चीन को सजा देने का ऐलान, विश्व की सात बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने बनाया 'महाप्लान'

गरीब देशों को काबू में करने के लिए चीन उन्हें आर्थिक तौर पर गुलाम बनाने की रणनीति पर काम करता है और गरीब देशों को ज्यादा दरों पर कर्ज देकर उन्हें एक तरह से बंधक बना लेता है।

लंदन, जून 13: चीन को सजा देने का ऐलान एक तरह से विश्व की सात बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने कर लिया है और यकीन मानिए आने वाले वक्त में आपको चीन का दर्द सुनाई देगा। क्योंकि, चीन की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी अर्थव्यवस्था है और अगर चीन की अर्थव्यवस्था पर चोट मारा जाए तो चीन घुटने के बल पर आ जाता है। लंदन में जी-7 देशों की बैठक चल रही है, जिसमें चीन के खिलाफ विश्व की सात बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने महाप्लान तैयार किया है। ये महाप्लान असल में चीन के खिलाफ व्यापारिक युद्ध का ऐलान है।

चीन की कमजोर नस पर बड़ा चोट

चीन की कमजोर नस पर बड़ा चोट

गरीब देशों को काबू में करने के लिए चीन उन्हें आर्थिक तौर पर गुलाम बनाने की रणनीति पर काम करता है और गरीब देशों को ज्यादा दरों पर कर्ज देकर उन्हें एक तरह से बंधक बना लेता है। लेकिन, चीन के इन्फ्रास्ट्रक्चर फंडिंग के जवाब में अमेरिका के नेतृत्व में एक बड़ी योजना का अनावरण किया गया है। इसमें विश्व की सात बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने तय किया है कि दुनिया के गरीब देशों में, जहां चीन अपना प्रभुत्व बनाने की कोशिश में जुटा हुआ है और जिन देशों को इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के नाम पर कर्ज दे रहा है, उन देशों में ज्यादा से ज्यादा निवेश किया जाएगा। इसका मकसद ये है कि अगर बड़ी कंपनियों ने छोटे देशों में निवेश करना शुरू किया तो बिना कर्ज लिए वो देश लोगों को रोजगार दे पाएंगे और इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास कर पाएंगे। आर्थिक मामलों के जानकार राजेश कुमार ने वन इंडिया से एक्सक्लूसिव बात करते हुए कहा कि 'चीन का निवेश नकारात्मक होता है और एक तरह से वो गरीब देशों की लीडरशिप को रिश्वत देकर खरीद लेता है और फिर गरीब देश चीन की मनमानी शर्तों को मान लेते हैं, लेकिन ऐसे देश अपनी गर्दन चीन के हाथों में दे देते हैं।'

चीन के बीआरआई प्रोजेक्ट पर चोट

चीन के बीआरआई प्रोजेक्ट पर चोट

ग्रुप ऑफ सेवन यानि जी7 की बैठक के दौरान मुख्य तौर पर चीन पर आर्थिक प्रहार करने की रणनीति बनाई गई है। जिसके तहत अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा कि अमेरिका चाहता है कि 'बिल्ड बैक बेटर वर्ल्ड' प्लान पर तेजी से काम किया जाए, ताकि चीनी प्रोजेक्ट्स की तुलना में समानांतर एक हाई क्वालिटी प्रोजेक्ट खड़ा हो सके। दरअसल, चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना यानि बीआरआई प्रोजेक्ट ने दुनिया के कई देशों में ट्रेनों, सड़कों और बंदरगाहों को बनाया है और उन्हें सुधारने का काम किया है। लेकिन, बीआरआई प्रोजेक्ट के जरिए चीन छोटे देशों को कर्ज के जाल में फंसा लेता है। जैसे चीन ने श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह हथिया लिया है, वहीं पाकिस्तान के सभी बड़े पार्क्स और एयरपोर्ट को चीन ने अपने कब्जे में ले लिया है। ऐसे में जी7 के नेताओं ने कहा कि वो एक पारदर्शी साझेदारी विकसित करना चाहते हैं, जिसकी गुणवत्ता उच्च मानकों पर खड़ा उतरे और कोई देश कर्ज के जाल में ना फंसे। आर्थिक मामलों के जानकार राजेश कुमार कहते हैं कि 'अमेरिका एक लोकतांत्रिक देश है और उसका निवेश भी लोकतांत्रिक होता है। आप अमेरिका के साथ अपनी शर्तों पर डील कर सकते हैं और अगर आपको घाटा हुआ है तो अमेरिका आपको मोहलत भी देने के लिए तैयार हो सकता है, लेकिन चीन के साथ ऐसा नहीं है। चीन का मकसद ही दरअसल व्यापार करना नहीं है, उसका मकसद ही छोटे छोटे देशों को बंधक बनाना है।'

चीन का पर कैसे कतरेगा अमेरिका ?

चीन का पर कैसे कतरेगा अमेरिका ?

जी 7 की बैठक में मुख्य तौर पर चीन की आलोचना की गई है वहीं चीन को रोकने के लिए एक विकल्प बनाने की भी बात की गई है। जी 7 की बैठक में कहा गया कि चीन जिस तरह से छोटे और विकासशील देशों में इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के नाम पर अरबों डॉलर खर्च कर रहा है और उन देशों को एक तरह से बंधक बना रहा है, वो काफी चिंता की बात है, जिसको लेकर पश्चिमी देशों को जल्द से जल्द कुछ सोचना चाहिए। लेकिन सवाल ये है कि चीन को रोकने की प्लानिंग तो की जा रही है लेकिन उसके लिए फंड कहां से आएगा? क्या यूरोपीय देश 'बिल्ड बैक बेटर वर्ल्ड' प्लान में पैसा लगाएंगे और अगर पैसा देंगे तो कितना देंगे? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब अभी ना ही यूरोपीयन देशों के पास है और ना ही अमेरिका के पास। हां, सभी देशों में आम सहमति इस बात पर है कि चीन को नहीं रोका गया तो वो आने वाले वक्त में विश्व के लिए सबसे बड़ी परेशानी बन जाएगा।

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