Explainer: इस्लाम की नली से लोकतंत्र निकालने की कोशिश! भारत के एक और पड़ोस को तबाह कर रहा अमेरिका
US-Bnagladesh News: जब लोकतंत्र की बात आती है, तो संयुक्त राज्य अमेरिका अक्सर एक झुके हुए प्रेमी की तरह व्यवहार करता है। यह इस धारणा से जुनूनी रूप से प्यार करता है, और जब ठुकरा दिया जाता है, तो वह पागल हो जाता है। अमेरिका लोकतंत्र से इस कदर प्रेम करता है, कि वो लोकतंत्र को लागू करवाने के लिए लोकतांत्रिक तरीकों को ही कुचल डालता है और यही वो बांग्लादेश में करता है।
अमेरिका का लोकतांत्र ये है, कि वो असहमति में विश्वास नहीं करता है और उसका मानना है, कि वो जो नियम तय करे, उसे ही दुनिया लोकतंत्र माने, लिहाजा अमेरिका का लोकतंत्र लागू करवाना दुनिया के लिए विनाशकारी साबित हुआ है। अमेरिका ने देशों में लोकतंत्र की रक्षा के लिए उसकी संप्रभुता को कुचला, हमले किए, लाखों बेगुनाहों को मार डाला, कई देशों को तबाह कर डाला, लेकिन उस तबाही के मलबों से भी वो लोकतंत्र की आवाज देता रहा और वही वो आजकर बांग्लादेश में कर रहा है।

इस वक्त जब बांग्लादेश अगले महीने की शुरुआत में चुनाव के लिए तैयार खड़ा है, तो 'लोकतंत्र-निर्यातक' अमेरिका फिर से जोश में आ गया है। वो शेख हसीना सरकार को "स्वतंत्र और निष्पक्ष" चुनाव कराने के लिए डरा रहे हैं, मजबूर कर रहे हैं और यहां तक कि, कि अमेरिका उस इस्लामिक विचारधारा का भी समर्थन कर रहा है, जिस विचारधारा के खिलाफ उसने अफगानिस्तान में हमला किया था।
बांग्लादेश की मुख्य विपक्षी पार्टी खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनल पार्टी (बीएनपी) ने कहा है, कि वह चुनाव तभी लड़ेगी, जब चुनाव से पहले एक तटस्थ कार्यवाहक सरकार स्थापित होगी।
और अमेरिका इसका समर्थन कर रहा है।
अमेरिका के नेतृत्व वाला पश्चिम, एक गैंग बनाकर बांग्लादेश सरकार पर 'स्वतंत्र और निष्पक्ष' चुनाव कराने के लिए 'विश्वसनीय' मशीनरी स्थापित करने के लिए दबाव डाल रहा है। इसने देश में लोकतंत्र के उच्च मानकों को बनाए रखने में विफल रहने के लिए हसीना सरकार पर स्पष्ट रूप से अपनी नाराजगी व्यक्त की है। यहां तक कि कार्यवाहक सरकार की स्थापना की मांग को लेकर 28 अक्टूबर 2023 को बांग्लादेशी सड़कों पर बीएनपी के गुंडों द्वारा की गई हिंसा को भी सराहा है।
किसी भी देश को, दुनिया भर में लोकतंत्र के प्रसार की कामना करने का पूरा अधिकार है। लेकिन लोकतंत्र के अमेरिकी विचार को इस्लामी बंदूक की नली से विकसित होते देखना विचित्र है। यह वैचारिक द्वंद्व तब और साफ हो जाता है, जब हाल ही में अमेरिकी दूतावास के एक शीर्ष अधिकारी ने बांग्लादेश में लोकतंत्र को मजबूत करने की मांग करते हुए ढाका में जमात-ए-इस्लामी के एक प्रमुख नेता से मुलाकात की।
जमात-ए-इस्लामी वो संगठन है, जो खुलेआम बांग्लादेश के इस्लामीकरण की वकालत करती है और शरिया लागू करने की मांग करती है। इसकी योजना में अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए कोई जगह नहीं है। जमात-ए-इस्लामी की वही विचारधारा है, जो तालिबान की है, जिसपर अमेरिका ने प्रतिबंध लगा रखे हैं।
संयोग से, बांग्लादेशी सुप्रीम कोर्ट ने 19 नवंबर 2023 को जमात-ए-इस्लामी की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें 2013 के फैसले को पलटने की मांग की गई थी, जिसने इस्लामी संगठन को धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन करने के लिए चुनाव में भाग लेने से रोक दिया था।
लेकिन, अमेरिका इतना लोकतांत्रिक है, कि वो किसी देश के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी सम्मान करने की परवाह नहीं है। क्योंकि, फैसला उसकी मर्जी के खिलाफ है, लिहाजा अमेरिका की नजर में बांग्लादेशी सुप्रीम कोर्ट भी गलत है।
अमेरिका, बांग्लादेश की शीर्ष अदालत के फैसले का सम्मान करने और शेख हसीना सरकार का समर्थन करने के बजाय, (जो बांग्लादेश में लोकतंत्र को जिंदा रखने की एकमात्र उम्मीद हैं और कट्टरपंथी इस्लामी ताकतों से सख्ती से निपट रही है) अवामी लीग सरकार को परिणाम भुगतने की धमकी भी दी है, जिसमें "स्वतंत्र और निष्पक्ष" चुनावों को कमजोर करने की कोशिश करने वालों पर वीजा प्रतिबंध लगाना भी शामिल है।
अमेरिका चाहता है, कि शेख हसीना की सरकार का पतन हो, पाकिस्तान परस्त खालिदा जिया सत्ता में आए और बम धमाकों के आरोपी जमात-ए-इस्लामी को सरकार में भागीदारी मिले। कुल मिलाकर, भारत का एक और पड़ोसी देश अशांति की आग में जलने लगे।

अमेरिका के अलोकतांत्रिक कदमों को देखिए
बांग्लादेश में अमेरिकी राजदूत पीटर हास ने एक कदम और आगे बढ़कर देश के मुख्य चुनाव आयुक्त काजी हबीबुल अवल से मुलाकात की। लिहाजा, सवाल ये उठ रहे हैं, कि क्या ऐसा करके अमेरिका ने एक देश की संप्रुभता का उल्लंघन नहीं किया है? लेकिन, चौधरी अमेरिका इसे लोकतंत्र मानता है।
हास ने कहा, "कोई भी कार्रवाई जो लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया को कमजोर करती है - जिसमें हिंसा भी शामिल है, लोगों को शांतिपूर्ण सभा और इंटरनेट के उपयोग के अधिकार का प्रयोग करने से रोकना - स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की क्षमता पर सवाल उठाता है।"
जो चीज़ पूरे पश्चिमी लोकतंत्र को हास्यास्पद बनाती है, अगर पूरी तरह से दुखद नहीं है, तो वह शेख हसीना का शासन रिकॉर्ड है, जिन्होंने प्रधान मंत्री के रूप में अपने दो दशकों के कार्यकाल के दौरान, "औसत वार्षिक जीडीपी वृद्धि के आधार पर, 170 मिलियन के अपने देश में महत्वपूर्ण गरीबी उन्मूलन की अध्यक्षता की है।"
यदि द इकोनॉमिस्ट (24 मई, 2023) पर विश्वास किया जाए, तो उस समय के ज्यादातर समय के लिए यह 7% था। शेख हसीना ने देश के भीतर इस्लामी ताकतों को हाशिये पर धकेलने में भी उल्लेखनीय काम किया है। यहां तक कि, बांग्लादेशी मामलों के एक विशेषज्ञ ने हाल ही में अपनी पुस्तक के विमोचन के दौरान कहा, कि उस देश में अल्पसंख्यकों का भाग्य मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है, कि शेख हसीना कितने समय तक सत्ता में रहती हैं।
लेकिन, अमेरिका बहादुर को ये मंजूर नहीं है। वो शेख हसीना को हटाना चाहता है, भले ही उसके बाद सत्ता में आने वाली ताकतें, देश के लोकतंत्र के साथ साथ अल्पसंख्यकों को ही क्यों ना कुचल दे।
लिहाजा, भारत को भरपूर सतर्क रहने की जरूरत है।
क्योंकि, शेख हसीना के हटने का मतलब है, खालिदा जिया का सत्ता में आना, यानि ढाका में चीन का आना और बांग्लादेश में चीन की मौजूदगी से भारत के लिए खतरनाक है। लेकिन, अमेरिका को इससे कोई मतलब नहीं है, लिहाजा भारत को बांग्लादेश के असली लोकतंत्र की रक्षा करनी होगी।
बांग्लादेश में इस्लामी शासन स्थापित करके चीनी प्रभाव को रोका नहीं जा सकता। और नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, मालदीव और पाकिस्तान के बाद भारत अपने एक और पड़ोस में चीन को मुस्कुराते नहीं देख सकता है। लिहाजा, भारत को अमेरिका की इस कोशिश को काउंटर करना जरूरी है।












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