मालदीव इलेक्शन में 'चायना मैन' मोहम्मद मुइज्जू की पार्टी की प्रचंड जीत, बहिष्कार अभियान भारत पर पड़ा भारी?
Maldives Election Impact: पिछले साल नवंबर में राष्ट्रपति बनने वाले मोहम्मद मुइज्जू अभी तक जो भी भारत विरोधी फैसले कर रहे थे, विपक्षी पार्टियां संसद में उसे चुनौती दे रही थी, क्योंकि मालदीव की संसद में रविवार से पहले तक भारत समर्थक पार्टियों के पास बहुमत थी। लेकिन, रविवार को हुए संसदीय चुनाव में भारत समर्थक पार्टियों का सूपड़ा साफ हो गया है।
रविवार को चुनाव के नतीजों से पता चला है, कि मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की पार्टी ने संसद में प्रचंड बहुमत हासिल कर ली है, और भारत विरोधी पार्टी की इस प्रचंड बहुमत से पहला सवाल यही उठता है, कि क्या भारत के लिए मालदीव में सारी उम्मीदें खत्म हो गईं हैं?

मोहम्मद मुइज्जू की पार्टी को मिले अपार समर्थन के बाद दूसरा सवाल ये है, कि क्या मालदीव की एक बड़ी आबादी अब भारत को छोड़कर चीन के खेमे में चली गई है और क्या, भारत में पिछले दिनों मालदीव के बहिष्कार को लेकर जो मुहिम चलाई गई है, उसने मालदीव में भारत की डिप्लोमेसी का बड़ा नुकसान कर दिया है?
मोहम्मद मुइज्जू की पार्टी की प्रचंड जीत
मालदीव के चुनाव आयोग द्वारा जारी परिणामों के मुताबिक, मोहम्मद मुइज्जू की पीपुल्स नेशनल कांग्रेस (PNC) ने घोषित होने वाली पहली 86 सीटों में से 66 सीटें जीत ली हैं। मालदीव की संसद में कुल 93 सीटें हैं और 66 सीटें जीतने का मतलब ये है, कि मोहम्मद मुइज्जू के भारत विरोधी फैसलों को अब संसद का पूरा समर्थन हासिल होगा और भारत समर्थक पार्टियों के लिए भारत के पक्ष में आवाज बुलंद करना काफी मुश्किल होगा।
मालदीव संसदीय चुनाव पर भारत और चीन, दोनों ही देशों ने नजरें गड़ा रखी थीं और इस चुनाव को चीन के साथ गहरे आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने की मोहम्मद मुइज्जू की रणनीति के लिए एक महत्वपूर्ण लिटमस टेस्ट के रूप में देखा गया था, लेकिन चुनावी नतीजे बताते हैं, कि मोहम्मद मुइज्जू ने चीन को लेकर जो नीति बनाई है, वो देश की एक बड़ी आबादी को कबूल है।
PNC और उसके सहयोगियों को पिछले संसदीय चुनाव में सिर्फ 8 सीटें ही मिली थीं, जिसकी वजह से पिछले साल नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद भी मोहम्मद मुइज्जू के लिए तमाम भारत विरोधी फैसले लेना मुश्किल हो रहा था और इस साल फरवरी में नौबत यहां तक आ गई थी, कि भारत समर्थक पार्टियों ने राष्ट्रपति को हटाने के लिए संसद में अविश्वास प्रस्ताव तक पेश करने की मांग की थी।
लेकिन, अब भारत समर्थक मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी (MDP) को इस चुनाव में सिर्फ 12 सीटें ही हासिल हुई हैं, जबकि पिछले चुनाव में MDP को शानदार जीत हासिल हुई थी।
इस बार के चुनाव प्रचार के दौरान भी मोहम्मद मुइज्जू ने जमकर भारत के खिलाफ बयानबाजी की थी और अपने 'इंडिया ऑउट' कैम्पेन को आगे बढ़ाया था, जिसके दम पर उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में जीत हासिल की थी।

मालदीव में अब 'चायना मैन' के पास पूर्ण बहुमत
मालदीव, भूमध्य रेखा के पार लगभग 800 किलोमीटर (500 मील) तक फैले लगभग 1,192 छोटे मूंगा द्वीपों का एक निचला देश है, जो ग्लोबल वार्मिंग की वजह से समुद्र में जलस्तर बढ़ने से सबसे संवेदनशील देशों में गिना जाता है।
मोहम्मद मुइज्जू, जो पहले देश में निर्माण मंत्री भी रह चुके हैं, उन्होंने इस चुनाव में देश की जनता से वादा किया था, कि वह देश में महत्वाकांक्षी भूमि सुधार कानून और ऊंचे द्वीपों का निर्माण करके समुद्री लहरों को हरा देंगे। लेकिन, देश के कई पर्यावरणविदों ने इसको लेकर चेतावनी दी है, कि ऐसा करने से देश में बाढ़ का खतरा काफी बढ़ जाएगा और ये विनाश ला सकता है।
मालदीव, जो अपने प्राचीन सफेद समुद्र तटों और एकांत रिसॉर्ट्स की वजह से एक शीर्ष लक्जरी होलीडे डेस्टिनेशन के रूप में जाना जाता है, वो हालिया समय में हिंद महासागर में एक जियो-पॉलिटिकल हॉटस्पॉट भी बन चुका है, क्योंकि इस क्षेत्र से ग्लोबल पूर्व-पश्चिम शिपिंग लेन भी गुजरती हैं।
इसी महीने मोहम्मद मुइज्जू ने चीन की कंपनियों के साथ देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए कई कॉन्ट्रैक्ट किए हैं, जबकि संसदीय चुनाव अभियान पूरी ताकत पर था। लिहाजा, माना जा रहा है, कि आने वाले वक्त में मालदीव में एक के बाद एक भारत विरोधी फैसले लेंगे, जो निश्चित तौर पर हिंद महासागर में भारत की स्थिति को प्रभावित करेंगे और चीन के लिए हिंद महासागर में एक बड़ा ठिकाना मिल गया है।
मालदीव, हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में भारत का प्रमुख समुद्री पड़ोसी है और भारत सरकार की 'SAGAR' (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) और 'नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी' जैसी पहलों में एक विशेष स्थान रखता है। दूसरी ओर, चीन अपनी 'ऋण जाल' कूटनीति और 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' के जरिए IOR में अपनी स्थिति का विस्तार कर रहा है, जो हिंद महासागर पर पड़ने वाले देशों में सैन्य और वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों का एक नेटवर्क बनाने की एक रणनीतिक पहल है।












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