आर्मेनिया पहुंची नैन्सी पेलोसी, जानिए कैसे रूस और चीन को अपने इशारे पर नचा रहा अमेरिका

अमेरिका की उम्रदराज सांसद और यूएस हाउस की स्पीकर नैन्सी पेलोसी ताइवान दौरे के बाद अब आर्मीनिया पहुंची हैं। वह 1991 में सोवियत संघ से स्वतंत्र हुए देश आर्मीनिया की यात्रा करने वाली अमेरिका की सबसे बड़ी नेता हैं।

येरेवन, 18 सितंबरः अमेरिका की सबसे उम्रदराज सांसद और यूएस हाउस की स्पीकर नैन्सी पेलोसी ताइवान दौरे के बाद अब आर्मीनिया पहुंची हैं। वह 1991 में सोवियत संघ से स्वतंत्र हुए देश आर्मीनिया की यात्रा करने वाली अमेरिका की सबसे बड़ी नेता हैं। नैन्सी पेलोसी ने हाल में ही ताइवान का दौरा किया था, जिस पर चीन भयंकर रूप से नाराज हो गया था। हालात यहां तक आ गए थे कि युद्ध का खतरा मंडराने लगा था। अब आर्मेनिया के दौरे से अमेरिका ने रूस को चुनौती दी है।

रूस का करीबी है आर्मेनिया

रूस का करीबी है आर्मेनिया

आर्मेनिया को परंपरागत रूप से रूस का करीबी माना जाता है। नैन्सी पेलोसी ने आर्मेनिया पहुंच कर अजरबैजान द्वारा अवैध सीमा पर किए गए हमलों की कड़ी निंदा की। इससे पहले पेलोसी ने शुक्रवार को बर्लिन में कहा कि उनकी यात्रा मानवाधिकारों और प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा और मूल्य का सम्मान करने के बारे में है। पेलोसी के साथ आने वाले अन्य अमेरिकी विधायकों में हाउस एनर्जी एंड कॉमर्स कमेटी के अध्यक्ष फ्रैंक पालोन और कांग्रेस की महिला जैकी स्पीयर और अन्ना एशू शामिल हैं।

आर्मेनिया-अजरबैजान के बीच है दशकों से है विवाद

आर्मेनिया-अजरबैजान के बीच है दशकों से है विवाद

वहीं, आर्मेनिया के स्पीकर एलेन सिमोनियन ने कहा कि पेलोसी की तीन दिवसीय यात्रा हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करने में एक बड़ी भूमिका निभाएगी। बता दें कि आर्मीनिया और अजरबैजान के बीच तीन दशक से विवाद चल रहा है। इसमें अब तक 30 हजार लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। इन दोनों देशों ने अब तक दो युद्ध लड़े हैं। दोनों युद्ध आर्मीनियाई-आबादी वाले क्षेत्र नागोर्नो-कराबाख पर कब्जे को लेकर लड़े गए। पहला युद्ध सोवियत संघ के विघटन के तुरंत बाद लड़ा गया था। वहीं दूसरा युद्ध 2020 में लड़ा गया था।

तुर्की की मदद से अजरबैजान ने आर्मेनिया को हराया

तुर्की की मदद से अजरबैजान ने आर्मेनिया को हराया

भौगोलिक रूप से नागोर्नो-कराबाख इलाका अजरबैजान में पड़ता है लेकिन यहां अधिकांश आबादी आर्मेनियाई मूल की है। ऐसे में सोवियत संघ के गठन के बाद से ही यहां आर्मेनिया का शासन चलता था। इसी बीच साल 2020 में अजरबैजान ने तुर्की के साथ मिलकर युद्ध छेड़ दिया और इस इलाके पर अधिकार कर लिया। इस युद्ध में दोनों पक्षों के 6,500 से अधिक सैनिकों की मौत हुई थी। रूस इस युद्ध में तटस्थ रहा। हालांकि रूस के हस्तक्षेप के बाद दोनों ही देश शांति समझौते पर सहमत हुए थे। इस समझौते के तहत, आर्मेनिया ने दशकों से नियंत्रित नागोर्नो-कराबाख का बड़ा इलाका अजरबैजान को सौंप दिया।

एक बार फिर शुरू हुआ दोनों देशों के बीच विवाद

एक बार फिर शुरू हुआ दोनों देशों के बीच विवाद

शांति समझौता कराने के बाद रूस ने इस नाजुक संघर्ष की देखरेख के लिए लगभग 2,000 रूसी शांति सैनिकों को तैनात किया था। लेकिन लगभग 2 सालों से नियंत्रित नागोर्नो-कराबाख के बड़े इलाके पर अजरबैजान का नियंत्रण आर्मेनिया को खल रहा था। अब एक बार फिर से दोनों देशों के बीच विवाद शुरू हो गया है। अजरबैजान ने आर्मेनिया पर युद्ध विराम समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाया है।

रूस का करीबी रहा है आर्मेनिया

रूस का करीबी रहा है आर्मेनिया

रूस, आर्मेनिया के साथ घनिष्ट संबंध रखता है लेकिन अचानक अमेरिका के इस देश में दिलचस्पी लेने से रूस की चिंताएं बढ़ सकती हैं। अजरबैजान पहले से ही तुर्की और इजरायल का बड़ा सहयोगी है। अगर उसके शत्रु देश आर्मेनिया पर अमेरिका का नियंत्रण हासिल हो जाता है तो रूस खेल से बाहर हो जाने का डर है। इजरायल और अमेरिका के घनिष्ट संबंध जगजाहिर हैं। ऐसे में वह जब चाहे तब अजरबैजान पर दबाव बनाकर आर्मीनिया पर हमले को रोक सकता है।

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