पेरिस का वो 'नरसंहार' जिसे इतिहास के पन्नों में जगह नहीं मिली

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"यह चमत्कार ही था कि मुझे सीन में नहीं फेंका गया था."

अल्जीरिया होसीन हक़ीम उस समय सिर्फ़ 18 साल के थे जब वो नरसंहार हुआ था. इस नरसंहार के बारे में दुनिया को बहुत अधिक पता नहीं है. साठ साल पहले फ्रांस की राजधानी पेरिस में हुए इस भीषण नरसंहार में सैकड़ों लोग मारे गए थे.

उस दौरान क़रीब तीस हज़ार अल्जीरियाई कर्फ्यू के ख़िलाफ़ शांतपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे. वे उत्तरी अफ्रीका में फ्रांस के ख़िलाफ़ सात साल से चल रहे युद्ध को समाप्त कर आज़ादी की मांग कर रहे थे.

पुलिस ने प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाले कई प्रदर्शनकारियों को मार डाला. कुछ को सीन नदी में फेंक दिया गया. वो दिन फ्रांस के औपनिवेशिक इतिहास के सबसे बुरे अध्यायों में शामिल है.

उस समय हक़ीम सिर्फ़ 18 साल के थे. 60 साल पहले की उस घटना के बारे में ल ह्यूमैनिटे अख़बार को अपनी कहानी बताते हुए वो कई बार शांत हुए. उनके चेहरे पर कई तरह के भाव आ-जा रहे थे. हालांकि इस घटना के बारे में बहुत कम लोगों को ही पता है क्योंकि घटना के दौरान इसकी रिपोर्टिंग ना के बराबर ही हुई थी.

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हक़ीम इस ऑपरेशन के दौरान गिरफ़्तार हुए क़रीब 14000 अल्जीरियाई लोगों में से एक थे.

तत्कालीन सरकार ने न्यूज़ को सेंसर कर दिया था. कई आर्काइव्स को नष्ट कर दिया और पत्रकारों के कहानी की पड़ताल करने के लिए सख्त मना कर दिया.

उस दौरान छपने वाले समसामयिक बुलेटिन्स में सिर्फ़ तीन मौतों के बारे में लिखा गया जिसमें एक फ्रांसिसी नागरिक का भी ज़िक्र था.

अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इसे कहीं जगह नहीं दी.

ब्रिगिट लाएने पर्शियन आर्काइव्स में क्यूरेटर थे. उन्होंने बताया कि कुछ आधिकारिक दस्तावेज नष्ट होने से बच गए हैं जिससे उस दौरान होने वाली हत्याओं की संख्या पता चल सकता है.

वह कहते हैं, "वहाँ बहुत सारे शव थे. कुछ का सिर कुचला हुआ था तो किसी को बंदूक की गोली लगी हुई थी."

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एक तस्वीर भी है जिसमें डरे-सहमे लोगों की भावनाओं को कैद किया गया है.

इस तस्वीर में सीन नदी के तटबंध का एक हिस्सा गै. जिसमें भित्ति-चित्रों पर लिखा है- "यहाँ हम अल्जीरियाई लोगों को डुबोते हैं."

यह फ्रांसीसी इतिहासकार फैब्रिस राइसपुती की नई किताब का शीर्षक भी है. इस किसाब में लिखा गया है कि कैसे एक शख़्स ने (शोधकर्ता जीन-ल्यूक इनाउडी) ने उस दौरान हुए नरसंहार के 30 साल बाद प्रत्यक्षदर्शियों से साक्ष्य जमा किये.

https://www.facebook.com/watch/?v=618022529030005

मारे गए लोगों की सटीक संख्या की पुष्टि नहीं हो सकी है है लेकिन कुछ इतिहासकारों का दावा है कि उस दिन 200 से 300 अल्जीरियाई मारे गए थे.

इतिहासकारों का कहना है कि अगले दिन सीन नदी के तट पर कुल 110 शव बहकर आ लगे थे. कुछ को मारकर फेंका गया था तो कुछ को चोटिल अवस्था में ठंडे पानी ये सोचकर डाल दिया गया था कि डूबकर उनकी मौत हो जाएगी.

मरने वालों में सबसे कम उम्र की फ़ातिमा बेदा थीं. वह महज़ 15 साल की थीं. उनका शव 31 अक्टूबर को सीन नदी के पास एक नहर में मिला था.

अरब विरोधी नस्लवाद घटना के बारे में शुरुआती जानकारी देते हुए 1963 में लेखक विलियम गार्डनर स्मिथ ने अपने उपन्यास स्टोन फ़ेस में काफी कुछ लिखा था. लेकिन यह एक फ़िक्शन नॉवेल है और इसका कभी भी फ्रेंच में अनुवाद नहीं हुआ. यह उस समय के अरब-विरोधी नस्लवाद को दर्शाता है.

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कोई माफ़ी नहीं

पेरिस नरसंहार के संबंध में देश ने बहुत कम काम किया है.

2012 में फ्रांस्वा ओलांद ने माना था कि ऐसा हुआ था. यह पहला मौक़ा था जब किसी फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने ऐसा किया था.

इस नरसंहार की 60वीं बरसी पर राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने एक बयान में कहा - पुलिस प्रमुख के आदेश पर किये गए अपराधों की कोई क्षमा नहीं है.

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बावजूद इसके फ्रांस के राष्ट्रपति पीड़ितों की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे. साथ ही उन्होंने यह भी नहीं बताया कि उस नरसंहार में कितने लोग मारे गए थे और देश उस समय कहां था.

फ्रांसीसी वामपंथी दल उस समय विपक्ष में था. ताज्जुब की बात यह है कि वे भी इस नरसंहार की आलोचना करने के लिए आगे नहीं आए.

राइसपुती कहते हैं कि ऑपरेशन की नस्लवादी प्रकृति से इनक़ार नहीं किया जा सकता है. उस दौरान हर उस शख़्स को निशाना बनाया गया जो कहीं से भी अल्जीरियाई दिख रहा था.

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पेरिस में अल्जीरियाई लोगों के ख़िलाफ़ इस अभियान को अनौपचारिक रूप से "रैटननेड" कहा जाता था. जिसका अर्थ है- "चूहों का शिकार."

17 अक्टूबर के बाद कई दिनों बाद तक पुलिस अल्जीरियाई लोगों को तलाश करती रही.

कहा जाता है कि पुलिस के छापे से परेशान हो चले मोरक्कन लोगों को अपने दरवाज़े "मोरक्कन" चिन्ह लगाना पड़ा.

शोधकर्ताओं का दावा हैकि इस ऑपरेशन में सिर्फ़ पुलिस और सुरक्षा बलों ने हिस्सा नहीं लिया बल्कि अग्निशामक के कर्मी भी शामल थे.

हज़ारों लोगों को अवैध रूप से अल्जीरिया भेज दिया गया. जहां उन्हें फ्रांसीसी नागरिकता होने के बावजूद नजरबंद शिविरों में रखा गया था.

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प्रतिष्ठा का सवाल

उस समय राष्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल युद्ध को समाप्त करके, अल्जीरिया की स्वतंत्रता के लिए अल्जीरिया के नेशनल लिबरेशन फ्रंट (FLN) के साथ बातचीत की. पांच महीने बाद युद्ध समाप्त हो गया और जुलाई 1962 में स्वतंत्रता मिल गई.

लेकिन 1961 का दौर तनाव भरा था. पांच अक्टूबर को पेरिस के अधिकारियों ने सभी अल्जीरियाई लोगों को 20:00 और 05:30 के बीच घर छोड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया.

इस कर्फ़्यू के विरोध में अल्जीरियाई लोगों ने मार्च निकाला. आयोजकों ने इसे पूरी तरह शांत रखने का फ़ैसला किया था.

यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है कि उस दिन सुरक्षा बलों को आदेश क्या दिया गया था. लेकिन उस समय पेरिस पुलिस प्रमुख रहे मौरिस पापोन अपने व्यवहार के कारण कुख्यात थे.

इस घटना की आरंभिक पूछताछ की गई और कुल 60 दावों को ख़ारिज कर दिया गया.साथ ही किसी पर भी मुकदमा नहीं चलाया गया.

राइसपुती आशा करते हैं चाहे भले ही उस घटना के 60 साल हो गए लेकिन फ्रांस के इतिहास में यह दिन खूनी नरसंहार के सबसे काले दिन के तौर पर दर्ज हो गया औऱ इससे जिम्मेदारी निर्धारित करने के प्रयासों में मदद मिली.

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