चीन से पहले भारत आना चाहते थे मालदीव के राष्ट्रपति, मोहम्मद मुइज्जू को नई दिल्ली से नहीं मिला भाव
India-Maldives: मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने दिल्ली आने से पहले तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात और अब चीन जाकर मालदीव के नये राष्ट्रपति के 'भारत पहले आने' की परंपरा को तोड़ दिया है। लेकिन, अब रिपोर्ट है, कि मालदीव के राष्ट्रपति ने दिल्ली आने का प्रस्ताव पहले ही भारत को भेज दिया था।
वहीं, इंडिया टूडे की रिपोर्टर गीता मोहन, जो अभी मालदीव में कवरेज के लिए गई हैं, उन्होंने एक ट्वीट में सूत्रों के हवाले से दावा किया है, कि 17 नवंबर को शपथ ग्रहण से पहले ही मोहम्मद मुइज्जू के कार्यालय ने उनके भारत दौरे का प्रस्ताव नई दिल्ली को भेजा था, लेकिन नई दिल्ली की तरफ से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

गीता मोहन का दावा है, कि मालदीव की तरफ से जो प्रस्ताव भेजा गया था, उसमें दिसंबर महीने में राष्ट्रपति के भारत दौरे का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन भारत की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई।
हालांकि, अभी तक भारतीय विदेश मंत्रालय की तरफ से इसकी पुष्टि नहीं की गई है और हमने भारतीय विदेश मंत्रालय से इस रिपोर्ट की पुष्टि के लिए मेल किया है और जवाब आने के बाद भारत के पक्ष को इस रिपोर्ट में शामिल कर लिया जाएगा।
लेकिन, अगर ये रिपोर्ट सही है, तो मालदीव के राष्ट्रपति ने चीन जाने से पहले भारत दौरे का प्लान बनाया था।
माना जा रहा है, कि अगर भारत सरकार की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है, तो इसके पीछे मालदीव के राष्ट्रपति का एंटी-इंडिया स्टैंड हो सकता है, जो उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के कैम्पेनिंग के दौरान और चुनाव जीतने के फौरन बाद भी अपनाया था।
मालदीव राष्ट्रपति का एंटी-इंडिया स्टैंड
मोहम्मद मुइज्जू, जिन्होंने पिछले साल नवंबर में लक्जरी रिसॉर्ट्स से युक्त सौ से ज्यादा द्वीपों से बने हिंद महासागर में बसे मालदीव के राष्ट्रपति के रूप में पदभार संभाला था, उन्होंने चुनावी कैम्पेन के दौरान ही देश में लगभग 75 भारतीय सैन्य कर्मियों की एक छोटी टुकड़ी को हटाने और मालदीव की "भारत-प्रथम" नीति में परिवर्तन लाने का ऐलान किया था।
चुनाव जीतने के बाद मोहम्मद मुइज्जू ने साफ शब्दों में कहा, कि उन्होंने भारत सरकार से अपील की है, कि मालदीव से 75 भारतीय जवानों को निकाला जाए।
मोहम्मद मोइज्जू से पहले जो भी मालदीव के सर्वोच्च पद क पहुंचा है, उन्होंने अपना पहला दौरा भारत का किया है, लेकिन मोइज्जू ने भारत से पहले तुर्की का दौरा किया। यह जानते हुए भी, कि तुर्की के साथ भारत के संबंध सहज नहीं हैं और तुर्की पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध रखता है।
हालांकि, उनके चीन के दौरे को लेकर भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, कि "यह उन्हें (मालदीव के राष्ट्रपति) तय करना है कि वे कहां जाते हैं और अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बारे में कैसे आगे बढ़ते हैं।'' उन्होंने कहा, कि द्वीपों से भारतीय सैन्यकर्मियों को हटाने के बारे में उनके पास कोई अपडेट नहीं है।
जबकि, नई दिल्ली और बीजिंग दोनों इस क्षेत्र में प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, मोहम्मद मोइज्जू की सरकार को चीन की ओर झुका हुआ माना जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के लेटेस्ट आंकड़ों के मुताबिक, मालदीव पर चीन का लगभग 1.3 अरब डॉलर का बकाया है। चीन मालदीव का सबसे बड़ा बाहरी ऋणदाता है, जिसका उसके कुल सार्वजनिक ऋण में लगभग 20 प्रतिशत योगदान है।
मैरीटाइम पॉलिसी इनिशिएटिव के प्रमुख अभिजीत सिंह ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा, कि "राष्ट्रपति मुइज्जू भारत के साथ बातचीत जारी रखने के इच्छुक नहीं हैं। उनकी हरकतें माले और दिल्ली के बीच दूरियां पैदा करने के लिए निर्देशित (किसी के इशारे पर) लगती हैं। वह चीन के साथ घनिष्ठ मित्रता के लिए भी उत्सुक दिखते हैं, जो भारत के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।"
उन्होंने कहा, "नई दिल्ली की यात्रा से पहले राष्ट्रपति की बीजिंग यात्रा एक संकेत है - बिल्कुल स्पष्ट - कि भारत इस शासन के लिए प्राथमिकता में नीचे है।"
मोइज्जू ने भारत विरोधी कौन-कौन से कदम उठाए?
- अपनी सामान्य भागीदारी से हटकर, भारत, श्रीलंका और मॉरीशस के साथ सदस्य-राज्य होने के बावजूद, मालदीव ने एनएसए-स्तरीय कोलंबो सुरक्षा कॉन्क्लेव की बैठक में भाग लेने से इनकार कर दिया।
- मोहम्मद मोइज्जू ने अपने पूर्ववर्ती सोलिह की 'इंडिया फर्स्ट' नीति को उलटते हुए मालदीव के रुख को बदलने का फैसला किया है और द्वीप राष्ट्र से भारतीय सैन्य कर्मियों को वापस लेने का विकल्प चुना है।
- आगे भी बदलाव का संकेत देते हुए, मालदीव ने भारत के साथ हाइड्रोग्राफी सहयोग समझौते को नवीनीकृत नहीं करने का फैसला किया है, जिससे यह 7 जून 2024 को समाप्त हो जाएगा।
- मूल रूप से 2019 में हस्ताक्षर किए गये, इस समझौते ने भारत को मालदीव के क्षेत्रीय जल में हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण करने की अनुमति दी थी, जिसमें पानी के नीचे की सतहों की मैपिंग और चट्टानों, लैगून, समुद्र तट और अन्य भौतिक विशेषताओं का अध्ययन शामिल था।












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