Israel-Iran War: रसातल में पहुंचाया जा सकता था ईरानी न्यूक्लियर प्रोग्राम, क्या इजराइल ने गोल्डेन मौका गंवाया?
Israel-Iran War: इसमें कोई शक नहीं है, कि शनिवार की सुबह ईरान पर इजराइल का हमला ऑपरेशनल रूप से कामयाब रहा था और इसका तेहरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमताओं पर गहरा असर भी पड़ेगा, लेकिन इस हमले से ये भी तय हो गया है, कि ईरान निकट भविष्य में तीसरी बार भी इजराइल पर हमला करने से अब नहीं डरेगा।
इजराइल की यह अल्पकालिक कामयाबी इस बात को छुपाती है, कि इजराइल ने इस्लामिक गणराज्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पीछे धकेलने का एक सुनहरा मौका गंवा दिया है।

हालांकि, यह कोई आसान फैसला नहीं था।
इजराइल पर, ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर हमला न करने का अमेरिकी दबाव असाधारण था और इजराइल को THAAD मिसाइल रक्षा प्रणाली उधार देने के साथ-साथ इजराइल को कुछ हथियार उपलब्ध कराने के "प्रलोभन" के साथ-साथ स्थिति हाथ से निकल जाने पर हथियारों के ट्रांसफर को लेकर बाइडेन प्रशासन ने इजराइल को छिपे शब्दों में धमकियां भी दी थी।
इस बात की भी कोई गारंटी नहीं थी, कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर इजराइली हमला ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के परमाणु हथियार बनाने के प्रयास को "स्थायी रूप से" रोक देगा, और कुछ लोगों का मानना था, कि अगर इजराइल, ईरान के परमाणु प्रोग्राम पर हमला कर देता, तो ईरान का ये दावा मजबूत हो जाता, कि इजराइल के खिलाफ अपनी बचाव के लिए उसे परमाणु बम हर हाल में चाहिए।
लेकिन इन सभी वजहों के बाद भी, यह अभी भी इजराइल के पास ईरानी परमाणु कार्यक्रम को पीछे धकेलने का अब तक का सबसे अच्छा मौका था और शायद इजराइल ने इसे आसानी से जाने दिया है। इजराइल के पास पासा पलटने का सबसे अच्छा मौका था, क्योंकि एक्सपर्टस का मानना है, कि ईरान हर हाल में परमाणु बम बनाएगा और एक बार जब ईरान परमाणु बम बना लेगा, फिर इजराइल के हाथ में कुछ नहीं रहेगा और उसका अस्तित्व हमेशा के लिए खतरे में पड़ जाएगा।
इस वक्त, यरुशलम के पास परमाणु कार्यक्रम पर हमला करने के लिए किसी भी अन्य समय की तुलना में सबसे ज्यादा वैधता थी, क्योंकि वो ईरान था, जिसने आगे बढ़कर इजराइल पर हमला किया था।
ईरान पर हमला न करने या किसी भी हमले को सीमित रखने के लिए अमेरिका और यूरोपीय संघ के दबाव के बावजूद, इजराइल के सभी सहयोगियों को अब ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर हमला करने की इजरायल की इच्छा के साथ ज्यादा सहानुभूति होगी, क्योंकि खामेनेई ने अप्रैल में और फिर 1 अक्टूबर को इजराइल पर दो प्रत्यक्ष बड़े हमलों का आदेश दिया था। लेकिन, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान के प्रति इजराइली प्रतिक्रिया को अप्रैल में एक एंटी एयरक्राफ्ट एस-300 मिसाइल प्रणाली को उड़ाकर, सीमित और सर्जिकल हमले तक ही सीमित रखा था।
यह देखते हुए कि उस सीमित प्रतिक्रिया के बाद, खामेनेई ने इस महीने की शुरुआत में फिर से हमला करने का फैसला किया, इजराइल के पास पहले से कहीं अधिक मजबूत मामला था, कि कोई भी सीमित हमला इस्लामिक गणराज्य को तीसरे हमले से रोकने के लिए अपर्याप्त होगा।
अप्रैल महीने में 300 से अधिक हवाई खतरों और 1 अक्टूबर को 180 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलों सहित दो बड़े हमलों के बाद, नेतन्याहू तर्क दे सकते हैं कि खामेनेई ने मोड़ ले लिया है और वह कुछ भी करने में सक्षम है।
इजराइल क्या तर्क दे सकता था?
इजराइल कह सकता था, कि ईरान ने आक्रामकता की सभी सीमाएं पार कर ली है और कोई नहीं कह सकता है, कि ईरान फिर से इजराइल पर कब हमला कर सकता है।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर हमला करने के लिए एक और दशकों पुरानी आपत्ति यह थी, कि इससे इस्लामिक गणराज्य इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइलें दाग सकता है, जिससे कई हजार इजराइली मारे जा सकते हैं और देश के प्रमुख हिस्सों के बड़े हिस्से तबाह हो सकते हैं। और यह उस समय की बात है जब इस बात को लेकर बहुत अनिश्चितता थी, कि एरो मिसाइल डिफेंस सिस्टम बैलिस्टिक मिसाइलों के खिलाफ कैसा प्रदर्शन करेगा, क्योंकि इस साल तक, यह (आयरन डोम के विपरीत) लगभग पूरी तरह से अप्रमाणित था।
लेकिन कुछ अमेरिकी स्रोतों के अनुसार, अप्रैल और अक्टूबर के बीच और सीमित संख्या में बैलिस्टिक मिसाइल लांचर दिए जाने पर, खामेनेई ने पहले ही अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर लिया है और इजराइल को नुकसान नहीं पहुंचा है।
इजराइल को अब पता चल गया है, कि ईरान की ताकत कितनी हो सकती है और उसके पास ऐसे एयर डिफेंस सिस्टम हैं, जो ईरानी हमलों को रोकने में सक्षम हैं।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर हमला करने का अगला बड़ा जोखिम हमेशा उसके प्रॉक्सी हिज्बुल्लाह और हमास से संबंधित था।
ऐसा कहा जाता था, कि अगर इजराइली डिफेंस फोर्स ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर हमला किया, तो खामेनेई दोनों प्रॉक्सी को इजराइल पर 'नरक की आग' बरसाने का आदेश देगा।
इजराइल को अकसर इस बात से डराया जाता था, कि हिज्बुल्लाह और हमास के पास ऐसे रॉकेट्स मौजूद हैं, जो उसके एयर डिफेंस को भेद सकते हैं, जिससे हजारों इजराइलियों की मौत हो सकती है और खुद ईरान भी बैलिस्टिक मिसाइलों से उसपर हमला कर भारी नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे इजराइली बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान हो सकता है, लेकिन अब हमास करीब करीब खत्म हो चुका है और हिज्बुल्लाह के रॉकेट खतरे का डर भी करीब करीब खत्म हो गया है।
अब यही माना जा रहा है, कि हिज्बुल्लाह के पास अचानक से इजराइल को भारी नुकसान पहुंचाने की क्षमता नहीं है।
लिहाजा यदि जोखिम पहले से काफी कम हैं, तो फिर ईरानी न्यूक्लियर ठिकानों पर हमला क्यों नहीं?
ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर एक बड़ा हमला उसे कई वर्षों पीछे धकेल सकता था।
निश्चित तौर पर, तेहरान पुनर्निर्माण कर सकता है और परमाणु विज्ञान का ज्ञान, जिसे इजराइल और पश्चिम ने हाल के वर्षों में समस्याग्रस्त रूप से हासिल करने की अनुमति दी है, उस पर बमबारी नहीं की जा सकती।
लेकिन जब कुछ विशेषज्ञ कहते हैं, कि इजराइल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नष्ट नहीं कर सकता, क्योंकि यह बहुत फैला हुआ है और कुछ हिस्से इजराइली हथियारों के लिए बहुत गहरे भूमिगत हैं, और बिना अमेरिकी बंकर बस्टर बमों के इजराइल ऐसा नहीं कर सकता है, तो ये भ्रामक बात नजर आती है।
उदाहरण के लिए, इजराइल को ईरान की भूमिगत फोर्डो परमाणु सुविधा को पूरी तरह से नष्ट करने की आवश्यकता नहीं है, जब उसके पास इतनी क्षमता है, कि वह सुविधा को क्षतिग्रस्त और दुर्गम बना सकता है।
इसके अलावा, यदि ईरान पुनर्निर्माण करने की कोशिश करता है और ऐसा लगता है कि वह दो साल में फिर से परमाणु हथियारों के करीब पहुंच रहा है, तो इजराइल फिर से हमला कर सकता है। लिहाजा, इजराइल में अब पूछे जा रहे हैं, कि क्या बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी दबाव में आकर ईरानी न्यूक्लियर ठिकानों को तबाह करने का एक बड़ा मौका खो दिया है?












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