NATO+ क्या है, जिसमें शामिल होने से भारत ने किया इनकार, मोदी सरकार का ये फैसला कितना सही, कितना गलत?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अमेरिका की राजकीय यात्रा पर इस महीने जाने वाले हैं और अमेरिकी कांग्रेस की सलेक्ट कमेटी ने उनकी यात्रा से पहले भारत को नाटो प्लस में शामिल करने के लिए सिफारिश की थी।

NATO+ INDIA

NATO+ INDIA: भारत ने अमेरिकी कांग्रेस की शक्तिशाली सलेक्ट कमेटी के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया था, कि भारत को नाटो प्लस में शामिल करने की कोशिशें की जानी चाहिए।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) को लेकर अमेरिकी कांग्रेस की सलेक्ट कमेटी की हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है, कि "संयुक्त राज्य अमेरिका को भारत को शामिल करने के लिए नाटो प्लस व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए।"

अमेरिका चाहता है, कि भारत नाटो प्लस का हिस्सा बने, जो 'पश्चिमी' सैन्य शक्तियों से संबद्ध समूह है। नाटो प्लस में भारत को शामिल करने का सुझाव चीन का मुकाबला करने और ताइवान के लिए प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए दिया जा रहा है।

लेकिन, सवाल यह है, कि नाटो में शामिल होने से भारत को लाभ होगा, या वास्तव में पश्चिम को लाभ होता है?

नाटो प्लस क्या है?

उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन 31 देशों का एक सैन्य गठबंधन है, मुख्य रूप से अमेरिका और यूरोपीय देशों का ये सैन्य गठबंधन है, जिसका मकसद सामूहिक तौर पर किसी खतरे से निपटना है। नाटो की सबसे शक्तिशाली बात ये है, कि अगर किसी एक देश पर हमला होता है, तो नाटो के सभी देशों पर हमला माना जाएगा और सभी 31 देश मिलकर उस युद्ध में भाग लेंगे।

लिहाजा, ये नियम नाटो को अत्यधिक ताकतवर बना देता है।

जबकि, नाटो प्लस में अमेरिका के सहयोगी माने जाने वाले पांच और सदस्य राष्ट्र शामिल हैं और ये देश हैं ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड और इजराइल। और अब अमेरिका भारत को इस बड़े समूह का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित कर रहा है, जो विरोधियों के खिलाफ एक साथ खड़ा है।

लेकिन, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी कांग्रेस के इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है।

नाटो से भारत को क्या हासिल होता है?

नाटो का लक्ष्य है, "एक सबके लिए और सब, एक के लिए"। इसका मूल रूप से मतलब है, यदि आप एक सदस्य पर हमला करते हैं, तो आपको उन सभी के संयुक्त क्रोध का सामना करना पड़ेगा।

यानि, अगर भारत नाटो का सदस्य बन जाता है, तो इसका मतलब ये होगा, कि युद्ध की स्थिति में भारत को 31 और देशों का समर्थन मिलेगा और 31 देशों के सैनिक, अपने हथियारों के साथ भारत की तरफ से लड़ने आएंगे।

इसके अलावा, नाटो देश अलग अलग समय पर हथियारों को लेकर टेक्नोलॉजी शेयर करते हैं, जिसका फायदा भारत को होगा। नाटो का सदस्य होने की वजह से ही तुर्की का डिफेंस सेक्टर इतना आगे निकला हुआ है और आज की तारीख में तुर्की, हाईटेक ड्रोन समेत एडवांस पनडुब्बियों और लड़ाकू हेलीकॉप्टर्स का निर्माण कर रहा है, जिससे उसका डिफेंस सेक्टर काफी तेजी से आगे बढ़ा है।

इसके अलावा, भारत को नाटो देशों के बीच सैन्य तकनीकी प्रगति और खुफिया जानकारी साझा करने की सुविधा भी मिल जाएगी। यानि, भारत को लगातार सैन्य और खुफिया जानकारियां दी जाएंगी, जिसका फायदा भारत अपने दुश्मनों को सीमा पर रोकने के लिए कर सकता है।

नाटो सदस्य होने के नुकसान क्या हैं?

नाटो का सदस्य बनते ही दशकों से मजबूत और समय की कसौटी पर परखा हुआ दोस्त रूस का साथ छूट जाएगा। रूस ने नाटो में शामिल होने की जिद को लेकर ही यूक्रेन पर हमला किया था।

ऐसे में यदि भारत अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो गठबंधन में शामिल होता है, जो रूस के साथ मौजूदा युद्ध में यूक्रेन का समर्थन कर रहा है, तो इसका सीधा असर नई दिल्ली के मास्को के साथ मजबूत, स्थापित और गहरे संबंधों पर पड़ेगा।

यही वह चीज है, जिसे हासिल करने के लिए अमेरिका लगातार कोशिशें कर रहा है। अमेरिका, भारत की रूस से दूरी बनाना चाहता है और भारत के रक्षा सौदों को हासिल करना चाहता है, इसके साथ ही साथ अमेरिका, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति से भी लाभ उठाना चाहता है।

अगर भारत नाटो का सदस्य बनता है, तो इसका मतलब भारत की सामरिक स्वायत्तता को खतरे में डालना है।

नाटो की सदस्यता, अपने परमाणु शस्त्रागार पर भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को भी प्रभावित कर सकती है। यूरोपीय संघ की रणनीतिक स्वायत्तता 2013-2023 पर एक यूरोपीय संसद की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है, कि कैसे यूरोपीय देशों को डर है, कि उनकी रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ने से मुक्त व्यापार में बाधाएं आ सकती हैं।

इसके अलावा, अब तक, भारत ने अपनी जमीन पर पर किसी भी विदेशी सैन्य अड्डे की मेजबानी नहीं की है, लेकिन नाटो प्लस में शामिल होने का मतलब होगा, कि अंततः अमेरिका के पास भारत में भी एक सैन्य अड्डा खोलने का मौका मिल जाएगा।

इस वक्त नाटो प्लस के सभी पांच देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं और अगर भारत नाटो प्लस का सदस्य बनता है, तो फिर भारत में नाटो का सैन्य अड्डा है। रिपोर्ट के मुताबिक, जापान में अमेरिका के 24 सैन्य ठिकाने हैं, जबकि दक्षिण कोरिया में 15, ऑस्ट्रेलिया में 2 और इजरायल में अमेरिका का एक सैन्य ठिकाना है।

वहीं, नाटो का हिस्सा होने का अनिवार्य रूप से मतलब होगा, कि भारत अमेरिका के संघर्षों में घसीटा जाएगा। इसके अलावा, नाटो देशों को अमेरिका अपने सेवक या अनुयायी की तरह ट्रेट करता है और इसको लेकर नाटो का अहम देश फ्रांस पहले ही अपनी चिंता जता चुका है।

फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने इमैनुएल मैक्रों ने एक बयान में कहा है, कि ""क्या ताइवान पर (संकट) तेज करना हमारे हित में है? नहीं। इससे भी बुरी बात यह सोचना होगा, कि हम यूरोपीय लोगों को इस विषय पर अमेरिका अनुयायी बनना होगा और अमेरिकी एजेंडे और चीनी ओवररिएक्शन के बीच हमें फंसना होगा।"

वहीं, अमेरिकी कांग्रेस की रिपोर्ट, चीन पर गंभीर आर्थिक प्रतिबंध लगाने के लिए अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच संयुक्त योजनाओं की सिफारिश कर रही है, जिसके लिए वह भारत को भी अपने पक्ष में चाहता है।

लेकिन, यहां विडंबना यह है कि, जबकि अमेरिका चीन पर प्रतिबंधों के लिए अपने सहयोगियों को तैयार कर रहा है, लेकिन चीन के साथ खुद उसका अपना व्यापार, वास्तव में पिछले वर्ष में $690.6Bn के सर्वकालिक उच्च स्तर तक बढ़ गया है। आयात और निर्यात दोनों में वृद्धि हुई है। चीन से आयात बढ़कर 536.8 अरब डॉलर हो गया है और चीन को निर्यात बढ़कर 153.8 अरब डॉलर हो गया है।

तो अगर अमेरिका की सिफारिश पर भारत NATO में शामिल होता है तो इसका फ़ायदा किसको होगा? जाहिर सी बात है,... अमेरिका का।

हालांकि, भारत ने हाल के वर्षों में अपनी विदेश नीति में कई अनुमानित राजनीतिक वर्जनाओं को तोड़ा है, लेकिन नाटो से बात करना उनमें से एक नहीं है। अमेरिका और यूरोप के बीच युद्ध के बाद के सैन्य गठबंधन नाटो के साथ नियमित परामर्श दिल्ली के लिए हमेशा से अकल्पनीय रहा है, लिहाजा भारत ने हमेशा से नाटो से परहेज किया है और माना जा रहा है, कि नाटो को लेकर भारत का ये स्टैंड आगे भी कायम रहेगा।

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