Isreal के पीएम नेतन्याहू और MBS की सीक्रेट मीटिंग में ईरान के लिए छिपा बड़ा संदेश
तेल अवीव। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और सऊदी अरब के राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान (एमबीएस) की सीक्रेट मीटिंग इस समय सुर्खियों में है। इजरायली मीडिया के मुताबिक पीएम नेतन्याहू चुपचाप अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपेयो और एमबीएस से मिलने रविवार को सऊदी अरब गए थे। सोमवार को नेतन्याहू की कैबिनेट और लिकुड पार्टी के एक सदस्य ने इन रिपोर्ट्स की पुष्टि की है। उन्होंने कहा है कि इजरायली नेता ने सऊदी अरब में एक मीटिंग की है और यह एक बड़ी उपलब्धि है। नेतन्याहू की तरफ से हालांकि इस मीटिंग पर अभी तक कुछ भी नहीं कहा गया है। लेकिन इस मीटिंग को ईरान के लिए एक बड़ा संदेश माना जा रहा है।

ईरान पर लगते हैं कई आरोप
पोंपेयो इस मीटिंग का हिस्सा थे और उन्होंने कहा कि एमबीएस के साथ मुलाकात काफी अच्छी रही। लेकिन उनकी तरफ से भी नेतन्याहू की मौजूदगी के बारे में कुछ नहीं कहा गया। पोंपेयो के मुताबिक उन्होंने एमबीएस के साथ क्षेत्र की स्थिति पर चर्चा की है। अमेरिकी विदेश मंत्री के मुताबिक मीटिंग के दौरान रक्षा और आर्थिक साझेदारी पर भी चर्चा हुई है। पोंपेयो ने भी यह कहा कि खाड़ी क्षेत्रों में ईरान के बढ़ते प्रभाव को कम करने से जुड़ी कोशिशों को आगे बढ़ाने पर भी चर्चा की गई है। दोनों नेताओं ने साल 2030 के लिए भी लक्ष्य तय किए और क्षेत्र में मानवाधिकार प्रक्रिया में सुधारों पर भी चर्चा की गई है। मीटिंग में ईरान के बारे में चर्चा इस देश के लिए बड़ा इशारा है। इजरायल की डिफेंस फोर्सेज ने कई बार यह दावा किया है कि उसने मीडिल ईस्ट में ईरान के बढ़ते खतरे को लगातार कम करने की कोशिशें की है। सन् 1979 में जब ईरान की रेवोल्यूशन फोर्स की शुरुआत हुई है तब से ही देश पर कट्टर विचारधारा को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं। ईरान को अक्सर मीडिल ईस्ट में आतंकवाद को फैलान और आतंकी संगठनों की आर्थिक मदद का दोषी बताया जाता है। हालांकि ईरान हमेशा इस आरोप को मानने से इनकार कर देता है और अब तक इजरायल, अमेरिका और सऊदी अरब भी इसे साबित नहीं कर सके हैं।
जाने से पहले इजरायल को गिफ्ट देंगे ट्रंप
सऊदी अरब, अमेरिका और इजरायल का कहना है कि क्षेत्र में कई खतरे मौजूद हैं जो ईरान के मददगार साबित हो रहे हैं। इनमें लेबनान में हेजबोल्ला, फिलीस्तीन में गाजा पट्टी पर मौजूद इस्लामिक जेहाद के साथ इराक और सीरिया में मौजूद शिते मुसलमान और यमन में हाउथी मुसलमान शामिल हैं। जो एक और आरोप ईरान पर लगता है कि उसमें मुताबिक इस्लामिक रेवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) आतंकियों को ट्रेनिंग देती है। जिस मीटिंग के बारे में बाते हो रही हैं उसके मुताबिक माना जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन जाने से पहले इजरायल को एक बड़ा तोहफा देना चाहता है। विशेषज्ञों की मानें तो इजरायल को देश का दर्जा देकर अमेरिका मीडिल ईस्ट को चौंका सकता है। ट्रंप प्रशासन अब इस प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ा रहा है क्योंकि खाड़ी के कई देश अब्राहम समझौते को साइन करने में लगे हैं। इस समझौते के तहत इजरायल के साथ आर्थिक और सांस्कृतिक संपर्क को स्थापित किया जा सकेगा। इजरायल ने 13 अगस्त को अब्राहम समझौते को साइन किया था।












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