Defence Budget 2026: ऑपरेशन सिंदूर के बाद क्यों है डिफेंस बजट बढ़ाने की जरूरत? भारत को खरीदने होंगे ये हथियार
Defence Budget 2026: भारत जब खुद को एक ग्लोबल पावर के रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो रक्षा क्षेत्र लंबे समय से चर्चा का केंद्र बना हुआ है। पिछले केंद्रीय बजट के बाद से निफ्टी डिफेंस इंडेक्स में 21% से ज्यादा की तेजी देखी गई है। इस उछाल के पीछे सरकार की 'मेक इन इंडिया' और आत्मनिर्भर नीति, साथ ही दुनिया भर में बढ़ते जियो पॉलिटिकल तनाव बड़ी वजह माने जा रहे हैं।
Budget 2025 में रक्षा को कितना मिला?
केंद्रीय बजट 2025 में भारत ने रक्षा क्षेत्र के लिए ₹6.81 लाख करोड़ का आवंटन किया था। यह पिछले साल के मुकाबले 9.5% की बढ़ोतरी थी। हालांकि, मौजूदा वैश्विक हालात और बढ़ते तनावों के बावजूद, इस बार डिफेंस बजट में कितनी बढ़ोतरी होगी-इस पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है।

सीमित लेकिन स्थिर बढ़ोतरी
मुंबई स्थित गेटवे हाउस में चीन और राष्ट्रीय सुरक्षा अध्ययन के एडजंक्ट डिस्टिंग्विश्ड फेलो, लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) एस.एल. नरसिम्हन का मानना है कि डिफेंस बजट में वृद्धि 7% से 12% के बीच रह सकती है। उन्होंने कहा कि बीते कुछ सालों में यही ट्रेंड देखने को मिला है।
पिछले 5 साल में कितना बढ़ा डिफेंस बजट?
रक्षा विश्लेषक संकेत कुलकर्णी भी नरसिम्हन की राय से सहमत हैं। उनके मुताबिक, भारत का रक्षा खर्च 2020 के बजट के बाद से 40% से ज्यादा बढ़ चुका है। पिछले पांच सालों में औसतन 9.2% सालाना बढ़ोतरी दर्ज की गई है। नरसिम्हन का यह भी मानना है कि 'ऑपरेशन सिंदूर' का डिफेंस बजट पर कोई बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है।
ऑपरेशन सिंदूर से बजट क्यों नहीं बदलेगा?
नरसिम्हन ने साफ कहा कि अगर किसी एक ऑपरेशन से बजट में बड़ा बदलाव होता, तो 2020 के बाद इसमें तेज़ उछाल दिखता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने समझाया कि एक या दो बजट से रक्षा नीति की दिशा नहीं बदलती। इसके बावजूद, बाजार में रक्षा सेक्टर को लेकर भरोसा मजबूत बना हुआ है।
डिफेंस शेयरों में जबरदस्त उछाल
पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़े तनाव का सीधा असर शेयर बाजार पर दिखा। 25 अप्रैल से 14 मई के बीच रक्षा कंपनियों के मार्केट कैप में ₹1.2 लाख करोड़ से ज्यादा का इजाफा हुआ।
पूंजीगत खर्च में 20-25% उछाल की संभावना
पूर्व रक्षा सचिव गिरिधर अरमाने का नजरिया थोड़ा अलग है। उनका मानना है कि मौजूदा जियो पॉलिटिकल हालात और सेना के स्टॉक को दोबारा भरने की जरूरत को देखते हुए कैपिटल एक्सपेंडिचर में 20-25% तक बढ़ोतरी संभव है। उन्होंने बताया कि हाल के सालों में दिए गए बड़े डिफेंस ऑर्डर अब भुगतान के चरण में पहुंच रहे हैं।
इमरजेंसी खरीद और नई टेक्नोलॉजी पर खर्च
अरमाने के अनुसार, आपातकालीन खरीद, नई सैन्य तकनीकों में निवेश और लॉन्ग-टर्म प्रोजेक्ट्स भी रक्षा खर्च बढ़ाने वाले बड़े कारण बन सकते हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि मई 2025 के संघर्ष के बाद ड्रोन वॉरफेयर पर खास ध्यान दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर भारत और पाकिस्तान के बीच ड्रोन युद्ध की पहली फुल स्केल ट्रायल थी।
काउंटर-ड्रोन सिस्टम की जरूरत
कुलकर्णी के मुताबिक, भारत ने ड्रोन हमलों को रोकने में अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन यह दक्षिण एशिया में नई तरह के युद्ध की शुरुआत भी है। उन्होंने सरकार से सीमा और तटरेखा पर काउंटर-ड्रोन इकोसिस्टम मजबूत करने की सलाह दी।
डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता की बड़ी छलांग
भारत अब रक्षा खरीद में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब कम से कम 65% रक्षा उपकरण देश में ही बन रहे हैं, जबकि पहले भारत 65-70% तक आयात पर निर्भर था।
खुद करना होगा हथियारों की मैन्युफेक्चरिंग
वित्त वर्ष 2025 में भारत का रक्षा उत्पादन ₹1.51 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। सरकार का लक्ष्य है कि 2029 तक इसे ₹3 लाख करोड़ तक बढ़ाया जाए। FY 2025 में भारत का रक्षा निर्यात ₹23,622 करोड़ के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया, जो FY 2024 से 12.04% ज्यादा है। सरकार 2029 तक इसे ₹50,000 करोड़ तक ले जाना चाहती है।
फिर भी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक
स्वीडन स्थित SIPRI के अनुसार, इन सबके बावजूद भारत अभी भी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक बना हुआ है। डिफेंस एक्सपर्ट का कहना है कि स्वदेशीकरण को तेज करने के लिए इननोवेशन और R&D पर ज्यादा फोकस जरूरी है।
R&D में निवेश क्यों है जरूरी?
उन्होंने कहा कि रिसर्ट एंड डिवेलपमेंट में लगातार निवेश भारत को भविष्य की जियो पॉलिटिकल अनिश्चितताओं से सुरक्षित रखेगा। बजट 2025 में आधुनिकीकरण के लिए ₹1,48,722.80 करोड़ और R&D व इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ₹31,277 करोड़ आवंटित किए गए। PRS Legislative Research के मुताबिक, हाल के वर्षों में डिफेंस बजट का वह हिस्सा घटा है जो पूंजीगत खर्च पर जाता है। FY 2014 में यह 32% था, जबकि FY 2026 में यह 30% से भी कम हो गया है।
GDP प्रतिशत से क्लियर पिक्चर नहीं
एक्सपर्ट के मुताबिक GDP के प्रतिशत के रूप में रक्षा खर्च आमतौर पर 1.5% से 1.9% के बीच रहा है। लेकिन उनका कहना है कि भारत जैसे मध्यम आय वाले देश के लिए यह सही पैमाना नहीं है।
कुल सरकारी बजट को देखना ज्यादा सही
उनके मुताबिक, जब भारत आयात पर खर्च करता है तो पैसा देश से बाहर जाता है। इसलिए रक्षा को कुल सरकारी बजट के हिस्से के रूप में देखना ज्यादा सही तरीका है, जहां इसका हिस्सा पहले से ही बड़ा है। एक्सपर्ट ने यह भी कहा कि अंतरिक्ष, विज्ञान और रिसर्च जैसे क्षेत्रों में होने वाला खर्च भी अप्रत्यक्ष रूप से रक्षा क्षमताओं को मजबूत करता है और इसे बड़े रणनीतिक प्रयास का हिस्सा समझना चाहिए।
बेहतर इस्तेमाल पर जोर
लेफ्टिनेंट जनरल नरसिम्हन का मानना है कि 1 फरवरी को आने वाले बजट में, खासकर पूंजीगत खर्च में बहुत बड़ी छलांग की संभावना कम है। उनका कहना है कि फोकस मौजूदा फंड के बेहतर इस्तेमाल पर होना चाहिए।
पैसा है, लेकिन खर्च करने की क्षमता?
उन्होंने यह भी कहा कि हर साल रक्षा मंत्रालय से कुछ पैसे वित्त मंत्रालय को वापस चले जाते हैं। इसका मतलब है कि मंत्रालय आवंटित राशि को पूरी तरह खर्च नहीं कर पाता। नरसिम्हन ने साफ कहा, "हम और बड़ा डिफेंस बजट चाहेंगे, लेकिन सामाजिक ज़रूरतें भी हैं।" उन्होंने जोर दिया कि सबसे जरूरी बात यह है कि जो पैसा मिले, उसका पूरा और सही इस्तेमाल हो, ताकि देश को असली फायदा मिल सके।
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