अफगानिस्तान में हारकर अमेरिका की अकड़ पड़ी ढीली? चीन के साथ करने जा रहा है बड़ा समझौता?
जो बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के बाद पहली बार अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने चीन की सेना पीएलए के साथ बातचीत की है।
वॉशिंगटन, अगस्त 28: अफगानिस्तान में अमेरिका को वियतनाम के बाद सबसे बड़ी हार मिली है, अब इसमें किसी भी तरह का कोई शक नहीं है। अमेरिका ना सिर्फ अफगानिस्तान में काफी ज्यादा बेबस नजर आ रही है, बल्कि विश्व का सबसे शक्तिशाली राष्ट्रपति तालिबान के आगे कमजोर नजर आ रहे हैं। आतंकियों ने 'कहकर' काबुल एयरपोर्ट पर बम फोड़ा और एक बार फिर से काबुल एयरपोर्ट पर बड़े हमले का अलर्ट है। इस बीच खबर आ रही है कि जो बाइडेन प्रशासन ने पहली बार चीन की तरफ नरमी का हाथ बढ़ाया है और माना जा रहा है कि चीन के साथ अमेरिका कोई समझौता कर सकता है।

चीन की तरफ बड़ा कदम
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक जो बाइडेन के कार्यकाल में ऐसा पहली बार हुआ है जब अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने चीन की सेना पीएलए को फोन किया हो और काफी देर तक दोनों देशों के बीच बातचीत हुई है। इस बातचीत की पुष्टि अमेरिका के बड़े रक्षा अधिकारी ने कर दी है। पेंटागन के सीनियर अधिकारी ने कहा है कि चीन की सेना के साथ जो बाइडेन के सत्ता संभालने के बाद पहली बार बातचीत हुई है। 20 जनवरी को जो बाइडेन ने अमेरिकी राष्ट्रपति का पद संभाला था और अमेरिकी अधिकारी ने कहा है फोन पर हुई इस बातचीत का मकसद दोनों देशों के बीच 'रिस्क' को मैनेज करना था।

चीन पर रूख नरम या गरम?
इसी हफ्ते अमेरिका की उप-राष्ट्रपति जब एशिया के दौरे पर आईं थीं, तो उन्होंने चीन पर खुले शब्दों में हमला बोला था। सिंगापुर और वियतनाम दौरे के दौरान कमला हैरिस ने साउथ चायना सी का मुद्दा उठाया था और कहा था कि चीन खुलेआम समुद्री सुरक्षा का उल्लंघन कर रहा है और अमेरिका उन देश देशों के साथ है, जिनपर चीन जोर-आजमाईश करने की कोशिश कर रहा है। आपको बता दें कि साउथ चायना सी का करीब 90 फीसदी हिस्से को चीन अपना बताता है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय चीन के दावे को खारिज कर चुका है। मलेशिया, वियतनाम, सिंगापुर, ताइवान जैसे देश भी साउथ चायना सी पर अपना दावा ठोकते हैं और चीन लगातार इन देशों को धमकाता रहता है। चीन को काउंटर करने के लिए अमेरिका 'फ्री नेविगेशन कानून' और 'समुद्री सुरक्षा कानून' का हवाला देकर अकसर अपने जंगी जहाज साउथ चायना सी में भेजता रहता है। लेकिन, अब सवाल ये उठ रहे हैं कि अमेरिका आखिर चीन को लेकर चाहता क्या है?

बाइडेन की सबसे बड़ी परीक्षा
संयुक्त राज्य अमेरिका ने पिछले कई सालों से चीन को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के केंद्र में रखा है और राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन ने बीजिंग के साथ प्रतिद्वंद्विता को इस सदी की "सबसे बड़ी भू-राजनीतिक परीक्षा" बताया भी है। लेकिन, सवाल ये है कि ऐसे में पेंटागन ने पीएलए को फोन क्यों किया? चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच संबंध तेजी से तनावपूर्ण हो गए हैं, दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं ताइवान, मानवाधिकार और दक्षिण चीन सागर के मुद्दों पर लगातार टकरा रहे हैं।

डैमेज कंट्रोल की कोशिश?
माना जा रहा है कि चीन के साथ तनातवी और गरमागरम बयानबाजी के बावजूद अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने कई महीनों के बात चीन की सेना पीएलए के अधिकारियों के साथ टेलीफोन पर बातचीत की है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिका चाहता है कि वो हाल-फिलहाल के दिनों में चीन के साथ ना टकराए और दोनों देशों के बीच किसी तरह का कोई 'दुर्घटना' ना हो। चीन के रक्षा उप सहायक सचिव माइकल चेज ने पिछले हफ्ते चीनी मेजर जनरल हुआंग ज़ुएपिंग, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ऑफिस फॉर इंटरनेशनल मिलिट्री कोऑपरेशन के उप निदेशक के साथ बात की थी।

संकट और संभावित रिस्क पर बातचीत
अमेरिकी अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि, "अमेरिका और चीन के सैन्य अधिकारियों के बीच सुरक्षित वीडियो कॉन्फ्रेंस करने के लिए यूएस-पीआरसी डिफेंस टेलीफोन लिंक का इस्तेमाल किया।" अधिकारी ने कहा कि अमेरिकी अधिकारी चेज ने "संकट और जोखिम के प्रबंधन" पर चीन के साथ बातचीत की है। अधिकारियों ने कहा कि अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन ने अभी तक अपने चीनी समकक्ष के साथ बात नहीं की है, क्योंकि इस बात पर बहस चल रही थी कि कौन सा चीनी अधिकारी ऑस्टिन का समकक्ष था। उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने गुरुवार को कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका प्रतिस्पर्धा का स्वागत करता है और बीजिंग के साथ संघर्ष नहीं चाहता है, लेकिन दक्षिण चीन सागर में समुद्री विवाद जैसे मुद्दों पर अमेरिका बात करेगा।

चीन पर अमेरिकी प्रतिबंध
अमेरिका ने शिनजियांग में उइगर मुस्लिमों पर अत्याचार और हांगकांग में मानवाधिकार के उल्लंघन का हवाला देते हुए चीन पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हुए हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लगाए कई प्रतिबंधों को जो बाइडेन प्रशासन ने भी आगे बढ़ाया है। जहां डोनाल्ड ट्रंप अकेले ही चीन के साथ भिड़ गये थे और चीन के साथ व्यापारिक लड़ाई की शुरूआत कर दी थी, वहीं अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति ने अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर चीन का मुकाबला करने का प्लान बनाया है। लेकिन, एक्सपर्ट्स का कहना है कि अफगानिस्तान में बुरी तरह से हार और अपने सहयोगियों को 'विश्वास' में नहीं लेने के बाद अमेरिका बैकफुट पर है और फिलहाल चीन से टकराना नहीं चाहता है।

जो बाइडेन की तीखी आलोचना
आपको बता दें कि अफगानिस्तान मुद्दे को जो बाइडेन ने जिस तरह से हैंडल किया है, उससे पूरी दुनिया में उनकी भारी आलोचना हो रही है। पहली बार दुनिया के सामने अमेरिका का राष्ट्रपति असहाय और बेबस नजर आ रहे हैं। अमेरिका की धमकी पहली बार खोखली लग रही हैं। काबुल एयरपोर्ट पर भीषण हमले का बार बार अलर्ट आ रहा था, उसके बाद भी अमेरिका हमले को रोक नहीं पाया। कई अमेरिकी सैनिक मारे गये। 90 अफगानी नागरिक मारे गये। ये वो अफगानी नागरिक हैं, जिनमें से दर्जनों ने अमेरिका की अफगानिस्तान मिशन के दौरान मदद की थी, लिहाजा अमेरिका चाहता है कि किसी भी तरह से अफगानिस्तान मुद्दे को शांत किया जाए और तबतक चीन के साथ नहीं उलझा जाए।












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