IOC 2026: IOC 2026: सुषमा स्वराज ने बनाया, अब जयशंकर चला रहे, क्या है इंडियन ओसियन कॉन्फ्रेंस?- Explained

IOC 2026: हिन्दमहासागर के किस क्षेत्र और किस खनिज पर किसका कब से कब तक अधिकारी है और वह वहां क्या-क्या कर सकता है ये हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है। जब इसको लेकर एशियाई देशों में कन्फ्यूज होने लगा तो फिर इसके समाधान, व्यापार, हिन्द महासागर में कार्गो शिप और फेसिलिटी की सुरक्षा को लेकर साल 2016 में तत्कालीन विदेश मंत्री और बीजेपी की दिवंगत वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज ने एक संगठन की स्थापना करवाई।

जिसे नाम दिया गया इंडियन ओशियन कॉन्फ्रेंस (Indian Ocean Conference) और तब से लेकर अब तक हर साल IOC की एक सालाना मीटिंग होती है। आइए जानते हैं क्या है IOC, क्या करती है और भारत के लिए क्यों जरूरी है?

IOC 2026

क्या-क्या करती है IOC?

IOC का मेन फोकस चार प्वॉइंट पर टिका है:

• समुद्री सुरक्षा (Maritime Security)
• व्यापार और सप्लाई चेन (Trade and Supply Chain)
• क्षेत्रीय सहयोग (Regional Cooperation)
• ब्लू इकोनॉमी (Blue Economy)

IOC 2026

इसका मूल विजन भारत के "SAGAR" (Security and Growth for All in the Region) सिद्धांत पर आधारित है। ताकि हिंद महासागर क्षेत्र के देश साथ मिलकर काम करें और समुद्री सुरक्षा को भी मजबूत दें। जिससे इस इलाके में व्यापार आसान बने और क्षेत्र में स्थिरता बनी रहे।

कैसे काम करती है ये कॉन्फ्रेंस ?

इस कॉन्फ्रेंस का आयोजन India Foundation की करती है जिसे हर साल किसी अलग देश के साथ साझेदारी में किया जाता है (जैसे ओमान, वियतनाम, मॉरीशस आदि)। इसमें हिस्सा लेने के लिए 40-50 देशों के प्रतिनिधि हर साल पहुंचते हैं। जिनमें विदेश मंत्री, रक्षा विशेषज्ञ, थिंक टैंक, अंतरराष्ट्रीय संगठन स्तर के लोग शामिल होते हैं। इसके अलावा हर साल 300-400 से ज्यादा डेलीगेट्स भी इसमें हिस्सा लेते हैं

कैसे होती है बात?

कॉन्फ्रेंस में अलग-अलग सेशन होते हैं:

• Plenary Sessions (मुख्य सत्र)
• Thematic Sessions (विशेष विषयों पर चर्चा)
• Panel Discussions

इसमें बड़े मुद्दों पर खुलकर बहस होती है

कैसे होता है एजेंडा और आउटपुट तय?

दरअसल कॉन्फ्रेंस में कोई बड़ा फैसला नहीं होता, क्योंकि यह UN जैसी decision-making body नहीं है। बल्कि, यहां से पॉलिसी, आईडिया, पार्टनर्शिप और रणनीतिक समझ को बढ़ाने और उस पर विचार रखने के लिए लंबी बातचीत होती है।

इसमें भारत का क्या रोल?

भारत IOC की शुरुआत और इसे लीड करने वाला देश है और इसको सही से चलाने का जिम्मा भी भारत के ही पास है। इससे भारत को एशियाई क्षेत्र में एक पावर के रूप में गढ़ा जाता है जो सभी संभव पक्षों से बात करता है और दूसरों की भी बात करवाता है।

कैसे बना बड़ा ग्लोबल प्लेटफॉर्म?

पिछले 8 सालों में यह कॉन्फ्रेंस तेजी से आगे बढ़ी है। अब यह सिर्फ एक मीटिंग नहीं बल्कि एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय मंच बन चुका है, जहां देशों के मंत्री, पॉलिसी एक्सपर्ट, डिफेंस और एकेडमिक एक्सपर्ट जैसे दिग्गज शामिल होते हैं। यह मंच समुद्री शासन (maritime governance) और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे अहम मुद्दों पर गहरी चर्चा का मौका देता है।

8 साल में कितनी बढ़ी भागीदारी?

इस कॉन्फ्रेंस की बढ़ती लोकप्रियता इसके आंकड़ों से साफ दिखती है। अब तक इसमें 55 देशों के 100 से ज्यादा मंत्री शामिल हो चुके हैं। हर साल के संस्करण में 40 से ज्यादा देशों के 400 से अधिक प्रतिनिधि भाग लेते हैं। यह बताता है कि IOC अब एक ग्लोबल लेवल का प्रभावशाली प्लेटफॉर्म बन चुका है। आठवां इंडियन ओशियन कॉन्फ्रेंस (IOC 2025) फरवरी 2025 में ओमान की राजधानी मस्कट में आयोजित किया गया। इसकी मेजबानी India Foundation ने ओमान के विदेश मंत्रालय और सिंगापुर के S. Rajaratnam School of International Studies के साथ मिलकर की। पिछले साल भी इसमें 45 देशों के 400 से ज्यादा प्रतिनिधि पहुंचे थे, जो इस कॉन्फ्रेंस की हैसियत बताता है।

इस साल किस बारे में चर्चा और कौन-कौन होगा मेहमान?

इंडिया फाउंडेशन के मुताबिक इस साल की समिट का विषय Collective Management For Indian Ocean Governance है। इस कॉन्फ्रेंस में कई बड़े अंतरराष्ट्रीय नेता शामिल हुए। इसमें भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के अलावा बांग्लादेश, भूटान, कंबोडिया और मिस्र के मंत्री भी मौजूद थे। साथ ही मॉरीशस, ओमान, सऊदी अरब, सेशेल्स, सिंगापुर, श्रीलंका, तंजानिया, थाईलैंड और यूके के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया। इसके अलावा BIMSTEC जैसे क्षेत्रीय संगठनों की भी भागीदारी रही।

आयोजन समिति में कौन-कौन है?

इस कॉन्फ्रेंस की आयोजन समिति काफी मजबूत और अनुभवी है। प्रेसीडियम में एस. जयशंकर, मॉरीशस के धनंजय रामफूल, सिंगापुर के विवियन बालकृष्णन और ओमान के सैयद बदर अल बुसैदी शामिल हैं। इसके अलावा श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे, भारत के सुरेश प्रभु, राम माधव और एम.जे. अकबर जैसे अनुभवी लोग भी समिति का हिस्सा हैं।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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