अपनी नाकामी को छिपाने के लिए क्या राष्ट्रपति जिनपिंग ने भारत से जानबूझकर पंगा लिया?

क्या राष्ट्रपति शी जिनपिंग को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है ? क्या जिनपिंग को सत्ता खोने का डर सताने लगा है ? क्या वे सीमा पर भारत के साथ तनाव पैदा कर नाखुश लोगों में उग्र राष्ट्रवाद की भावना भड़काना चाहते हैं ताकि उनकी सत्ता सलामत रहे ? कोरोना की महामारी ने चीन की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया है। चीन में जिस नये सम्पन्न वर्ग का उदय हुआ है वह सरकार की नीतियों से नाखुश है। अब तो लोग सजा की परवाह किये बिना जिनपिंग के खिलाफ आवाज उठाने लगे हैं। हाल ही में जब चीन के कानून विशेषज्ञ जू जियोंग ने जिनपिंग का इस्तीफा मांगा तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। चीन की साम्यवादी तानाशाही में सरकार का विरोध अपराध है। इसके बाद भी अब चीनी राष्ट्रपति के खिलाफ लोग गुस्सा जाहिर करने लगे हैं। चीन की राजनीति में यह बिल्कुल नयी घटना है।
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सत्ता बचाने के लिए भारत से तनाव
कोई भी सरकार जब घरेलू मोर्चे पर फेल होने लगती है तो वह नाकामियों को छिपाने के लिए उग्र राष्ट्रवाद का सहारा लेती है। शी जिनपिंग भी यही कर रहे हैं। चीन के लोग भारत को अपना स्वभाविक प्रतिद्वंद्वी मानते हैं। दोनों देशों की सीमाएं मिलती हैं। प्राचीन काल से दोनों देशों के बीच संबंध रहा है। दोनों देशों में विशाल जनसंख्या है। जब से भारत ने आर्थिक, वैज्ञानिक और सामरिक प्रगति की है तब से वह चीन की आंखों में खटक रहा है। चीन के प्रसिद्ध लेखक गोर्डन चांग का मानना है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग को कोरोना की कीमत चुकानी पड़ेगी। पिछले कुछ वर्षों में चीन की आर्थिक तरक्की ने लोगों की उम्मीदों के पंख लगा दिये हैं। अगर जिनपिंग कोरोना के विनाशकारी प्रभावों से निबटने में नाकाम रहे तो उन्हें सत्ता गंवानी पड़ सकती है। चूंकि सारी सत्ता उन्हीं में समाहित है इसलिए उन्हें अकेले इसके नतीजे भुगतने होंगे। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में उन्हें अब चुनौती मिलने लगी है। वे सत्ता पर पकड़ मजबूत करने के लिए कोई जीत या उपलब्धि चाहते हैं। ऐसे में भारत उनके लिए आसान टारगेट है। वे लद्दाख में भारत की जमीन पर कब्ज कर चीनी लोगों में एक नया जोश भरना चाहते हैं।

भारत से डरता है चीन !
चीन पूर्वी लद्दाख में गलवान घाटी में भारतीय जमीन हड़प कर इसे जीत के रूप में पेश करना चाहता है। भारत के खिलाफ आक्रामक रुख अपना कर जिनपिंग जनता की नजर में हीरो बनना चाहते हैं। चीन अंदर ही अंदर भारत से डरता है। भारत ने हाल के वर्षों में बहुत तेजी से विकास किया है। परमाणु क्षमता से लैस भारत सामरिक रूप से भी बहुत मजबूत हुआ है। भारत की बढ़ती ताकत से चीन चिंता में है। चीन इसी डर को छिपाने के लिए भारत से सीमा पर झड़प कर रहा है। चीन को लग रहा है कि अगर अभी वह भारत को चोट नहीं पहुंचा पाएगा तो आने वाले वर्षों में यह काम और भी मुश्किल हो जाएगा। राष्ट्रपति जिनपिंग की सत्ता पर मजबूत पकड़ रही है। लेकिन कोरोना संकट, अमेरिका विवाद, औद्योगिक गिरावट ने उनकी स्थिति कमजोर बना दी है। उसलिए जिनपिंग को बार-बार चीन के सबसे बड़े नेता माओ त्से तुंग के नाम पर राजनीति करनी पड़ रही है। यह मौजूदा राष्ट्पति की कमजोरी का प्रमाण है। जिनपिंग खुद को माओ के बराबर समझते रहे हैं। वे माओ की तरह ही खुद को राजनिति विचारक भी मानते हैं। तभी 2019 में शी जिनपिंग के विचारों को चीन के संविधान में शामिल किया गया था।

चीन का धनिक वर्ग जिनपिंग के खिलाफ
शी जिनपिंग 2012 में चीन की सत्ता पर काबिज हुए थे। अब वे आजीवन राष्ट्रपति रहेंगे। फिर भी वे क्यों डरे हैं ? उनके कार्यकाल में चीन पूंजीवाद का सबसे बड़ा प्रतीक बनाया गया है। जिनपिंग ने केवल सत्ता पर एकाधिकार के लिए साम्यवाद का लबादा ओढ़ रखा है वर्ना वे तो अमेरिका और ब्रिटेन से भी बड़े पूंजीवादी हैं। माओ त्से तुंग ने साम्यवाद में जिस वर्गविहीन समाज की कल्पना की थी अब वह चीन में दिखायी नहीं पड़ता। जिनपिंग ने जिस तरह से आर्थिक ढांचा खड़ा किया उससे चीन एक बाजार में तब्दील हो गया। विदेशी पूंजी निवेश के लिए चीन के बंद दरवाजे खोल दिये गये। किफायती मजदूरी और कम लागते के कारण चीनी सामान सस्ता बिकने लगे। जैसे चीन विश्व व्यापर संगठन में आया चीनी माल दुनिया में छा गये। दुनिया के सप्लाई चेन पर चीन का दबदबा हो गय़ा। चीन में फ्री मार्केट के कारण जो आर्थिक समृद्धि आयी है उससे चीन में एक नया मध्यमवर्ग पैदा हुआ। इस वर्ग के पास ढेर सारा पैसा। ऐश्वयपूर्ण जीवन शैली है। अपने सुख-सुविधा पर दिल खोल कर खर्च भी करता है। इससे चीनी समाज में एक नयी विषमता पैदा हुई है। एक तरफ धनिकों का नया वर्ग है तो दूसरी तरफ मजदूरों और किसानों का परम्परागत तबका खड़ा है। हद तो ये है कि समतामूलक समाज की बात करने वाली साम्यवादी पार्टी भी बाजार की मांगों पर चलने के लिए मजबूर है। चीन का अमेरिका से मौजूदा व्यापार युद्ध इसी नतीजा का है। कोरोना संकट के बाद चीन का धनिक वर्ग जिनपिंग के खिलाफ हो गया है। इनकी पैठ साम्यवादी पार्टी तक में है जिससे मौजूदा राष्ट्रपति की चिंता बढ़ी हुई है।












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