इजराइल-हिज्बुल्लाह की जंग में फंसा लेबनान, क्यों कहा जाता था 'पूरब का स्विटजरलैंड', देश का इतिहास-भूगोल समझिए

Israel vs Hezbollah Conflict: एक वक्त था, जब लेबनान को 'पूरब का स्विटजरलैंड' कहा जाता था, लेकिन अब इसकी पहचान आतंकवादियों के गढ़ के तौर पर होती है और इस वक्त लेबनान बर्बाद हो रहा है। इजराइल के भीषण हमलों में करीब 500 लोग मारे जा चुके हैं और 2006 के बाद इजराइल ने सबसे बड़ा हमला किया है।

लेबनान में 2022 में मिशेल औन के पद छोड़ने के बाद राष्ट्रपति पद खाली है। फिलहाल देश में एक कार्यवाहक प्रधानमंत्री हैं, जिनका नाम नजीब मिकाती हैं, जिन्होंने औन के पद छोड़ने के बाद राष्ट्रपति पद संभालने से इनकार कर दिया था।

Israel-Hezbollah conflict

मिशेल औन खुद को एक "उदारवादी" नेता के रूप में पेश करते हैं, लेकिन हिज्बुल्लाह, जिसका शाब्दिक अर्थ है "ईश्वर की पार्टी", उसपर उनका कोई नियंत्रण नहीं है। लगातार युद्ध में फंसे रहने की वजह से लेबनान की अर्थव्यवस्था व्यावहारिक रूप से ध्वस्त हो गई है, नागरिकों के पास आम तौर पर बैंकों तक पहुंच नहीं है और देश का संविधान लोगों को नया राष्ट्रपति चुनने का विकल्प नहीं देता है, अगर संसद राष्ट्रपति चुनने में नाकाम रहती है तो।

हि्ज्बुल्लाह, जो ईरान का प्रॉक्सी संगठन है, वो जिहाद के नाम पर लोगों को इजराइल से युद्ध के लिए भड़काता है, लिहाजा देश का एक बड़ा हिस्सा इसी आतंकी मानसिकता में जकड़ चुका है।

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सालों से गृहयुद्ध में फंसा है लेबनान

लेबनान में दशकों से गृहयुद्ध की स्थिति बनी हुई है। जबकि, 1989 में ताइफ समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद एक गृहयुद्ध खत्म हुआ था। इस समझौते ने धार्मिक आधार पर विभिन्न समुदायों के बीच सत्ता का बंटवारा किया - उदाहरण के लिए, रिपब्लिक का राष्ट्रपति एक मारोनाइट ईसाई होगा, जबकि प्रधानमंत्री एक सुन्नी होगा और संसद का अध्यक्ष एक शिया होगा।

नई सत्ता संरचना के साथ, लेबनान की संसद नेशनल असेंबली ने 1990 के दशक की शुरुआत में शक्तिशाली शिया समूह हिज़्बुल्लाह को छोड़कर सभी मिलिशिया को भंग कर दिया। जैसे-जैसे पश्चिम एशिया में युद्ध का केंद्र फिलिस्तीनी क्षेत्र गाजा से लेबनान की ओर ट्रांसफर होता गया, हिज्बुल्लाल ईरान की मदद से शक्तिशाली होता चला गया।

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लेबनान में क्या कर रहा है हिज्बुल्लाह?

लेबनान 16वीं शताब्दी की शुरुआत से लेकर प्रथम विश्व युद्ध तक ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा था, जिसके बाद यह एक संरक्षित क्षेत्र के रूप में फ्रांस के पास चला गया और 1944 में इसे अपनी स्वतंत्रता मिली। लेकिन इसे लगातार सैन्य आक्रमणों और गृह युद्धों का सामना करना पड़ा, और ये इजराइल-फिलिस्तीन-अरब संघर्ष के लिए एक खेल का मैदान बन गया।

1958 में लेबनान में एक गृह युद्ध छिड़ गया। 1967 में लेबनान में स्थिति फिलीस्तीनी समूहों ने इजराइल पर अरब देशों के साथ हमले शुरू कर दिए, जिसके बाद इजराइल ने इसे काफी नुकसान पहुंचाया। 1975 में, ईसाइयों और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा फिर से एक गृह युद्ध में बदल गई, जो 1990 में ताइफ समझौते पर हस्ताक्षर के साथ खत्म हुई।

इस गृहयुद्ध के दौरान ही ईरान ने 1982 में हिज्बुल्लाह (ईश्वर की पार्टी) की स्थापना की थी, जो कि पहले फारस के नाम से जाने जाने वाले इस्लामी क्रांति के तीन साल बाद हुई थी। यह 1978 में दक्षिणी लेबनान पर इजराइल के आक्रमण और एक फिलिस्तीनी समूह द्वारा आतंकवादी हमले के बाद वहां एक ईसाई मिलिशिया की स्थापना का जवाब भी था।

1982 में इजराइल ने लेबनान पर पूर्ण पैमाने पर आक्रमण किया, जब ब्रिटेन में उसके राजदूत को एक फिलिस्तीनी समूह ने निशाना बनाया था और इजराइल समर्थक लेबनान के राष्ट्रपति-चुनाव बशीर गेमायल ने उनकी हत्या कर दी थी। इस आक्रमण ने हिज्बुल्लाह के भविष्य को आकार दिया। तब से इसने इस क्षेत्र में इजराइल और पश्चिमी बलों पर हमलों का नेतृत्व किया है।

आज हिज्बुल्लाह लेबनान में एक राज्य के भीतर एक राज्य है।

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लेबनान में कितनी बड़ी शक्ति बन चुका है हिज्बुल्लाह?

हिज्बुल्लाह ने 1992 से लेबनान में सभी चुनाव लड़े हैं। वर्तमान में, हिज्बुल्लाह के पास कार्यवाहक लेबनानी सरकार में मंत्री और संसद में विधायक हैं। इसके पास लोक निर्माण मंत्रालय और श्रम मंत्रालय है।

हालांकि पश्चिमी और दुनिया के अधिकांश देश हिज्बुल्लाह को एक आतंकवादी संगठन करार देते हैं, लेकिन यह आधिकारिक तौर पर लेबनान में एक राजनीतिक दल है और अक्सर सरकार बनाने के लिए ईसाई दलों सहित अन्य राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन करता रहा है।

2022 में हुए पिछले संसदीय चुनाव में, हिज्बुल्लाह समर्थित गठबंधन, जिसके पास 121 सांसद सदस्य थे, उसने संसद में बहुमत खो दिया, लेकिन राष्ट्रपति के चुनाव को रोकने के लिए उसके पास पर्याप्त शक्ति अभी भी है। पीएम मिक्ताती का व्यावहारिक रूप से हिज्बुल्लाह पर कोई नियंत्रण नहीं है।

हिज्बुल्लाह ने लेबनान के शक्तिशाली हरीरी परिवार को सत्ता से बाहर रखा है। पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरीरी का, जिनके बेटे साद हरीरी ने 2022 के चुनाव का बहिष्कार किया था, वो सत्ता से बाहर हैं। 2006 में लेबनान से इजराइल के हटने के बाद हिज्बुल्लाह ने इसका श्रेय लिया था और लोकप्रिय समर्थन हासिल किया था। ईरान और सीरिया से मजबूत समर्थन ने लेबनान की काफी मदद की है। हिज्बुल्लाह की अपनी सेना है, जबकि लेबनान के पास अपनी अलग राष्ट्रीय सेना है।

ऐसा कहा जाता है, कि हिज्बुल्लाह के पास इतनी शक्ति है, कि वो आसानी से लेबनान की सेना को हराकर कभी भी देश पर कब्जा कर सकता है।

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हिब्जुल्लाह ने लेबनान पर कब्जा क्यों नहीं किया?

हिज्बुल्लाह नेता हसन नसरल्लाह का दावा है, कि उनके पास 100,000 से ज्यादा लड़ाके हैं। हालांकि, स्वतंत्र ऑब्जर्वर्स का मानना है, कि हिज्बुल्लाह में 50,000 तक लड़ाके हो सकते हैं। लेकिन, इनमें से ज्यादातर सीरियाई गृहयुद्ध में लड़ चुके हैं, जिसकी वजह से उनके पास काफी तजुर्बा है और इसीलिए लेबनान की सेना पर उनके भारी पड़ने की संभावना रहती है।

हिज्बुल्लाह के पास 200,000 तक रॉकेट और मिसाइल होने का अनुमान है। हालांकि इसके शस्त्रागार में छोटे, बिना गाइडेड, सतह से सतह पर मार करने वाले आर्टिलरी रॉकेट शामिल हैं। वहीं, इसके पास विमान-रोधी और जहाज-रोधी मिसाइलें भी हैं। इसकी कुछ मिसाइलें गाइडेड भी हैं, जो इजराइल के अंदर तक हमला करने में सक्षम हैं। निश्चित रूप से इसके पास हमास के पास मौजूद हथियारों से ज्यादा आधुनिक हथियार हैं।

हालांकि, हिज्बुल्लाह हमेशा से कहता आया है, कि उसका मकसद लेबनान पर कब्जा करना नहीं है। ऐसा कहने से उसे रणनीतिक लाभ मिलता है। ऐसा कहने पर उसे ईरान और सीरिया से तो लाभ मिलता ही है, साथ ही लेबनान को भी दुनिया से मदद मिलती है और इसपर प्रतिबंध नहीं लगता है। अगर ये लेबनान पर कब्जा कर लेगा, तो अफगानिस्तान की तरफ इसे दुनिया से मदद मिलनी बंद हो जाएगी। लेकिन, ये लेबनानी सरकार के बजाए ईरानी सरकार के आदेशों को मानता है।

लेकिन, इजराइल और हिज्बुल्लाह के बीच बढ़ती दुश्मनी ने पूरे लेबनान को असुरक्षित बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने चेतावनी दी है, कि अगर हमलों पर तुरंत लगाम नहीं लगाई गई, तो यह पश्चिम एशिया के अन्य देशों में भी फैल जाएगा और इस तरह का व्यापक संघर्ष नियंत्रण से बाहर हो सकता है। जबकि इजराइल का लक्ष्य हिज्बुल्लाह को दंडित करना है, लिहाजा लेबनान चाहकर भी खुद को संघर्ष से अलग नहीं कर सकता या युद्ध से अपना बचाव नहीं कर सकता है, भले ही हिज्बुल्लाह और लेबनान एक समान ना हों।

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