सद्दाम हुसैन के 'गुप्त हथियारों की तलाश' कैसे अधूरी रह गई?
Iraq हमले के बीस साल बाद "सामूहिक विनाश के हथियार" के अस्तित्व पर अब तक विवाद है. इस हथियार कार्यक्रम की वजह से ब्रिटेन को इस हमले से भाग लेने की वजह मिली.
इराक़ हमले के बीस साल बाद "सामूहिक विनाश के हथियार" के अस्तित्व पर अब तक विवाद है. इस हथियार कार्यक्रम की वजह से ब्रिटेन को इस हमले से भाग लेने की वजह मिली.
सामूहिक विनाश के हथियार की खोज के बारे में नए डिटेल्स बीबीसी की एक सिरीज़ 'शॉक एंड वॉर: इराक 20 ईयर्स ऑन' के हिस्से के रूप में सामने आए हैं. ये सिरीज़ इराक़ के "सामूहिक विनाश के हथियार" की खोज में प्रत्यक्ष रूप से शामिल दर्जनों लोगों के साथ बातचीत पर आधारित है.
एमआई6 के वरिष्ठ अफ़सर से जब साल 2001 के आख़िरी महीने में ये बताया गया कि अमेरिका इराक़ से जंग को लेकर गंभीर है, तब वो चौंक गए.
इस घटना को याद करते हुए अमेरिकी खुफ़िया विभाग सीआईए के इराक़ ऑपरेशन ग्रुप प्रमुख लुइस रुएडा कहते हैं, "मुझे लगा कि उन्हें वहीं टेबल के पास बैठे-बैठे हार्ट अटैक आ जाएगा. अगर वो कोई सभ्य इंसान न होते तो वो आकर मुझे थप्पड़ मार देते."
ये ख़बर ज़ल्द ही ब्रिटेन के टेन डाउनिंग स्ट्रीट (प्रधानमंत्री आवास) पहुंच गई जो कि राजनयिकों के बजाए जासूसों द्वारा पहुंचाई गई होगी.
उस वक़्त एमआई6 के प्रमुख सर रिचर्ड डियरलव ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि वो सबसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को इराक़ हमले के बारे में बताया था.
वो कहते हैं, "मैंने प्रधानमंत्री से कहा कि आप चाहे ये पसंद करें या न करें, लेकिन अब आप तैयारी कर लें क्योंकि ऐसा लग रहा है कि वे (अमेरिका) हमले की तैयारी कर रहे हैं."
ब्रिटेन की विदेशी ख़ुफ़िया एजेंसी एमआई6 अपने इतिहास के सबसे विवादास्पद और बुरी तरह से उलझाने वाले प्रकरण में शामिल होने वाली थी.
अमेरिका के लिए सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने का मुद्दा सामूहिक विनाश के हथियार के मुद्दे से ज़्यादा अहम था.
रुएडा कहते हैं, "अगर सद्दाम हुसैन के पास रबर बैंड और पेपरक्लिप होता तो हम इराक़ पर हमला कर देते."
ब्रिटेन के लिए इराक़ के रासायनिक, जैविक और परमाणु हथियारों से ख़तरा था.
कभी-कभी यह भी आरोप लगाया गया कि यूके की सरकार ने "सामूहिक विनाश के हथियार" के बारे में दावा किया है. लेकिन उस समय के मंत्रियों का कहना है कि उन्हें उनके अपने जासूसों ने बताया था कि हथियार मौजूद हैं.
पूर्व प्रधानमंत्री सर टोनी ब्लेयर ने मुझे बताया, "मुझे जो ख़ुफ़िया जानकारी मिल रही थी, उसे समझना वास्तव में महत्वपूर्ण है. जिस पर मैं भरोसा कर रहा था, मुझे लगता है कि मैं उसका हक़दार था."
आक्रमण की पूर्व संध्या पर उनका कहना है कि उन्होंने संयुक्त खुफ़िया समिति से आश्वासन मांगा था. वह ग़लत होने के लिए खु़फ़िया एजेंसी की आलोचना करने से इनकार करते हैं.
बाकी मंत्रियों ने कहा कि उन्हें उस वक़्त इसका शक़ था.
तत्कालीन विदेश मंत्री जैक स्ट्रॉ कहते हैं, "तीन आयोजनों पर मैंने रिचर्ड डियरलव से सवाल किया और इस इंटेलिजेंस के सूत्र के बारे में पूछा."
"मुझे इस बारे में एक बेचैनी सी महसूस हो रही थी. लेकिन डियरलव ने मुझे हर मौके पर आश्वासन दिया कि एजेंट विश्वसनीय हैं."
हालांकि जैक स्ट्रॉ कहते हैं कि नेताओं को इसकी ज़िम्मेदारी लेनी थी, आख़िर अंतिम फ़ैसला तो वही लेते थे.
जब बीबीसी ने उनसे पूछा कि क्या वो इराक़ को इंटेलिजेंस की नाक़ामी के तौर पर देखते हैं. इसका जवाब उन्होंने ना में दिया.
वे अब भी मानते हैं कि इराक़ में हथियार थे और शायद उन्हें छुपाकर सीरिया भेज दिया गया था.
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सद्दाम हुसैन के पास सामूहिक विनाश के हथियार?
ब्रिटेन के तत्कालीन सुरक्षा और खुफ़िया कोऑर्डिनेटर सर डेविड ओमंड कहते हैं, "यह एक बड़ी विफलता थी."
उनका कहना है कि ऐसी जानकारी जो इस विचार का समर्थन करती थी कि सद्दाम हुसैन के पास सामूहिक विनाश के हथियार हैं, बस उस पर ही सरकारी विशेषज्ञों का ध्यान खींचा गया, जो विचार इसका समर्थन नहीं करते थे उसे तटस्थ कर दिया गया.
एमआई6 के अंदर कुछ लोगों का कहना है कि उन्हें भी इसकी चिंता थी.
इराक़ में काम करने वाले एक अधिकारी गुमनाम रहने की शर्त पर कहते हैं, "उस समय मुझे लगा कि हम जो कर रहे थे वह ग़लत था."
एक पुराने अफ़सर साल 2002 की बात करते हुए कहते हैं, "किसी भी तरह की नई या विश्वसनीय ख़ुफ़िया जानकारी या मूल्यांकन नहीं थी, जिससे ये अनुमान लगाया जा सके कि इराक़ ने सामूहिक विनाश के हथियारों की योजना को फिर से शुरू कर दिया है और इससे ख़तरा पैदा हो गया है."
"मुझे लगता है कि सरकार के नज़रिए से यह अकेली ऐसी बात थी जिसके ज़रिए वो इराक़ के सामूहिक विनाश के हथियार के मुद्दे की वैधता साबित कर सकते थे."
2002 के वसंत में मौजूदा खुफ़िया जानकारी विचित्र थी. लंबे समय तक एमआई6 के लिए काम करने वाले एजेंट को इराक़ में सामूहिक विनाश के हथियारों की बहुत कम जानकारी थी या नहीं थी.
इस मामले को मज़बूत करने के लिए नए सूत्रों से ताज़ा ख़ुफ़िया जानकारी जुटाई जा रही थी. ये तब हो रहा था जब सितंबर 2002 में डोज़ियर की योजना बनाई गई थी.
ख़ुफ़िया विभाग के एक सूत्र, एक मैसेज को डिकोड करने की बात याद करते हैं. उस मैसेज में कहा गया था कि ख़ुफ़िया एजेंसी की भूमिका ब्रिटिश जनता को इराक़ पर कार्रवाई करने के लिए राज़ी करने से ज़्यादा नहीं थी.
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मोबाइल लैब का विकास
12 सितंबर 2002 की तारीख़ को सर रिचर्ड डियरलव डाउनिंग स्ट्रीट में एक नए सोर्स की ख़बर लेकर आए . इस नए सोर्स ने बताया कि सद्दाम हुसैन ने हथियार प्रोग्राम को फिर से शुरू कर दिया है और सूत्र ने ज़ल्द ही नए डिटेल्स देने का वादा किया.
भले ही इस स्रोत की पूरी तरह से जांच नहीं हुई और उनकी जानकारी विशेषज्ञों से साझा नहीं की गई, लेकिन इसके डिटेल्स प्रधानमंत्री को सौंपे गए थे.
सर रिचर्ड इन आरोपों को ख़ारिज़ करते हैं वे टेन डाउनिंग स्ट्रीट (प्रधानमंत्री) के काफ़ी क़रीब आ गए थे.
आने वाले महीने में नए सूत्र ने कोई सबूत नहीं दिए और अंत में ये माना गया कि उसके पास कोई सबूत नहीं थे.
संभावना थी कि ये कुछ ऐसे सूत्र थे जो जानकारी के बदले पैसे कमाना चाहते थे या फिर सद्दाम हुसैन को इराक़ से उखाड़ फेंकना चाहते थे.
सर रिचर्ड कहते हैं, ''जनवरी 2003 में मैं जॉर्डन में सद्दाम की खुफ़िया सेवा के एक शख़्स से मिला जो उनके ख़िलाफ़ हो गया था. उसने दावा किया कि अमेरिका की नज़रों से दूर वो जैविक हथियारों पर काम करने के लिए मोबाइल लैब के विकास में शामिल है.''
इस शख़्स के दावों के कारण ही अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री कोलिन पॉवेल ने संयुक्त राष्ट्र में इस मुद्दे को उठाया. हालांकि इसके तुरंत बाद अमेरिकी सरकार ने एक यह कहते हुए एक 'नोटिस' जारी किया कि इस जानकारी पर भरोसा नहीं किया जा सकता.
'कर्वबॉल' कोडनेम वाले एक दूसरे सोर्स जिस पर अमेरिका और ब्रिटेन की सरकार भरोसा कर रही थी वह भी लैब की जानकारी दे रहा था.
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जनसंहार के हथियारों की जांच
2003 के युद्ध से कुछ हफ़्ते पहले मैंने उत्तरी इराक़ के हलब्ज़ा गांव का दौरा किया और स्थानीय लोगों से 1988 के उस दिन के बारे में बात करते सुना जब सद्दाम हुसैन की सेना ने उन पर रासायनिक हथियार गिराए थे.
बाद में इराक़ के शीर्ष वैज्ञानिकों में से एक ने मुझे बताया कि सद्दाम ने 1990 के दशक की शुरुआत में संयुक्त राष्ट्र के हथियार इंस्पेक्टर से क्लीन चीट पाने की उम्मीद में ज़्यादातर जनसंहार के हथियार प्रोगाम को नष्ट करने का आदेश दिया था.
वैज्ञानिक ने बताया कि इराक़ी नेता ने बाद में शायद इस प्रोगाम को फिर से शुरू कर दिया होगा. लेकिन इराक़ ने गुप्त तरीके से सब नष्ट कर दिया था. इराक़ इस झांसे को बनाए रखने के लिए ऐसा कर रहा था ताकि ये संदेश जाए कि अभी इराक़ के पास ऐसा कुछ है जो वो पड़ोसी देश ईरान के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर सकता है.
इसलिए बाद में जब इराक़ से सब कुछ नष्ट करने का सबूत मांगा गया तब वो ऐसा नहीं कर सका.
2002 के आख़िर में संयुक्त राष्ट्र इंस्पेक्टर जनसंहार के हथियारों की जांच के लिए वापस इराक़ आए थे. उनमें से कुछ ने बीबीसी को बताया कि वे उन साइटों को याद कर सकते हैं जहां पश्चिम की सुझाई गई मोबाइल लैब्स के ख़ुफ़िया संयंत्र होने के अनुमान थे.
जनवरी 2003 में सर रिचर्ड से टोनी ब्लेयर ने मज़ाक के अंदाज में कहा कि ''मेरा भविष्य तुम्हारे हाथ में है क्योंकि जनसंहार के हथियार के सबूत खोजने का दबाव बढ़ रहा है.''
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सर रिचर्ड याद करते हैं,"यह उस समय निराशाजनक था."
सर रिचर्ड संयुक्त राष्ट्र के हथियार इंस्पेक्टर पर "अक्षम" होने का आरोप लगाते हैं.
संयुक्त राष्ट्र के रासायनिक और जैविक निरीक्षणों का नेतृत्व करने वाले हैंस ब्लिक्स बीबीसी को बताते हैं कि 2003 की शुरुआत तक उनका भी मानना था कि हथियार थे. लेकिन गुप्त सूचना मिलने के बाद उनके अस्तित्व पर संदेह होने लगा. उन्हें सबूत के लिए कुछ और समय चाहिए था, लेकिन उन्हें नहीं मिल सका.
एक पूर्व एमआई6 अधिकारी युद्ध के बाद के सूत्र की आंतरिक समीक्षा को याद करते हुए कहते हैं, 'मार्च 2003 तक किसी गंभीर सबूत के न मिलने पर युद्ध नहीं रुक सकता था और उसके बाद जनसंहार का कोई हथियार नहीं मिला और सब बिखर गया.'
ये बात जासूसों और राजनेताओं दोनों के लिए गहरे और स्थायी परिणाम देने वाली थी.
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