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फांसी की सजा पर सऊदी अरब से भिड़ा ये मुस्लिम देश, बीच में आया यूनाइटेड नेशंस

सऊदी अरब में नवंबर महीने की शुरूआत से अभी तक 21 लोगों को मौत की सजा दी गई है। सऊदी अरब में तलवार से सिर कलम किए जा रहे हैं और यूनाइटेड नेशंस से गहरी चिंता जताई है।

Saudi Arab News: पिछले एक महीने से सऊदी अरब में एक बार फिर से धड़ाधड़ लोगों को फांसी से लटकाया जाने लगा है और दर्जन भर से ज्यादा लोगों को सजा-ए-मौत दी जा चुकी है। इस बार मौत की सजा देने के लिए सऊदी अरब में तलवार का सहारा लिया जा रहा है और गर्दन काटकर मौत की सजा दी जा रही है। सऊदी अरब में पिछले महीने 15 से ज्यादा लोगों कौ मौत की सजा दी गई है और मानवाधिकार संगठनों ने कहा है, कि जिस तरह से सऊदी अरब लोगों को मौत की सजा दे रहा है, वो दर्शाता है, कि सऊदी अरब क्राउन प्रिंस ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से अपने किए गये उस वादे को तोड़ दिया है, जिसमें उन्होंने मौत की सजा पर रोक लगाने की बात कही थी।

जॉर्डन निवासी को मौत की सजा

जॉर्डन निवासी को मौत की सजा

यूनाइटेड नेशंक की रिपोर्ट के मुताबिक, यूएन के 13 स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने सऊदी अरब में मौत की सजा पाने के करीब खड़े जॉर्डन के निवासी की जान बख्श देने की अपील की है। यूएन रिपोर्ट के मुताबिक, 57 साल के जॉर्डन नागरिक को साल 2014 में सऊदी अरब की सीमा पर नशीली सामग्रियों के साथ गिरफ्तार किया गया था, जिसे सऊदी अरब सबसे गंभीर अपराध मानता है। यूएन ह्यूमन राइट काउंसिल ने कहा है कि, "अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत, जिन देशों ने अभी तक मृत्युदंड को समाप्त नहीं किया है, वे इसे केवल 'सबसे गंभीर अपराधों' के लिए ही लागू कर सकते हैं, जिसमें जानबूझकर हत्या करना भी शामिल है।" यूएन ने कहा कि, "नशीली दवाओं के दोषियों के लिए मौत की सजा को समाप्त करना चाहिए।"

2014 में दी गई थी फांसी की सजा

2014 में दी गई थी फांसी की सजा

आपको बता दें कि, हुसैन अबो अल-खीर को 2014 में जॉर्डन से गाड़ी चलाते समय सऊदी सीमा पर गिरफ्तार किया गया था। नारकोटिक और साइकोट्रोपिक पदार्थों के नियंत्रण पर 2005 के कानून के तहत उन्हें 2015 में कथित मादक पदार्थों की तस्करी के लिए मौत की सजा सुनाई गई थी। यूएन के मुताबिक, अगर हुसैन अबो अल-खीर को फांसी की सजा दी जाती है, तो वो 21वें व्यक्ति होंगे, जिन्हें नवंबर महीने के शुरू होने के बाद फांसी दी जाएगी। वहीं, जॉर्डन के कुछ एक्सपर्ट्स का दावा है, कि हुसैन को ट्रायल के दौरान भयंकर तरीके से प्रताड़ित किया, खतरनाक हालात में रखा गया, टॉर्चर किया गया और आखिरकार एक झूठे कबूलनाम पर दस्तखत करवाया गया। वहीं, यूएन का कहना है, कि हुसैन की गिरफ्तारी के बाद उन्हें कथित रूप से कानूनी सलाहकार और कांसुलर जानकारी तक पहुंच से रोक कर रखा गया।

'टॉर्चर के बाद कबूल किया जुर्म'

'टॉर्चर के बाद कबूल किया जुर्म'

यूनाइटेड नेशंस की रिपोर्ट में कहा गया है कि, हुसैन अबो अल-खीर को 2015 से तबौक सेंट्रल जेल में रखा गया और उन्हें जो यातनाएं दी गईं, उसकी जांच तक नहीं की गई। विशेषज्ञों ने कहा कि, उनकी मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य काफी ज्यादा खराब हो चुकी थी और वो करीब करीब अंधे हो गये थे, बावजूद उन्हें साफ तौर पर चिकित्सा सहायता से वंचित कर दिया गया। विशेषज्ञों ने रेखांकित करते हुए कहा कि, "किसी शख्स को गंभीर यातना देकर उससे लिए गये इकबालिया बयान को सबूत मानते हुए उस आधार पर उसे मौत की सजा देना मानवाधिकार और इंसाफ का गंभीर उल्लंघन है और अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत ऐसे बयान अदालतों में कबूल नहीं किए जा सकते हैं। लिहाजा, सऊदी अरब को वास्तविक सबूतों के साथ आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाना चाहिए, ना कि सिर्फ उसके इकबालिया बयानों के मद्देनजर।"

'फांसी की सजा खत्म करे सऊदी'

'फांसी की सजा खत्म करे सऊदी'

संयुक्त राष्ट्र ने कहा है, कि 10 नवंबर के बाद से सऊदी अधिकारियों द्वारा 12 विदेशी नागरिकों सहित 20 व्यक्तियों को मार डाला गया है। विशेषज्ञों ने कहा, "हम चिंतित हैं कि नशीली दवाओं से संबंधित अपराधों के लिए मौत की सजा पाने वालों की अनुपातहीन संख्या प्रवासियों की है और उनके खिलाफ ट्रायल के दौरान भेदभाव किया जाता है और उन्हें उचित कानूनी सहायता नहीं दी जाती है।" विशेषज्ञों ने कहा कि, वे चिंतित हैं कि, ये फांसी की सजा बिना किसी चेतावनी के अमल में लाया जाता है और सऊदी अरब में किसी कौ मौत की सजा दे देने के बाद इसकी पुष्टि होती है। उन्होंने कहा कि, अगर किसी शख्स को, जिसे फांसी की सजा मिली है, अगर उसके बारे में फौरन जानकारी दी जाए, तो उसतक कानूनी सहायता पहुंचाने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन ऐसा होता नहीं है।

सऊदी प्रिंस के लिए अलग कानून

सऊदी प्रिंस के लिए अलग कानून

सऊदी अरब कहता है, कि वो शरिया कानून के तहत दोषियों को सजा देता है, लेकिन मुसलमानों का मसीहा बनने वाला ये देश खुद इस्लाम का अपमान करने में अव्वल है। सऊदी अरब के पत्रकार जमाल खशोगी हत्याकांड में सऊदी क्राउन प्रिंस का सीधा हाथ होने के बाद भी उनके खिलाफ मुकदमा तक नहीं चलाया गया। जबकि, ऐसे मामलों में आरोपी को सऊदी अरब में फौरन मौत दे दी जाती है। लेकिन, एक्सपर्ट्स का कहना है, कि ये सऊदी अरब का शरिया को लेकर ढोंग है और शाही परिवार को इससे फर्क नहीं पड़ता, कि इस्लाम के नियम रहें या टूटे, बस उसकी सल्तनत रहनी चाहिए। आपको बता दें कि, सऊदी अरब के ही पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या अक्टूबर 2018 में तुर्की स्थिति सऊदी वाणिज्य दूतावास में कर दी गई थी, जिसके लिए तुर्की ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को दोषी ठहराया था।

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