UNSC में अमेरिका के खिलाफ खड़ा हुआ भारत, चीन और रूस का मिला साथ, ब्रिटेन-फ्रांस का विरोध

पिछले महीने ग्लासको में यूनाइटेड नेशंस द्वारा आयोजित किए गये जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम के दौरान भी भारत और चीन एक साथ आ गये थे और दोनों देशों ने मिलकर एक प्रस्ताव में महत्वपूर्ण बदलाव करवाया था।

जेनेवा, दिसंबर 14: यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल में भारत ने दोस्त रूस की मदद से अमेरिका के एक बड़े प्रस्ताव को गिरा दिया है। दरअसल, यूएनएससी में सोमवार को एक मसौदे पर मतदान किया गया था, जिसमें भारत को अपने दोस्त रूस का पूरा साथ मिला और भारत ने अमेरिका के उस प्रस्ताव को गिरा दिया, जिसका समर्थन ब्रिटेन और फ्रांस ने किया था। भारत के इस कदम से अमेरिकी मसौदा निष्प्रभावी हो गया है।

यूएनएससी में गिरा अमेरिकी प्रस्ताव

यूएनएससी में गिरा अमेरिकी प्रस्ताव

जिस बात का अंदाजा था, यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल में वही हुआ है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जलवायु परिवर्तन से संबंधित चर्चा के लिए एक औपचारिक स्थान बनाने की मांग वाले एक मसौदा प्रस्ताव के खिलाफ भारत खड़ा हो गया था, जिसका समर्थन रूस ने कर दिया। अमेरिका ने जलवायु परिवर्तन को वैश्विक सुरक्षा चुनौती से जोड़ने को लेकर एक मसौदा पेश किया था, जिसके विरोध में भारत खड़ा हो गया और भारत के पक्ष में अमेरिकी प्रस्ताव के खिलाफ रूस ने वीटो का इस्तेमाल कर दिया और यूएनएससी में अमेरिकी प्रस्ताव गिर गया।

सिर्फ भारत-रूस ने किया था विरोध

सिर्फ भारत-रूस ने किया था विरोध

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दिलचस्प ये है कि अमेरिका ने जलवायु परिवर्तन को वैश्विक सुरक्षा से जोड़ने का जो मसौदा पेश किया था, उसके खिलाफ सिर्फ भारत और रूस ही खड़ा हुआ था। जबकि, चीन मतदान के दौरान अनुपस्थित हो गया। रिपोर्ट के मुताबिक, आयरलैंड और नाइजीरिया ने इस प्रस्ताव को प्रायोजित किया था, जिसके तहत यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल को दुनिया भर में शांति और संघर्षों पर चर्चा करने की तरह ही जलवायु परिवर्तन को लेकर भी नियमित चर्चा करने का अधिकार मिल जाता, जिसका भारत और रूस ने विरोध किया था। अब तक, जलवायु परिवर्तन पर सभी मामलों पर चर्चा करने के लिए संयुक्त राष्ट्र का मंच होता है और यूनाइटेड नेशंस के तहत यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन यानि यूएनएफसीसीसी के तहत चर्चा होता है, जिसके 190 से अधिक सदस्य हर साल कई बार मिलते हैं, जिसमें दो सप्ताह का वार्षिक सम्मेलन भी शामिल होता है।

यूएनएससी में भारत ने क्या कहा?

अमेरिका द्वारा समर्थित इस प्रस्ताव का भारत ने कड़े शब्दों में विरोध किया और भारत की तरफ से ग्लासको में पिछले महीने हुए पर्यावरण सम्मेलन का जिक्र किया गया। भारत ने कहा कि, सीओपी 26 सम्मेलन के दौरान विकासशील देशों के हितों को ध्यान में रखने की बात कही गई थी, लेकिन यूएनएससी में जो मसौदा पेश किया गया है, उसमें विकासशील देशों के हितों के संरक्षण की बात नहीं की गई है, लिहाजा भारत को इस मसौदे में दर्ज प्रस्ताव ना तो मान्य है और ना ही भारत इस प्रस्ताव का समर्थन करेगा। यूनाइटेड नेशंस में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस त्रिमुर्ति ने सवाल करते हुए पूछा कि, 'इस मसौदा संकल्प से हम क्या हासिल कर सकते हैं, जो हम यूएनएफसीसीसी की प्रक्रिया से हासिल नहीं कर सकते हैं?'

''भारत की मंशा पर नहीं उठे सवाल''

''भारत की मंशा पर नहीं उठे सवाल''

यूएनएससी में भारत के स्थायी सदस्य टीएस त्रिमुर्ति ने कहा कि, ''भारत हमेशा से पर्यावरण की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहा है और भारत की मंशा को लेकर कभी किसी को भी गलतफहमी नहीं होनी चाहिए''। उन्होंने कहा कि, 'जब भी पर्यावरण संरक्षण की बात होती है, तो भारत सबसे आगे रहता है, लेकिन पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन पर सुरक्षा के लिए यूनाइटेड नेशंस के सिक्योरिटी काउंसिल में चर्चा होना सही जगह नहीं है और इस मंच पर इस प्रस्ताव को लाना जिम्मेदारी से बचने और दुनिया का ध्यान इस मुद्दे से भटकाने की दिशा में उठाया जाने वाला कदम होगा'।

भारत ने क्यों किया अमेरिका का विरोध?

भारत ने क्यों किया अमेरिका का विरोध?

भारत ने यूनाइटेड नेशंस में जलवायु परिवर्तन के मसौदे के खिलाफ सख्त लहजा अख्तियार कर लिया था और भारत ने अमेरिका समेत मसौदे का समर्थन करने वाले देशों से कहा कि, ''यह काफी बड़ी विडंबना है कि, यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल के ज्यादातर सदस्य खुद जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार तत्वों का सबसे ज्यादा उत्सर्जन करते हैं और अगर इस मसौदे के जरिए जलवायु परिवर्तन के मसले को यूएनएससी के अधीन ले आया जाता है, तो चुनिंदा देशों को जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर हर फैसला लेने की पूरी आजादी मिल जाएगी, लिहाजा भारत को ना तो इस मसौदे की जरूरत है और ना ही भारत के लिए ये स्वीकार्य है''।

मसौदे के विरोध में चीन

मसौदे के विरोध में चीन

सिर्फ भारत और रूस ही नहीं, बल्कि चीन भी यूनाइटेड नेशंस में प्रस्तावित इस मसौदे का विरोध किया था, लेकिन चीन मतदान के दौरान शामिल नहीं हुआ। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, मसौदे का विरोध करने वाले देशों का मानना है कि, अगर यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर दखल देना शुरू कर देगा, तो इसका सीधा असर यूएनएफसीसीसी की प्रक्रिया पर पड़ेगा। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन पर हर फैसला करने का हक सिर्फ और सिर्फ पांच देशों के हाथ में आ जाएगा और वो मनमाने ढंग से दूसरे देशों के हितों को दरकिनार करते हुए फैसला ले सकते हैं। वहीं, अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों ने इस मसौदे का समर्थन किया था।

ग्लासको में एक साथ था भारत-चीन

ग्लासको में एक साथ था भारत-चीन

आपको बता दें कि, पिछले महीने ग्लासको में यूनाइटेड नेशंस द्वारा आयोजित किए गये जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम के दौरान भी भारत और चीन एक साथ आ गये थे और दोनों देशों ने मिलकर एक प्रस्ताव में महत्वपूर्ण बदलाव करवाया था। दरअसल, ग्लासको सम्मेलन के बाद जो मसौदा तैयार किया गया था, उसमें कोयले के इस्तेमाल पर पूर्ण पाबंदी की बात कही गई थी, और जीवाश्म इंधन पर सब्सिडी हटाने का प्रस्ताव दिया गया था, जिसका विरोध भारत और चीन ने संयुक्त तौर पर किया था, जिसके बाद प्रस्ताव में बदलाव करते हुए कोयले का इस्तेमाल पूरी तरह बंद करने की जगह इस्तेमाल कम करने की बात पर सहमति बनी थी।

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