मालदीव में फैले इस्लामिक चरमपंथ से 'जन्में' हैं मोहम्मद मुइज्जू, जानिए कैसे सुनामी में बहकर पहुंचा आतंकवाद?
Maldives-Pakistan Terrorism: मालदीव की एंटी-इंडिया सरकार और मोहम्मद मुइज्जू के भारत विरोधी तेवर साफ तौर पर हमें पाकिस्तान की याद दिलाती है, कि कैसे 1947 में भारत से अलग होकर ये देश, आतंकवाद के रास्ते पर चल पड़ा और आज आतंकवादियों का घर बन चुका है।
मालदीव में राजनीतिक संस्थाओं की भारत विरोधी बयानबाजी ने दिल्ली में सुरक्षा तंत्र की समझ को साफ कर दिया है, कि पाकिस्तान, सऊदी अरब और अफगानिस्तान के मदरसों में कट्टरपंथी बने व्यक्ति और समूह अब राजधानी माले में सत्तारूढ़ व्यवस्था का हिस्सा बन गए हैं।

ऐसा नहीं है, कि इसका पता आज चला है, जब मालदीव में एंटी-इंडिया सरकार का गठन हुआ है, बल्कि मालदीव के बुद्धिजीवी और पर्यवेक्षक लंबे समय से इसकी चर्चा कर रहे हैं, जो मालदीव से बाहर रहते हैं। संडे गार्डियन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मालदीव में इस्लामिक कट्टरपंथ के प्रसार में 2004 में देश को प्रभावित करने वाली सुनामी के बाद तेजी आई है।
मालदीव में कैसे हुआ कट्टरपंथ का उदय
2022 की जनगणना के मुताबिक, मालदीव की जनसंख्या 5.15 लाख है, जिनमें से 1.32 लाख विदेशी हैं, ज्यादातर अन्य दक्षिण एशियाई देशों से हैं, जो वहां विभिन्न ब्लू कॉलर नौकरियों में काम कर रहे हैं। प्रशासनिक रूप से, मालदीव में वर्तमान में 189 द्वीप, 18 प्रवाल द्वीप और 4 शहर हैं।
सैकड़ों वर्षों तक मुख्य रूप से बौद्ध रहे मालदीव ने 12वीं शताब्दी में इस्लाम अपना लिया। 2004 में, जब हिंद महासागर का पानी कम हुआ, तो पाकिस्तान और सऊदी अरब से मजहबी कट्टर मौलवी बड़ी संख्या में खुद को नागरिक समाज के सदस्य होने का दावा कर, लोगों की मदद के लिए राजधानी माले पहुंचे।
जबकि, हकीकत ये थी, मदद करने वाले अधिकांश मौलाना सशस्त्र समूहों से संबंधित थे, जिनमें लश्कर-ए-तैयबा की चैरिटी शाखा, इदारा खिदमत-ए-खल्क भी शामिल था, जिन्होंने माले में अपने प्रवेश का इस्तेमाल सांप्रदायिक इस्लाम फैलाने के लिए किया था। जब इन समूहों ने मालदीव छोड़ा, तो वे अपने साथ भोले-भाले और बेरोजगार युवाओं को धार्मिक प्रशिक्षण के लिए पाकिस्तान और अरब ले गए।
फिर इस चैरिटी शाखा को अप्रैल 2006 में संयुक्त राज्य प्रशासन द्वारा एक आतंकवादी समूह के रूप में नामित किया गया था।
दिसंबर 2011 में नेवल पोस्टग्रेजुएट स्कूल, कैलिफ़ोर्निया में प्रस्तुत एक पेपर में, जिसका शीर्षक था, "मालदीव में इस्लामवाद और कट्टरवाद", जिसे हसन अमीर ने लिखा है, जो अब मालदीव राष्ट्रीय बल में एक वरिष्ठ पद पर हैं, उन्होंने इस खतरे से दुनिया को आगाह किया है। उनकी थीसिस के अनुसार, मालदीववासी 1990 के दशक से ही क्षेत्रीय कट्टरपंथी संस्थाओं से वैचारिक और परिचालन प्रेरणा लेते रहे हैं।
हसन अमीर ने लिखा है, कि "जमिया अल-सलाफिया द्वारा पाकिस्तान में संचालित एक शैक्षणिक संस्थान में पढ़ने वाले एक दर्जन से ज्यादा युवाओं को कयूम की सरकार के खिलाफ प्रेरित किया गया था। उन्होंने सरकार विरोधी तख्तापलट और मालदीव में एक धार्मिक शरिया-आधारित राज्य स्थापित करने की इच्छा का बीज बोया और लोगों की भावनाओं को भड़काया।"
इस थीसिस के अनुसार, ऐसे व्यक्तियों पर अंकुश लगाने के लिए, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और दूरदराज के द्वीपों पर निर्वासित कर दिया गया, लेकिन इससे समस्या और बढ़ गई, क्योंकि उन्होंने किसी भी कानून और व्यवस्था एजेंसी के डर के बिना, अपने संदेशों का प्रचार करना जारी रखा। उन्होंने लिखा है, कि "मालदीव के युवा, जो पाकिस्तान में इस्लामी शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ते थे, वे न केवल इस्लामी शिक्षा प्राप्त करने में लगे हुए थे। बल्कि 1980 के दशक में, जब सोवियत संघ के खिलाफ अफगानिस्तान में तालिबान का जन्म हो रहा था, उस वक्त मालदीव के युवा, जो पाकिस्तान के मदरसों में पढ़ रहे थे, उन्होंने अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा क्षेत्र में विभिन्न जिहादी प्रशिक्षण शिविरों की यात्रा की।

कट्टरपंथियों के लिए वरदान साबित हुई सुनामी
2004 की हिंद महासागर की सुनामी, उन क्षेत्रीय आतंकवादी संगठनों के लिए एक बड़ा वरदान साबित हुई, जो मालदीव में पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे। हिंद महासागर क्षेत्र के अधिकांश देशों की तरह, मालदीव को भारी तबाही का सामना करना पड़ा, लगभग पूरे द्वीप जलमग्न हो गए और बह गए।
सूनामी के बाद, चैरिटी संगठन जो क्षेत्रीय आतंकवादी समूहों के मुखौटे थे, वो मालदीव पहुंचे और प्रभावित आबादी के बीच मानवीय सहायता और वित्तीय सहायता वितरित करना शुरू कर दिया। इसी दौरान मदद के नाम पर कट्टरपंथी मौलानाओं ने मालदीव के लोगों के मन में कट्टरपंथ का बीज बोया और फिर मालदीव के समाज में मजहबी कट्टरपंथ भर गया और इसी के साथ मालदीव में एंटी-इंडिया एजेंडे का भी विस्तार हुआ।
आईकेके जमात-उद-दावा (जो तबलीगी यानी सक्रिय धर्मांतरण में लगा हुआ है), वो और उससे भी ज्यादा खतरनाक लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी), जो भारत में कई हमलों के लिए जिम्मेदार है, उसने मालदीव में कई चैरिटी संगठन चलाए और इसने मालदीव के समाज में कट्टरपंथ का जहर भरा।
हसन अमीर ने चेतावनी देते हुए लिखा है, कि मालदीव को ऐसी ताकतों से मुक्त कराना बेहद जरूरी है, नहीं तो ये द्वीप देश आतंकवाद का गढ़ बन सकता है।












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