फ्रांस की AIP टेक्नोलॉजी क्या है, जिससे भारत करेगा विध्वंसक पनडुब्बियों का निर्माण, दोनों हाथों में लड्डू
हिंद महासागर में चीन लगातार अपने कदम बढ़ाने की कोशिश में है, वही चीन पाकिस्तान को भी ऐसे ही पनडुब्बियों की सप्लाई करने वाला है, लिहाजा भारत को अपनी शक्ति बढ़ाने की आवश्यकता काफी बढ़ गई है।

France India Sub-Marine Deal: भारत और फ्रांस पिछले कुछ सालों में काफी करीब आए हैं और भारत, फ्रांस से अपनी इस दोस्ती का भरपूर फायदा उठा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस और भारत ने कलवरी-श्रेणी की पनडुब्बियों को अपग्रेड करने के लिए एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक पर सहयोग करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिससे दोनों देशों के बीच बढ़ते रणनीतिक संबंध और गहरे हो गये हैं। भारत को एआईपी टेक्नोलॉजी मिलना, बहुत बड़ी मदद माना जा रहा है, क्योंकि इस टेक्नोलॉजी ने पानी के अंदर की क्षमता की सभी मापदंडों को बदल दिया है।

पनडुब्बी ताकतों का इजाफा करता भारत
एआईपी टेक्नोलॉजी, पारंपरिक पनडुब्बियों को भी पानी के अंदर कई-कई हफ्ते तक रहने की क्षमता प्रदान करता है, जो इसी क्षमता परमाणु संचालित पनडुब्बियों के काफी बराबर कर देता है। आम तौर पर पनडुब्बियों को कुछ दिनों तक पानी के अंदर रहने के बाद पानी की सतह पर आना पड़ता है, जो युद्ध की स्थिति में खतरा पैदा कर सकता है। जबकि, न्यूक्लियर पनडुब्बियां और एआईपी टेक्नोलॉजी से बनी पनडुब्बियां कई हफ्तों तक पानी के अंदर रह सकती हैं, लिहाजा अभी ये भारत समेत कई देशों की पसंद हैं। इस महीने, इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है, कि फ्रांस की नेवल ग्रुप और भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) ने फ्रांसीसी स्कॉर्पीन-श्रेणी की पनडुब्बियों के निर्माण के लिए एआईपी टेक्नोलॉजी विकसित करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।

भारत के दोनों हाथों में लड्डू
भारत के लिए फ्रांस के साथ हुई ये डील, दोनों हाथों में लड्डू होने जैसा है। ऐसा इसलिए, क्योंकि इन पनडुब्बियों का निर्माण भी भारत में ही होगा। यानि, भारत को एक तरह फ्रांस से नई टेक्नोलॉजी मिल रही है और दूसरी बात ये, कि ये पनडुब्बियां आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा देने के लिए होगी। रिपोर्ट डीआरडीओ के एक बयान का हवाला दिया गया है, जिसमें कहा गया है, कि डीआरडीओ नई सामग्री अनुसंधान प्रयोगशाला (एनएमआरएल) और नौसेना समूह के वरिष्ठ अधिकारियों ने आईएनएस कलवरी में भारत के स्वदेशी एआईपी को एकीकृत करने के विस्तृत डिजाइन तैयार करने के लिए सहयोग बढ़ाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। रिपोर्ट में AIP के प्रदर्शन के बारे में विशिष्टताओं का उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन यह कहा गया है, कि यह हाइड्रोजन को तरल रूप में संग्रहीत करने के बजाय ऑनबोर्ड उत्पन्न करने में माहिर होगा।

भारत को मिलेगी नई AIP प्रणाली
भारत की नई AIP प्रणाली, नौसेना समूह के फ्यूल सेल सेकेंड जेनरेशन (FC2G) मॉडल से प्राप्त होने की सबसे अधिक संभावना है, जो ऑक्सीडाइजर के रूप में तरल ऑक्सीजन और नाइट्रोजन का उपयोग करके हाइड्रोजन निकालने के लिए एक रिफॉर्मर में डीजल ईंधन को तोड़ता है। जब हाइड्रोजन को ऑक्सीजन के साथ मिलाया जाता है, तो यह पनडुब्बी की बैटरियों को चार्ज करने के लिए बिजली पैदा करता है और क्रैकिंग प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले पानी का उत्पादन करता है। एशिया टाइम्स ने भारत की 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू और पारंपरिक पनडुब्बी कार्यक्रमों में फ्रांस की सहायता पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें कहा गया है, कि फ्रांसीसी एयरोस्पेस कंपनी सफरान, भारत के डीआरडीओ के साथ मिलकर, भारत की 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के लिए जेट इंजन का सह-उत्पादन करने की योजना बना रही है। वहीं, भारत की कलवरी-श्रेणी की पनडुब्बियां फ्रांस के साथ 2005 में की गई टेक्नोलॉजी ट्रांसफर प्रोग्राम कार्यक्रम के तहत बनाई गई हैं।

भारत की महत्वाकांक्षाएं
हालांकि, फिर भी, भारत का कार्यक्रम अपनी महत्वाकांक्षाओं से पीछे है। जुलाई 2022 के एक लेख में, द प्रिंट ने बताया था, कि भारत को 2030 तक 24 पनडुब्बियां हासिल करने के अपने महत्वाकांक्षी कार्यक्रम में काफी मदद की जरूरत है, जिसमें 18 पारंपरिक और छह परमाणु-संचालित पनडुब्बियां शामिल हैं। वर्तमान में, भारत सिर्फ 16 पनडुब्बियों का ही संचालन करता है, जिसमें एक परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (एसएसबीएन) है, जबकि अभी तक भारत के पास कोई एआईपी पनडुब्बी नहीं है। हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी और पाकिस्तान के तेजी से आधुनिक होते जा रहे पनडुब्बी बेड़े को ध्यान में रखकर, भारत भी नए सिरे से पनडुब्बी अपग्रेडेशन योजना पर काम कर रहा है।
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हिंद महासागर पर गंभीर भारत
बेगलुरु में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज के सहायक प्रोफेसर प्रकाश पन्नीरसेल्वम ने हाल के एक लेख में लिखा है, कि हिंद महासागर, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी-नेवी (पीएलए-एन) के संचालन का एक आकर्षक क्षेत्र है, जो पश्चिमी प्रशांत की स्थितियों करे विपरीत है, जहां पीएलए-एन पनडुब्बियों के संचालन के लिए अमेरिका और जापानी नौसेना की भारी गश्ती के बीच अपेक्षाकृत सुरक्षित है। पन्नीरसेल्वम ने, जिबूती में चीन के नौसैनिक अड्डे का उल्लेख किया है, जो चीन की आक्रामकता को आसान बनाता है। उन्होंने हिंद महासागर में चीन के हाइड्रोग्राफिक और निगरानी जहाजों और पानी के नीचे के ड्रोन की बढ़ती उपस्थिति पर भी ध्यान दिया है और उनका सुझाव है, कि भविष्य में पनडुब्बी संचालन के लिए पानी के नीचे की सुविधाओं और मार्गों की मैपिंग की जानी चाहिए। उनका तर्क है, कि हिंद महासागर में चीन के बढ़ते कदम, इस क्षेत्र में भारत के प्रभाव क्षेत्र और भारत के स्पेशल इकोनॉमिक जोन (ईईजेड) में एक सुरक्षा जोखिम के लिए एक चुनौती पेश करते हैं, औऱ ये अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में भी भारतीय नौसैनिक सुविधाओं और जहाजों की जासूसी कर सकती हैं।

पाकिस्तान भी बढ़ा रहा है चुनौतियां
पाकिस्तान भी भारत के साथ अपनी सैन्य विषमता को ऑफसेट करने में मदद करने के लिए अपने पनडुब्बी बेड़े का महत्वपूर्ण आधुनिकीकरण कर रहा है। सेंटर फॉर इंटरनेशनल स्ट्रैटेजिक स्टडीज के अगस्त 2021 के लेख में, समरन अली ने नोट किया है, कि ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तानी नौसेना ने भारतीय नौसेना की तुलना में कम संख्या में जहाजों, पनडुब्बियों और विमानों का संचालन किया है और पाकिस्तान के पास भारत की तुलना में हिंद महासागर को नियंत्रित करने के लिए काफी कम संसाधन हैं। अली ने लिखा है, कि इस असमानता के लिए पाकिस्तान को भारतीय नौसेना को पाकिस्तान के समुद्र तट के करीब और हिंद महासागर और अरब सागर में अपने महत्वपूर्ण व्यापार मार्गों से दूर रखने के लिए एंटी-एक्सेस/एरिया (A2/AD) रणनीति को लागू करने की आवश्यकता है। वहीं, नेवल न्यूज ने दिसंबर में रिपोर्ट किया था, कि इस रणनीति के अनुरूप, पाकिस्तान ने चीन को आठ हैंगोर-श्रेणी की पारंपरिक पनडुब्बियों का आदेश दिया है, जो स्टर्लिंग इंजन से लैस चीन की 039A/041 युआन-श्रेणी की AIP पनडुब्बियां हैं, लिहाजा भारत को अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी, जिसमें फ्रांस काफी अहम योगदान दे रहा है।
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