PDM प्रमुख का बड़ा बयान-' PAK ने खुद कश्मीर को भारत को सौंप दिया, अब उम्मीद छोड़ दें'
कराची, 31 जनवरी। एक बार फिर से पाकिस्तान ने अपना कश्मीरी राग अलापा है, हालांकि इस बार ये सुर सत्ताधारी पार्टी नहीं बल्कि वहां केमुख्य विपक्षी गठबंधन PDM के प्रमुख और जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के चीफ मौलाना फजलुर रहमान के मुंह से निकले हैं। उन्होंने रविवार को एक सभा में कहा कि 'नियंत्रण रेखा के दोनों ओर के कश्मीरी लोग प्रधानमंत्री इमरान खान से कोई उम्मीद ना पालें क्योंकि इमरान खान सरकार ने कश्मीर को लेकर सौदेबाजी की है।'

उन्होंने साफ तौर पर कहा कि 'पाकिस्तान ने खुद अपने हाथों से कश्मीर भारत को दिया है इसलिए अब कोई भी इंसान ये उम्मीद ना करे कि कश्मीर कभी भी पाकिस्तान को मिलेगा।' उन्होंने आरोप लगाया कि इमरान खान और उनकी सरकार ने कब्जे वाले क्षेत्र पर एक समझौता किया है।
घाटी में भारतीय सेना की बर्बरता पर ध्यान देने का आह्वान किया
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कब्जे वाली घाटी में भारतीय सेना की बर्बरता पर ध्यान देने का आह्वान किया। उन्होंने कश्मीर में भारतीय सेना की कार्रवाई के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से सख्त कदम उठाने की अपील की है। मौलाना ने दावा किया, "यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमने खुद कश्मीर को भारत को सौंप दिया है।"
उन्होंने कहा कि जेयूआई-एफ आगामी कश्मीर दिवस पर पांच फरवरी को देश भर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करेगा, उन्होंने कश्मीरियों को आश्वासन दिया कि "हम आपको निराश नहीं करेंगे, उन्होंने कहा कि हम संयुक्त राष्ट्र से जागने के लिए कहते हैं। हम दुनिया को उठने के लिए कहते हैं। कश्मीर के लोग भी उतने ही इंसान हैं जितने दुनिया के दूसरे हिस्सों में हैं।' कश्मीर मामलों पर संसद की समिति के सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रहने वाले, जिन्होंने 2018 में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के सत्ता में आने के बाद कार्यालय खो दिया, ने कहा कि उनकी पार्टी कश्मीर दिवस पर कश्मीर मुद्दे पर जनता को लामबंद करेगी।
ये भी जानिए
- जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के चीफ मौलाना फजलुर रहमान 1988 और मई 2018 के बीच नेशनल असेंबली के सदस्य थे।
- रहमान MRD का हिस्सा थे जो ज़िया-उल-हक की सरकार के खिलाफ बनाई गई थी।
- महमूद हसन देवबंदी के अनुयायी होने के नाते, जिन्होंने ब्रिटिश राज के खिलाफ मुक्ति के लिए अभियान चलाया थालेकिन बाद में राजनीतिक दल जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम की स्थापना के बाद अपने सदस्यों को सशस्त्र संघर्ष से प्रतिबंधित कर दिया।
- रहमान ने शरिया कानूनों को लागू करने के लिए सशस्त्र संघर्ष का विरोध किया क्योंकि इससे समाज में उग्रवाद होता है।












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