भारत को छोड़ मालदीव के राष्ट्रपति पहली विदेश यात्रा पर पहुंचे तुर्की, कामयाब हुआ चीन का एंटी-इंडिया एजेंडा?
Maldives Turkey Visit: राष्ट्रपति बनने के साथ ही चीन परस्त नये राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने एंटी इंडिया कदम उठाने शुरू कर दिए हैं और अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत की जगह चीन को चुना है। जबकि, अभी तक होता ये आया है, कि भारत को तमाम पड़ोसी देशों में (पाकिस्तान को छोड़कर) चुनाव के बाद चुने गये प्रधानमंत्री अपनी पहली विदेश यात्रा नई दिल्ली की करते हैं, जो उनके 'इंडिया फर्स्ट' नीति का हिस्सा होता है।
मालदीव के पहले के राष्ट्रपतियों ने भी अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए नई दिल्ली को ही चुना था, लेकिन मालदीव के नए राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू रविवार को भारत की पहली यात्रा के बजाय अपनी पहली आधिकारिक यात्रा के लिए तुर्की को चुना है, जिसके भारत के साथ अच्छे संबंध नहीं रहे हैं।

मालदीव के नये राष्ट्रपति का तुर्की दौरा
तुर्की, पाकिस्तान का करीबी है और माना जा रहा है, कि मोहम्मद मुइज्जू की तुर्की यात्रा इस बात पर मुहर है, कि मोहम्मद मुइज्जू का शासनकाल हिंद महासागर में भारत के लिए मुश्किलें भरी होने वाला है।
मोहम्मद मुइज्जू राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने से पहले भी तुर्की की यात्रा करते रहे हैं, जिसका प्राथमिक उद्देश्य भारत पर निर्भरता कम करने के लिए वित्त पोषण के वैकल्पिक स्रोतों का पता लगाना रहा है। इस महीने की शुरुआत में, उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात का दौरा किया था और माले हवाईअड्डा परियोजना के लिए अबू धाबी फंड से 80 मिलियन अरब डॉलर का आश्वासन लेकर आए थे।
भारत ने इससे पहले मालदीव को 136.6 मिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन दी थी, लेकिन टॉप अप फंडिंग पर यूएई के आश्वासन का मतलब है, कि माले को क्रेडिट की दूसरी किश्त लिए नई दिल्ली से जुड़ने की जरूरत नहीं है।
तुर्की की अपनी यात्रा के बाद, मोहम्मद मुइज्जू 30 नवंबर को संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन - सीओपी 28 में भाग लेने के लिए संयुक्त अरब अमीरात के लिए रवाना होंगे। चूंकि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी भी सीओपी 28 में भाग लेंगे, लिहाजा, मालदीव के राष्ट्रपति चुनाव में भारत समर्थक उम्मीदवार की हार के बाद दोनों नेताओं की पहली बार मुलाकात की संभावना कम है।
आपको बता दें, कि इससे पहले नेपाल के प्रधान मंत्री प्रचंड ने जब पहली बार प्रधान मंत्री के रूप में कार्यभार संभाला था, तब उन्होंने भी भारत का दौरा नहीं किया था और इसके बजाय उन्होंने चीन को अपना पहला बंदरगाह बनाया था। लेकिन, अपने पहले प्रधान मंत्री पद के कठिन कार्यकाल के अंत के बाद, उन्होंने अगले दो बार प्रधान मंत्री बनने के बाद पहला दौरा भारत का किया। इस बार जब प्रचंड फिर से प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने भारत की यात्रा करने के लिए 6 महीनों का इंतजार किया और तब तक उन्होंने किसी देश का दौरा नहीं किया।












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