Indian Navy लेगी रूस में बने दो युद्धपोतों की डिलीवरी, क्या भारत पर प्रतिबंध लगाने की हिम्मत करेगा अमेरिका?
Russian Warship Indian Navy: ब्लूमबर्ग ने भारक के वरिष्ठ अधिकारियों के हवाले से दावा किया है, कि अगले कुछ महीनों में रूस में बने दो युद्धपोत भारतीय नौसेना में शामिल हो जाएंगे। यानि, भारत दो युद्धपोतों की रूस से डिलीवरी लेने के लिए तैयार है और ये डिलीवरी उस वक्त हो रही है, जब अमेरिका के साथ भारत के संबंधों में थोड़ी कड़वाहट आई है।
वहीं, सवाल ये उठ रहे हैं, कि क्या रूस से दो-दो युद्धपोत खरीदने पर भारत के खिलाफ अमेरिका क्या कदम उठाएगा, क्योंकि रूसी हथियार खरीदने के खिलाफ अमेरिका ने CAATSA कानून लगा रखा है, जिसके तहत रूसी हथियार खरीदने वाले देशों पर अमेरिका प्रतिबंध लगाता है।

लिहाजा सवाल उठ रहे हैं, कि क्या रूस में बनाए गये युद्धपोत को खरीदने की वजह से अमेरिका, भारत के खिलाफ प्रतिबंध लगाने की हिम्मत कर पाएगा?
रूस में बने 2 युद्धपोत इंडियन नेवी में होंगे शामिल
रिपोर्ट के मुताबिक, रूस में बना पहला युद्धपोत इस साल दिसंबर में भारत को सौंप दिया जाएगा, जबकि दूसरा जहाज अगले साल की शुरूआत में सौंपा जाएगा। मुद्दे की संवेदनशीलता के कारण नाम न बताने की शर्त पर अधिकारियों ने बताया है, कि यूक्रेन में युद्ध के कारण जहाजों की डिलीवरी निर्धारित समय से दो साल पीछे है।
ये दोनों युद्धपोत, उस चार-जहाज सौदे का हिस्सा हैं, जिसके लिए भारत ने रूस के साथ साल 2018 में समझौता किया था। वहीं, अन्य दो जहाज रूस के सहयोग से भारत में ही बनाए जा रहे हैं, लेकिन युद्ध से संबंधित आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान पहुंचने की वजह से रूस में बन रहे जहाजों की डिलीवरी होने में देरी हुई है।
डिलीवरी में देरी होने की सबसे बड़ी वजह ये है, कि स्टील्थ टेक्नोलॉजी वाले गाइडेड-मिसाइल फ्रिगेट के लिए यूक्रेन में बने गैस टर्बाइनों का इस्तेमाल करता था, लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद यूक्रेन और रूस के बीच का व्यापार बंद हो गया और वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, इसके बाद भारत को तीसरे देश की मदद से ये टर्बाइन खरीदना पड़ा है।
इसके अलावा, यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस को इंटरनेशनल भुगतान प्रणाली से भी बाहर कर दिया है, जिसकी वजह से दिक्कत ये आ गई थी, कि आखिर भारत रूस को पेमेंट कैसे करे, लिहाजा लंबे अर्से से दोनों देश एक ऐसी प्रणाली विकसित करने की दिशा में काम कर रहे थे, जिससे अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन भी ना हो और दोनों देशों के बीच पेमेंट सिस्टम भी फंक्शन में आ जाए।
भारतीय अधिकारियों ने कहा, कि भारत और रूस रणनीतिक साझेदार हैं और दोनों ही देश पेमेंट सिस्टम में आई समस्या का हल करने में सक्षम हो गये हैं।
विदेश मंत्रालय का प्रतिक्रिया देने से इनकार
ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है, कि इस रिपोर्ट पर भारत के विदेश मंत्रालय, भारतीय नौसेना और रक्षा मंत्रालय ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, रूस से हथियार खरीदने के लिए अब भारत, भारतीय करेंसी रुपये का इस्तेमाल करता है, लेकिन रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए भारत पेमेंट के अलग अलग तरीकों का इस्तेमाल करता है, जिसमें यूएई की करेंसी दिरहम भी शामिल होती है। भारत रूस के समुद्री तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। भारत में अरबों डॉलर की भुगतान राशि जमा हो जाने के कारण, ये तंत्र थोड़े समय के लिए संकट में पड़ गया था। अधिकारियों ने कहा, कि नई दिल्ली ने बीजिंग के साथ अपने तनावपूर्ण संबंधों को देखते हुए चीनी युआन में भुगतान करने से इनकार कर दिया है।

क्या भारत पर प्रतिबंध लगाएगा अमेरिका?
अमेरिका ने रूस के साथ कारोबार करने को लेकर भारत के खिलाफ एक्शन लेने से काफी हद तक परहेज किया है। जब भारत ने रूस से मिसाइल डिफेंस सिस्टम S-400 की डिलीवरी ली, उस वक्त भी अमेरिका में भारत के खिलाफ प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी, लेकिन भारत के साथ रणनीतिक संबंधों को देखते हुए प्रतिबंध नहीं लगाया गया।
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के मुताबिक, अमेरिका और फ्रांस से ज्यादा हथियार खरीदने और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के देश में सैन्य हार्डवेयर बनाने के आक्रामक कार्यक्रम के बावजूद, रूस भारत के सैन्य हार्डवेयर का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बना हुआ है, जो भारत के हथियारों के आयात का 36% हिस्सा है।
SIPRI एक स्वतंत्र थिंक टैंक है, जो वैश्विक हथियार व्यापार का अध्ययन करता है, और उसने एक हालिया रिपोर्ट में कहा है, कि छह दशकों में यह पहली बार है, कि जब भारत ने रूस से हथियार खरीदना आधे से भी ज्यादा कम कर दिया है। भारत अब किसी एक देश पर हथियार खरीदने के लिए निर्भर नहीं रहना चाहता है, लिहाजा भारत अब फ्रांस, इजराइल, अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जर्मनी जैसे देशों से भी हथियारों को लेकर कारोबार करता है।
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