अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़ने से तालिबान के हाथ लगी कितनी सैन्य संपत्ति ? जानिए
काबुल, 21 मई: तालिबान के आतंकवादियों ने 20 साल तक अमेरिका के साथ चले सबसे लंबे युद्ध में अफगान सेना के साथ-साथ दुनिया की सबसे ताकतवर सेना को भी नाकाम किया है। नवंबर, 2001 में जब अमेरिका ने तालिबान को काबुल से बेदखल किया था तो वह महज सात साल का था और अफगानिस्तान पर पांच साल से हुकूमत कर रहा था। लेकिन, अब उसने अपने से कई गुना शक्तिशाली उस अफगान सेना को घुटनों पर ला दिया, जिसकी ट्रेनिंग और उपकरणों पर अमेरिका ने 800 करोड़ डॉलर खर्च किए थे। सवाल है कि इन 20 वर्षों में तालिबान के पास इतने बड़े संघर्ष के लिए पैसा कहां से आया, जबकि उसके पास सीमित संसाधन थे; और अमेरिका के जाने के बाद उसे वहां कितना बड़ा खजाना हाथ लगा है?

तालिबान की आय का मुख्य स्रोत क्या है ?
2020 के मई में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) ने जो अनुमान जाहिर किया था, उसके मुताबिक तालिबान की सालाना आमदनी 30 करोड़ डॉलर से लेकर करीब 150 करोड़ डॉलर के बीच थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि 2019 में इसकी आमदनी घटी थी, लेकिन यूएनएससी के मुताबिक तालिबान ने अपने संसाधनों को प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया, इसलिए उसे पैसों की तंगी नहीं झेलनी पड़ी। रिपोर्ट से मुताबिक बीते 20 वर्षों में उसकी आय का मुख्य स्रोत नशीली दवाओं का व्यापार रहा है। यूएन की रिपोर्ट के अनुसार हाल के वर्षों में उसकी आमदनी इसलिए घटी है, क्योंकि अफीम की खेती में गिरावट आई है। जबकि, हेरोइन की खेती वर्षों तक इसकी कमाई का मुख्य जरिया रही है।
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अफीम की तस्करी और उगाही का नेटवर्क
बीते कुछ वर्षों में अफगानिस्तान में मिथैम्फेटामाइन के उत्पादन शुरू होने से नशीली दवा को एक नया उद्योग मिला है, जिसमें प्रॉफिट मार्जिन काफी ज्यादा है। यह इसलिए हेरोइन के मुकाबले फायदे का सौदा है, क्योंकि इसके लिए सस्ती सामग्री चाहिए और इसे तैयार करने के लिए बड़े तामझाम की भी जरूरत भी नहीं है। यूएन रिपोर्ट के मुताबिक मिथैम्फेटामाइन के 60 फीसदी प्रयोगशालाओं पर तालिबान का नियंत्रण है और फराह और निमरुज इसके प्रमुख उत्पादक प्रांत हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान से सटे सीमावर्ती जिलों में तालिबान का हेरोइन तस्करी और वसूली एक बहुत बड़ा नेटवर्क रहा है। यहां प्रति किलो हेरोइन की तस्करी के लिए तालिबान कमांडरों को करीब 1.30 डॉलर का टैक्स देना होता है। इसके लिए तालिबान कमांडर बाकायदा भुगतान की पर्ची देते हैं। पिछले साल जारी यूएनओडीसी की रिपोर्ट के मुताबिक बीते पांच साल में दुनिया की 84 अफीम अफगानिस्तान में उत्पादित हुई। यहां से पड़ोसी मुल्कों के अलावा, यूरोप, मध्य एशिया, दक्षिण एशिया, अफ्रीका और कनाडा तक में इसकी सप्लाई होती रही है।

ड्रग्स के अलावा तालिबान का काला कारोबार
नाटो की ओर से तैयार एक गोपनीय रिपोर्ट के बारे में पिछले साल सितंबर में रेडियो फ्री यूरोप ने जो जानकारी दी थी, उसके मुताबिक तालिबान जल्द ही फाइनेंशियल और मिलिट्री तौर पर आत्मनिर्भर होने की स्थिति में आ चुका था। इसके तहत इसने नशीली दवाओं के अवैध कारोबार के अलावा गैर-कानूनी माइनिंग और निर्यात से भी बहुत बड़ी मात्रा में धन जुटाने शुरू कर दिए थे। मार्च, 2020 में खत्म हुए साल में इसने अपने आतंकी अभियानों से 160 करोड़ डॉलर जुटाए थे। इनमें 41.6 करोड़ डॉलर नशीली दवा से, 45 करोड़ डॉलर आयरल ओर, मार्बल, कॉपर, सोना, जिंक और दुर्लभ धातुओं से जुटाए गए थे। इसके अलावा अपने नियंत्रण वाले हाइवे से उगाही करके इसने 16 करोड़ डॉलर प्राप्त किए थे। यही नहीं उसे 24 करोड़ डॉलर की आर्थिक सहायता भी मिली थी, जिसमें ज्यादातर पाकिस्तान और खाड़ी के देशों से मिले। इस दौरान इसने 24 करोड़ डॉलर के बराबर कंज्यूमर गूड्स का आयात-निर्यात भी किया। रिपोर्ट के मुताबिक तालिबान ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान में करीब 8 करोड़ डॉलर की प्रॉपर्टी भी बना रखी है।

तालिबान ने कहां से जुटाए इतने हथियार ?
दुनियाभर के कई बड़े पत्रकारों ने बार-बार रिपोर्ट दी है कि तालिबान को आईएसआई और पाकिस्तानी सेना का सीधा समर्थन है और हक्कानी नेटवर्क से भी इसने साठगांठ कर रखी है। हक्कानी नेटवर्क एक इस्लामी माफिया है, जो पाकिस्तान और अफगानिस्तान के आदिवासी बहुल इलाकों से अपना नेटवर्क चलाता है। इसके अलावा इसके आतंकियों को कट्टर धार्मिक संगठनों और खाड़ी देशों और पाकिस्तान से सहयोग मिलता रहा है। 2017 में बीबीसी ने अफगान आर्मी चीफ के हवाले से बताया था कि ईरान भी तालिबान को सैन्य हथियार उपलब्ध करवा रहा है। 2019 में अमेरिकी खुफिया एजेंसी की एक रिपोर्ट में भी दावा किया गया था कि अफगानिस्तान में अमेरिका और पश्चिम के दबदबे के विरोध में ईरान हथियारों, ट्रेनिंग और फंडिंग से उसकी मदद कर रहा है। 2013 में एक अमेरिकी वॉचडॉग ने भी पाया था कि अमेरिका ने अफगानिस्तान को जो हथियार दिए हैं, उनमें से 43 फीसदी का हिसाब नहीं मिल रहा है। इसमें आशंका जाहिर की गई थी कि ये हथियार तालिबान के हाथ पहुंच रहे हैं।

अमेरिका के जाने से तालिबान को मिली कितनी सैन्य संपत्ति ?
काबुल पर तालिबान के कब्जे के दो दिन बाद व्हाइट हाउस के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर जेक सुलिवन ने कहा, 'हमारे पास पूरी तस्वीर नहीं है, निश्चित तौर पर कह सकें कि प्रत्येक रक्षा सामग्री कहां गए, लेकिन इतना जरूर है कि काफी मात्रा में यह तालिबान के हाथ लग गए हैं।' आधुनिक हथियारों और सैन्य रणनीतियों के विशेषज्ञ स्टिंज मित्जर और जूस्ट ओलीमींस के मुताबिक बड़ी संख्या में हथियार तालिबान को मिल चुके हैं। उनका कहना है कि तालिबान के पास अब दो लड़ाकू जेट, 24 हेलीकॉप्टर और 7 बोइंग इंसीटु स्कैनईगल अनमैन्ड व्हीकल हैं,जो कि पहले अफगान सेना के पास थे। उनके अनुसार इसके अलावा इस साल जून से लेकर 14 अगस्त तक तालिबान ने 12 टैंक, 51 सैन्य लड़ाकू बख्तरबंद वाहन, 61 आर्टिलरी और मोर्टार, 8 एंटी-एयरक्राफ्ट गन्स और 1980 ट्रक, जीप और वाहन हासिल कर लिए हैं। ऊपर से यह भी सच्चाई है कि पूरी अफगान सेना और उसके संसाधनों पर उसका कब्जा हो चुका है, जिसके चलते तालिबान अब इतना ताकतवर बन चुका है, जितना पहले कभी नहीं रहा। कुल मिलाकर तस्वीर बिल्कुल ही साफ नहीं कि तालिबान के हाथ आज कितनी अमेरिकी सैन्य संपत्ति हाथ लग चुकी है? हो सकता है कि एक्सपर्ट आने वाले वक्त में कुछ और साफ आंकड़ों के साथ सामने आएं।












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