस्टेरॉयड की दिशा में कोई परिवर्तन होता है या नहीं। इसके साथ ही नासा अपने मिशन के जरिए यह एस्टेरॉयड के वातावरण, मेटल्स, मिट्टी के कण और एस्टेरॉयड की प्रकृति को लेकर भी रिसर्च करेगा।

अगले साल अक्टूबर में होगी टक्कर
नासा के डार्ट मिशन में एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स का फैल्कन-9 रॉकेट भी शामिल है और इसने 23 नवंबर को रात 10 बजकर 20 मिनट पर कैलिफोर्निया के वेंडनबर्ग स्पेसबेस से अंतरिक्ष के लिए उड़ान भरा है। नासा ने कहा है कि, अगले साल यानि अक्टूबर 2022 में उसका स्पेसक्राफ्ट ऐस्टरॉइड से टकराएगा। नासा की घोषणा के मुताबिक, उस ऐस्टरॉइड की रफ्तार 13 हजार 500 किलोमीटर प्रतिघंटे की होगी और नासा का स्पेसक्राफ्ट उस ऐस्टरॉइड से आमने-सामने की टक्कर होगी।
नासा के मिशन से क्या होगा हासिल?
नासा ने कहा है कि विशालकाय ऐस्टरॉइड से जब स्पेसक्राफ्ट की टक्कर होगी, तो ऐस्टरॉइड की दिशा में मामूली परिवर्तन होगा, जो काफी होगा। इस मिशन से नासा को पता चल पाएगा कि ऐस्टरॉइड से स्पेसक्राफ्ट की टक्कर होने से क्या नतीजे निकल सकते हैं। नासा का कहना है कि वो हर उस चीज के बारे में पता लगा रहा है, जिससे पृथ्वी को आने वाले वक्त में खतरा उत्पन्न हो सकता है और खासतौर पर काफी तेज रफ्तार ऐस्टरॉइड को लेकर नासा हमेशा सतर्क रहता है। सितंबर 2022 में ऐस्टरॉइड और उसका उपग्रह पृथ्वी के काफी करीब आ जाएगा और उस वक्त मिशन को अंजाम दिया जाएगा।

मिशन के बारे में जानिए
नासा की जांच में पता चला है कि अंतरिक्ष में करीब 780 मीटर के आकार के एक बहुत बड़े चट्टान की परिक्रमा 160 मीटर का ऐस्टरॉइड कर रहा है, जिसे नासा ने डिडिमून नाम दिया है। डिडिमून 2003 में पृथ्वी के काफी करीब आ गया था और उस वक्त ये पृथ्वी से करीब 37 लाख मील की दूरी पर था। नासा ने पता लगाया है कि इन दोनों ऐस्टरॉइड में से एक डिडिमून के पृथ्वी से टकराने की संभावना काफी ज्यादा है। नासा ने एक बयान में कहा, "डार्ट कायनेटिक इम्पेक्टर के जरिए पहली बार प्रदर्शन करेगा, जिसमें एक हाईस्पीड ऐस्टरॉइड की टक्कर अंतरिक्ष यान से होगी और उस टक्कर के जरिए ऐस्टरॉइड की गति के साथ साथ उसके डायरेक्शन को भी बदला जाएगा''।

टक्कर को किया जाएगा रिकॉर्ड
नासा ने कहा है कि धरती से करीब 68 लाख मील की दूरी पर ये टक्कर होगी और उसके बाद ये ऐस्टरॉइड धरती के करीब आने लगेगा, लिहाजा वो वक्त टक्कर के लिए काफी बेहतरीन होगा। नासा ने कहा है कि स्पेसक्राफ्ट और ऐस्टरॉइड के बीच होने वाली इस टक्कर को क्यूब सैटेलाइट से रिकॉर्ड किया जाएगा। क्यूब सैटेलाइट इटली की स्पेस एजेंसी की है। डार्ट प्रोग्राम के प्रमुख वैज्ञानिक टॉम स्टेटलर ने कहा कि, वैज्ञानिक धरी से टेलीस्कोप के जरिए ऐस्टरॉइड की रफ्तार में होने वाले परिवर्तन को देखेंगे। उन्होंने कहा कि, इस टक्कर से हमें समझने में मदद मिलेगी कि ऐस्टरॉइड से टक्कर के बाद क्या होता है और उसकी गति, उसके डायरेक्शन पर क्या प्रभाव पड़ता है।

पृथ्वी से टकरा सकते हैं 22 ऐस्टरॉइड
नासा ने अपनी रिपोर्ट में कई ऐस्टरॉइड को बेहद खतरनाक श्रेणी में रखा है और हाल के दिनों में पृथ्वी की कक्षा में दाखिल होने वाला ये पांचवां ऐस्टरॉइड है। आपको बता दें कि ऐस्टरॉइड को क्षुद्रग्रह भी कहा जाता है। नासा ने कहा है कि वो करीब 2 हजार से ज्यादा ऐस्टरॉइड पर नजर रख रहा है, जो आने वाले वक्त में पृथ्वी के लिए खतरा बन सकते हैं। नासा ने कहा है कि आने वाले 100 सालों में 22 ऐसे ऐस्टरॉइड हैं, जो पृथ्वी की कक्षा में शामिल होने के बाद पृथ्वी से टकरा सकते हैं। नासा का कहना है कि ऐसे ऐस्टरॉइड जो पृथ्वी से 46.5 मिलियन मील करीब आ जाता है, उसे वो डेंजरस कैटोगिरी में रखता है। नासा का सेंट्री सिस्टम इस तरह के ऐस्टरॉइड पर नजर रखता है।

क्या होते हैं ऐस्टरॉइड ?
आपको बता दें कि ऐस्टरॉइड वो बड़ी बड़ी अंतरिक्ष चट्टाने होती हैं जो किसी ग्रह की तरह हीं सूर्य का परिक्रमा करती हैं लेकिन इनका आकार काफी छोटा है। लेकिन अगर ये ऐस्टरॉइड किसी ग्रह से टकरा जाएं तो वहां भूचाल आ जाता है। वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि हमारे गैलेक्सी में ज्यादातर ऐस्टरॉइड मंगल और बृहस्पति की कक्षा में पाए जाते हैं, वहीं कई ऐस्टरॉइड दूसरे ग्रहों की कक्षा में भी पाए जाते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि करीब साढ़े 4 अरब साल पहले जब हमारे गैलेक्सी का निर्माण हुआ थातब गैस और धूल की वजह से ऐसे बादल, जो किसी कारणवस कोई ग्रह नहीं बन सके, वो कालांतर में क्षुद्रगह बन गये। ऐस्टरॉइड साधारणतया गोल नहीं होते हैं और इसका आकार किसी भी तरह का हो सकता है।

तुंगुस्का नदी की घटना
आपको बता दें कि 30 जून 1908 में रूस के साइबेरिया में तुंगुस्का नदी के पास एक बहुत बड़ा विस्फोट था। नासा के मुताबिक, आधुनिक इतिहास में पृथ्वी के वायुमंडल में एक बड़े उल्कापिंड का पहला प्रवेश तुंगुस्का घटना के रूप में ही हुआ था। कहते हैं कि कई मील उपर हवा में जोरदार विस्फोट हुआ था और उस विस्फोट की ताकत इतनी थी कि 2,150 वर्ग किमी के क्षेत्र में तकरीबन 8 करोड़ पेड़ खत्म हो गए थे। नासा का कहना है कि उस दिन एक उल्कापिंड साइबेरिया के एक दूरदराज के हिस्से से टकराया था, लेकिन जमीन पर नहीं पहुंचा था। बताया जाता है कि उल्का पिंड में हवा में ही विस्फोट हो गया और सैकड़ों मील चौड़े क्षेत्र में पेड़ों पर कहर बन कर टूटा। इस विस्फोट में हजारों जंगली जानवर भी मारे गए थे। वैज्ञानिकों का कहना था कि अगर वो ऐस्टरॉइड आबादी वाले इलाके में गिरता, तो हजारों लोगों की जान जा सकती थी।












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