अफगानिस्तान में खामोशी के साथ वापसी कर रहा है भारत, जानिए तालिबान से कैसे मिल रहे हैं दिल?
नवंबर 2021 में NSA जीत डोभाल ने नई दिल्ली में अफगानिस्तान पर तीसरी क्षेत्रीय सुरक्षा वार्ता की मेजबानी की थी। जिसमें भारत ने यह स्पष्ट कर दिया था, कि भारत का मकसद तालिबान को उखाड़ फेंकने की नहीं है।
नई दिल्ली/काबुल, जुलाई 23: पिछले साल 15 अगस्त को जब अफगानिस्तान की गद्दी छोड़कर राष्ट्रपति अशरफ गनी फरार हुए थे, तो यही माना गया, कि अफगानिस्तान से अब भारत के भी पांव उखड़ गये हैं, लेकिन नई दिल्ली ने नए तालिबान के नेतृत्व वाले अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति को फिर से स्थापित कर लिया है। जून 2022 की शुरुआत में भारतीय विदेश मंत्रालय में पाकिस्तान-अफगानिस्तान-ईरान डेस्क के संयुक्त सचिव जेपी सिंह के नेतृत्व में एक टीम ने काबुल का दौरा किया था और तालिबान के वरिष्ठ मंत्रियों से मुलाकात की। हालांकि, भारत ने साफ कर दिया है, कि वो तालिबान की सरकार को मान्यता नहीं देगा, लेकिन पाकिस्तान के बिछाए गये कांटों के बाद भी भारत ने जिस रफ्तार से अफगानिस्तान में वापसी की है, वो काफी दिलचस्प है और उसे जानना जरूरी है।

अफगानिस्तान में भारत की वापसी
नई दिल्ली स्थित ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के फेलो मनोज जोशी ने एशिया टाइम्स में जो लेख लिखा है, उसमें उन्होंने भारत के लिए अफगानिस्तान की महत्ता और भारत किस तरह से तालिबान राज में अफगानिस्तान में अपना कदम बढ़ा रहा है, उसपर प्रकाश डाला है। गनी सरकार के पतन के बाद अफगानिस्तान में एक महत्वपूर्ण हितधारक और साथी के रूप में खुद को स्थापित करने के लिए नई दिल्ली ने काफी तेजी के साथ काम किया है, जबकि लग यही रहा था, कि अफगानिस्तान के खेल में भारत पूरी तरह से अकेला है, लेकिन एशिया टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है, कि भारत ने काफी खामोशी के साथ अफगानिस्तान में खुद को फिर से स्थापित कर लिया है और भारत ने वास्तव में साझा हितों के आधार पर संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ अफगानिस्तान में घनिष्ठ समन्वय में काम कर रहा है। एशिया टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और अमेरिका की कोशिश, अफगानिस्तान को स्थिर करने की है और दोनों देश एक समावेशी सरकार के गठन को बढ़ावा देना चाहते हैं और दोनों देश जबरदस्ती सत्ता में आई किसी भी पार्टी को मान्यता देने के खिलाफ हैं। अफगानिस्तान के लिए अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि टॉम वेस्ट ने मई 2022 में भारतीय अधिकारियों के साथ-साथ नई दिल्ली में अफगानिस्तान के पूर्व मुख्य कार्यकारी अब्दुल्ला अब्दुल्ला के साथ बातचीत की थी।

अफगानिस्तान कितना है महत्वपूर्ण?
भारत के पास अफगानिस्तान के साथ घनिष्ठ संबंधों को बढ़ावा देने के कई कारण हैं। जेपी सिंह की यात्रा के बाद भारत की तरफ से प्रेस रिलीज जारी की गई थी,उसमें अफगानिस्तान के भारत के साथ "ऐतिहासिक और सभ्यतागत संबंधों" की बात की गई थी, लेकिन इसकी नीति मुख्य रूप से इस आशंका से प्रेरित है, कि तालिबान द्वारा संचालित अफगानिस्तान में पाकिस्तान की जियो-पॉलिटिक्स बढ़ रही है। दरअसल, तालिबान को खुद भारत के लिए खतरे के रूप में नहीं देखा जाता है, लेकिन पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे जिहादी समूहों के साथ तालिबान के संबंध चिंताजनक हैं। अफगानिस्तान भारत की महाद्वीपीय आर्थिक आकांक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण है, जिसमें मध्य एशिया और ईरान के साथ घनिष्ठ संबंध शामिल हैं। ये लक्ष्य वर्तमान में इस क्षेत्र में पाकिस्तान की भारतीय पहुंच की नाकेबंदी से बाधित हैं।

अफगानिस्तान में भारत बनाम पाकिस्तान
तालिबान के इस्लामाबाद के साथ घनिष्ठ संबंध हैं, लेकिन अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच ऐतिहासिक मैत्रीपूर्ण संबंध नहीं रहे हैं, खासकर डूरंड लाइन (अफगान-पाकिस्तान सीमा) और पाकिस्तान और अफगानिस्तान में रहने वाले जातीय पश्तूनों की स्थिति को लेकर दोनों देशों के बीच भारी विवाद है। दरअसल, तालिबान, पाकिस्तान विरोधी विद्रोही समूह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (पाकिस्तानी तालिबान) को पनाह दे रहा है। लिहाजा, पाकिस्तान-तालिबान संबंध जटिल बने हुए हैं। तालिबान की मौजूदा सरकार में पाकिस्तान समर्थत हक्कानी नेटवर्क भी शामिल है, जो 1970 के दशक में स्थापित एक इस्लामी आतंकवादी संगठन था जो अब तालिबान के एक प्रमुख हिस्से के रूप में काम करता है।

पाकिस्तान के साथ किन मुद्दों पर झगड़ा
तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान को नियंत्रित करने में पाकिस्तान की मदद करने के बजाय, तालिबान, इस्लामाबाद के खिलाफ अपने 14 साल पुराने विद्रोह को समाप्त करने के लिए एक दीर्घकालिक शांति समझौता करने के लिए काम कर रहा है, एक ऐसा सौदा जिसके लिए पाकिस्तान से महत्वपूर्ण रियायतों की आवश्यकता होगी। डूरंड रेखा के दोनों किनारों पर एक स्थिर आदिवासी क्षेत्र से दोनों देशों में हिंसा फैलती है और इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान प्रांत (आईएसआईएस-के) और अल कायदा जैसे समूहों का पुनरुत्थान हो रहा है, जो खुद पाकिस्तान के लिए ही चिंताजनक है, लेकिन इसके बाद भी पाकिस्तानी जिहादी समूहों की अफगान क्षेत्र तक पहुंच को लेकर भारत की चिंता कम नहीं होगी। लिहाजा, इसे कंट्रोल करने के लिए भारत को तालिबान के साथ की जरूरत है, जबकि नई दिल्ली के साथ संबंध, काबुल में पाकिस्तान को संतुलित करने का एक साधन प्रदान करता है।

अफगानिस्तान पर भारत नीति
नवंबर 2021 में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने नई दिल्ली में अफगानिस्तान पर तीसरी क्षेत्रीय सुरक्षा वार्ता की मेजबानी की थी। जिसमें भारत ने यह स्पष्ट कर दिया था, कि भारत का मकसद तालिबान को उखाड़ फेंकने के लिए एक गठबंधन को पुनर्जीवित करना नहीं है, बल्कि भारत का उद्येश्य यह है, कि आईएसआईएस-के और अल कायदा जैसे संगठनों के पुनरुत्थान को रोका जाए। वहीं, अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में गैर-हस्तक्षेप के इस विषय को जून 2022 की वार्ता में दोहराया भी गया था। इसके साथ ही भारत ने फरवरी 2022 में घोषणा की थी, कि वह मानवीय राहत के लिए अफगानिस्तान को 50,000 टन गेहूं उपलब्ध कराएगा और गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के बाद भी भारत अफगानिस्तान में गेहूं भेज रहा है और भारत की नीति से ही पाकिस्तान को भारतीय ट्रकों को अफगानिस्तान जाने के लिए अपने रास्ते का इस्तेमाल करने देने के लिए मजबूर होना पड़ा।

अफगानिस्तान में भारतीय मदद
भारत 2001 से अफगानिस्तान के विकास के लिए मानवीय सहायता प्रदान करने वाला सबसे बड़ा देश रहा है। भारत ने अफगानिस्तान में स्कूलों, सड़कों, बांधों और अस्पतालों जैसी बुनियादी परियोजनाओं के लिए 3 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च किए हैं और ये अफगानिस्तान में भारत का कोई निवेश नहीं है और ना भी भारत को इसके बदले कोई मदद चाहिए, लिहाजा, इसने तालिबान के ऊपर भारत को बढ़त दी है, लिहाजा बहुत कुछ तालिबान 2.0 के विकास पर निर्भर करेगा, क्योंकि 1994 में तालिबान की नींव रखने वाले तालिबान के सर्वोच्च नेता मुल्ला उमर के मारे जाने के बाद का नया तालिबान आदिवासी, क्षेत्रीय और व्यक्तिगत विभाजन के साथ चुनौतियों का सामना कर रहा है और तालिबान को क्षेत्रीय वारलॉर्ड से भी लगातार चुनौतियां मिल रही हैं, लिहाजा अफगानिस्तान लगातार ऐसे देशों की तलाश में है, जो अफगानिस्तान तक मानवीय मदद पहुंचाए, ताकि उसके खिलाफ विद्रोह ना फूटे और भारत को यहां भरपूर फायदा हो रहा है।

तालिबान के साथ कैसा संबंध चाहता है भारत?
नई दिल्ली ने काबुल के साथ संबंध बढ़ाने की अपनी इच्छा का संकेत दिया है तालिबान भारत के साथ नये सिरे से संबंध बढ़ाने पर खासा जोर दे रहा है और इसी का नतीजा है, कि भारत ने काबुल स्थिति अपने दूतावास में एक 'तकनीकी टीम' की तैनात की है, जिसकी सुरक्षा में तालिबान ने भारी-भरकम टीम तैनात कर रखी है। वहीं, भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती पाकिस्तान के इस डर को शांत करना है, कि अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी उसकी सुरक्षा के लिए खतरा नहीं है।

पाकिस्तान की चुनौती
इस्लामाबाद ने अतीत में, काबुल में भारतीय दूतावास सहित भारतीय वाणिज्यिक दूतावासों को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं, जिसे भारत ने हमेशा से खारिज किया है। हालांकि, 18 जून, 2022 को काबुल में एक सिख गुरुद्वारे पर हुए बम हमले ने, जिसकी जिम्मेदारी ISIS-K नेली है, उसने नई दिल्ली में खतरे की घंटी बजा दी है। भारत पूर्व में अगस्त 2021 तक अपनी सुरक्षा के लिए एक दोस्ताना काबुल सरकार और अफगानिस्तान में अमेरिकी सुरक्षा उपस्थिति पर निर्भर था। लिहाजा, भारत काफी बारीकि से अफगानिस्तान को देख रहा है। इसे हासिल करने का सबसे अच्छा तरीका इस्लामाबाद से सीधे तौर पर निपटना होगा। लेकिन, चूंकि यह वर्तमान में काफी दूर की बात है, इसलिए विकल्प अन्य हितधारकों, खासकर संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, रूस और मध्य एशियाई देशों के साथ लॉकस्टेप में जाने का है।












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