Marco Rubio: मार्को रुबियो बन सकते हैं अमेरिका के अगले विदेश मंत्री, जानिए भारत-चीन को लेकर क्या है सोच?
Marco Rubio: समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से बताया है, कि अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फ्लोरिडा के सीनेटर मार्को रुबियो को अपना विदेश मंत्री बनाने की संभावना जता रहे हैं। अगर रुबियो को चुना जाता है तो वह जनवरी में रिपब्लिकन राष्ट्रपति के पदभार ग्रहण करने के बाद अमेरिका के शीर्ष राजनयिक के रूप में काम करने वाले पहले लैटिनो होंगे।
फ्लोरिडा में जन्मे राजनेता यकीनन विदेश मंत्री पद के लिए ट्रंप की शॉर्टलिस्ट में सबसे आक्रामक विकल्प थे। पिछले कुछ वर्षों में, उन्होंने चीन, ईरान और क्यूबा सहित अमेरिका के भू-राजनीतिक दुश्मनों के संबंध में एक सशक्त विदेश नीति की वकालत की है।

53 वर्षीय रुबियो को भारत का मित्र माना जाता है और वह भारत-अमेरिका के बीच मजबूत संबंधों के समर्थक रहे हैं।
मार्को रुबियो कौन है?
- मियामी में जन्मे रुबियो क्यूबा के दो मेहनती अप्रवासियों के बेटे हैं। उन्होंने 1993 में फ्लोरिडा विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान की डिग्री हासिल की।
- अमेरिकी सीनेट के लिए चुने जाने से पहले, रुबियो ने वेस्ट मियामी में एक सिटी कमिश्नर और फ्लोरिडा हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के स्पीकर के रूप में काम किया।
- 2000 में, वह 111वें जिले का प्रतिनिधित्व करते हुए फ्लोरिडा से हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के लिए चुने गए। वह ट्रंप के 2024 के रनिंग मेट बनने के दावेदार थे।
- रुबियो लंबे समय से सीनेट में विदेशी मामलों में शामिल रहे हैं, खासकर जब यह लैटिन अमेरिका से संबंधित हो, और पार्टी में उनके मजबूत संबंध हैं।
टाइम्स ने इस मामले से परिचित तीन लोगों के हवाले से रिपोर्ट दी है, कि रुबियो को आने वाले विदेश मंत्री के रूप में नियुक्त किया जाना तय है, लेकिन उसने ये भी कहा है, कि अंतिम फैसला निश्चित रूप से ट्रंप को लेना है और वह कभी भी अपना मन बदल सकते हैं।
हालांकि रुबियो शुरू में ट्रंप के साथ असहमत रहे हैं, और उन्होंने ट्रंप युग में एक वैश्विक और हस्तक्षेपवादी विदेश नीति को खारिज कर दिया है, लेकिन वह यूक्रेन पर रूस के युद्ध जैसे मुद्दों पर ट्रंप के सुर में सुर मिलाते हुए कहते हैं, कि युद्ध गतिरोध पर पहुंच गया है और "इसे समाप्त करने की आवश्यकता है"।
भारत-चीन को लेकर क्या रही है रुबियो की सोच?
रुबियो भारत के साथ संबंधों को मजबूत करने के मुखर समर्थक रहे हैं, उन्होंने भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में स्थापित किया है। पिछले कुछ वर्षों में, उन्होंने अमेरिका-भारत सहयोग को गहरा करने के प्रयासों की वकालत की है, खासकर रक्षा और व्यापार के क्षेत्रों में।
रुबियो का भारत के प्रति समर्थन अमेरिकी संसद में एशिया में चीन के प्रभाव को संतुलित करने के द्विदलीय प्रयासों के अनुरूप है। उन्होंने अक्सर मजबूत भारत-अमेरिका संबंधों के रणनीतिक महत्व को उजागर किया है, ऐसी नीतियों की वकालत की है, जो न केवल साझा आर्थिक हितों को बढ़ावा देती हैं, बल्कि दोनों देशों के लोकतांत्रिक सिद्धांतों को भी मजबूत करती हैं।
चीन के मामले में रुबियो का रुख काफी सख्त है। सीनेट में चीन नीति पर एक आक्रामक आवाज के रूप में, उन्होंने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के मानवाधिकारों के हनन, व्यापार प्रथाओं और दक्षिण चीन सागर में आक्रामक कार्रवाइयों की आलोचना की है। उन्होंने उन नीतियों का समर्थन किया है, जो चीन पर आर्थिक दबाव बढ़ाती हैं, जिसमें प्रतिबंध और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर प्रतिबंध शामिल हैं।
रुबियो की सोच, चीन को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसके कामों के लिए जवाबदेह ठहराने पर जोर देता है, अगर उनकी नियुक्ति की पुष्टि होती है, तो वे विदेश विभाग में भी यही रुख अपना सकते हैं। उनके ट्रैक रिकॉर्ड से पता चलता है, कि वे चीनी प्रभाव के खिलाफ अमेरिका के आक्रामक नीति को आगे ले जाएंगे। जिसमें भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ संबंधों को मजबूत करना शामिल है।
रुबियो का विदेश नीति का अनुभव यूरोप तक भी फैला हुआ है, जहां वे उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के कट्टर समर्थक रहे हैं। अपने सीनेट करियर के दौरान, रुबियो ने वैश्विक स्थिरता को बनाए रखने और रूसी आक्रामकता का मुकाबला करने में नाटो गठबंधन के महत्व के लिए तर्क दिया है, खासकर 2014 में क्रीमिया पर कब्जे के बाद से। ऐसे में कहा जा सकता है, कि रुबियो अगर अमेरिका के विदेश मंत्री बनते हैं, तो भारत के साथ संबंध और मजबूत होंगे।












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