Iran Protest Explainer: खामेनेई का बना रहना भारत के लिए क्यों जरूरी? कश्मीर पर होगा सबसे ज्यादा नुकसान!
Iran Protest Explainer: ईरान के कई शहरों में आर्थिक संकट के कारण बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इन हालात को नई दिल्ली बेहद सतर्कता के साथ देख रही है। भारत की चिंता ईरान की धार्मिक सत्ता के टिके रहने या गिरने को लेकर नहीं है, बल्कि इस बात को लेकर है कि अगर ईरान कमजोर हुआ या बिखर गया, तो इसका असर भारत के रणनीतिक हितों पर कैसे पड़ेगा। यही जानने की कोशिश हम इस इनसाइड स्टोरी में करने वाले हैं।
खामेनेई नहीं, ईरान है मुद्दा
भारत का डर यह नहीं है कि ईरान में कौन सत्ता में रहेगा, बल्कि यह है कि ईरान एक कमजोर या अस्थिर देश न बन जाए, जैसे कि सीरिया और ईराक आदि। ऐसा होने पर भारत के लिए पश्चिम एशिया, अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच और भी मुश्किल हो सकती है।

क्यों बने रहे भारत-ईरान के रिश्ते?
भारत का ईरान के साथ रिश्ता कभी भी धार्मिक या वैचारिक नहीं रहा। यह रिश्ता हमेशा भूगोल, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय संतुलन पर टिका रहा है। पाकिस्तान द्वारा भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए ज़मीनी रास्ता न देने की वजह से ईरान भारत के लिए एकमात्र व्यावहारिक पश्चिमी गलियारा बन गया।
पाकिस्तान के काउंटर के लिए ईरान कैसे जरूरी?
ईरान लंबे समय से क्षेत्र में पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ एक संतुलन के रूप में काम करता रहा है। भारत की पश्चिम एशिया नीति इसी संतुलन पर टिकी है, जहां वह विरोधी शक्ति समूहों के साथ भी रिश्ते बनाए रखता है।
बदली सत्ता तो भारत को खतरा?
ईरान में किसी भी तरह की उथल-पुथल से चीन को फायदा मिल सकता है। इससे व्यापार मार्ग, सुरक्षा रणनीति और कूटनीतिक संतुलन पूरी तरह बदल सकता है, जिसे भारत ने दशकों की मेहनत से संभाला है।
चाबहार पोर्ट: भारत की रणनीति का केंद्र
भारत की ईरान नीति का केंद्र चाबहार बंदरगाह है, जिसे भारत की मदद से विकसित किया गया। इसका मकसद पाकिस्तान को बायपास कर सीधे ईरानी तट तक पहुंच बनाना और वहां से सड़क के साथ-साथ रेल नेटवर्क के ज़रिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचना था। ईरान दशकों से भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का सबसे भरोसेमंद इलाका रहा है। पाकिस्तान की वजह से भारत को ईरान पर निर्भर रहना पड़ा। जेएनयू के प्रोफेसर राजन कुमार के मुताबिक, चाबहार सिर्फ व्यापार का साधन नहीं, बल्कि यह संदेश है कि "भूगोल ही नियति नहीं होता।"
चाबहार हमारे लिए जरूरी
प्रोफेसर कुमार कहते हैं कि तालिबान की वापसी और प्रतिबंधों के चलते रेल परियोजनाओं में देरी जरूर हुई है, लेकिन चाबहार का महत्व कम नहीं हुआ, बल्कि बढ़ा है। अगर ईरान में सत्ता संघर्ष लंबा चला, तो चाबहार जैसी परियोजनाएं खतरे में पड़ सकती हैं। ऐसे गलियारों को राजनीतिक स्थिरता और सुरक्षा की जरूरत होती है।
खामेनेई के बाद का दौर भारत के लिए अच्छा नहीं
प्रोफेसर कुमार चेतावनी देते हैं कि खामेनेई के बाद सत्ता संघर्ष हुआ तो चाबहार रणनीतिक संपत्ति से ज़्यादा अस्थिरता का शिकार बन सकता है। ईरान कभी भी पाकिस्तान के भारत-विरोधी एजेंडे के साथ खड़ा नहीं हुआ। मुस्लिम बहुल देश होने के बावजूद तेहरान ने भारत के खिलाफ रुख नहीं अपनाया।
सुन्नी चरमपंथ के खिलाफ भारत-ईरान
ईरान ने हमेशा उन सुन्नी चरमपंथी समूहों का विरोध किया है जो शिया समुदाय और भारतीय हितों दोनों के लिए खतरा रहे हैं। 1990 और 2000 के दशक में, जब पाकिस्तान ने तालिबान का समर्थन किया, तब भारत और ईरान तालिबान विरोधी ताकतों के साथ खड़े थे।
कश्मीर मुद्दे पर ईरान ने भारत का साथ दिया
अगर ईरान कमजोर या बिखरा, तो अफगानिस्तान और मध्य एशिया में पाकिस्तान का प्रभाव अपने आप बढ़ जाएगा। 1990 के दशक में कश्मीर पर पाकिस्तान द्वारा अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की कोशिशों के दौरान ईरान भारत के पक्ष में खड़ा रहा।
शिया शक्ति के रूप में ईरान की खास भूमिका
ईरान दुनिया की सबसे बड़ी शिया शक्ति है और यह सऊदी अरब जैसे सुन्नी देशों के लिए संतुलन का काम करता है। अगर ईरान में शिया व्यवस्था की जगह सुन्नी-झुकाव वाली सरकार आती है, तो मध्य पूर्व और ज्यादा एकतरफा हो सकता है।
भारत की ताकत
भारत तेहरान, रियाद, अबू धाबी, तेल अवीव और वाशिंगटन - सभी के साथ संतुलन बनाकर चलता है। ईरान ने ISIS और तालिबान जैसे संगठनों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है, जो भारत के भी दुश्मन हैं।
भारत-ईरान व्यापार छोटा, लेकिन अहम
भारत और ईरान के बीच सालाना व्यापार $1.3-$1.7 बिलियन का है, जो भारत के कुल व्यापार का करीब 0.1% है। भारत ने चाबहार और उससे जुड़ी परियोजनाओं में $1 बिलियन से अधिक निवेश किया है। 2021 में चीन और ईरान के बीच 25 साल का रणनीतिक समझौता हुआ। 2024-25 में चीन ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा।
अस्थिर ईरान से चीन को कैसे फायदा?
अगर ईरान कमजोर हुआ, तो वह सुरक्षा और निवेश के लिए चीन पर और ज्यादा निर्भर हो जाएगा। भारत ने न तो विरोध प्रदर्शनों का समर्थन किया है और न ही सत्ता परिवर्तन का। भारत मानता है कि ईरान में बदलाव अगर हो, तो वह पूरी तरह आंतरिक होना चाहिए।
ईरान में शांति भारत का फायदा
भारत के लिए एक स्थिर, भले ही कठिन, ईरान एक अराजक या शत्रुतापूर्ण ईरान से कहीं बेहतर है।
इसीलिए नई दिल्ली की प्राथमिकता बदलाव नहीं, बल्कि स्थिरता है।
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