भारत-चीन में 5 सालों में हो सकती है जंग, RUSI रिपोर्ट में दावा, काशगार प्लांट पर कब्जे से कैसे डरे शी जिनपिंग?
India-China War: जियो-पॉलिटिक्स के जानकारों ने भविष्यवाणी की है, कि हिमालय में दूसरे भारत-चीन युद्ध का खतरा मंडरा रहा है और आशंका जताई गई है, कि साल 2025 से 2030 के बीच में कभी भी पूर्वी लद्दाख में भारत औऱ चीन के बीच युद्ध छिड़ सकता है।
हालांकि, पूर्व भारतीय सेना प्रमुख की राय अलग है। उनका कहना है, कि 2020 में गलवान संघर्ष के बाद चीन को पता चल गया है, कि नया भारत पीछे नहीं हटने वाला है, लिहाजा ताइवान मुद्दे को सुलझाने से पहले चीन, भारत के साथ किसी जोखिम में उलझना नहीं चाहेगा।

चीन ने रक्षा बजट को बेतहाशा बढ़ाया
चीन ने 2024 में अपने रक्षा खर्च में 7.2 प्रतिशत की भारी वृद्धि की है और ताइवान पर हमला करने और इसे चीनी मुख्य भूमि के साथ एकजुट करने के अपने लक्ष्य की ओर लगातार बढ़ रहा है। हाल ही में समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक एनालिसिस रिपोर्ट में इसका खुलासा किया गया है। रिपोर्ट में, चीन ने कहा कि वह "ताइवान की स्वतंत्रता' और बाहरी हस्तक्षेप की मदसद से 'ताइवान के अलगाववादियों' का मजबूती से मुकाबला करेगा।
वहीं, चीन ने अब अपनी नीति से ताइवान के "शांतिपूर्ण पुनर्मिलन" शब्द को हटा दिया है और कहा है, कि ताइवान को किसी भी हालत में चीन से मिलाया जाएगा।
इस बीच रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट (RUSI) ने 'वार क्लाउड्स ओवर द इंडियन होरिजोन?' की एक रिपोर्ट में इंटरनेशनल पॉलिटिकल रिस्क एनालिटिक्स के संस्थापक और अध्यक्ष, लेखक समीर टाटा ने एक खतरनाक भविष्यवाणी की है, जिसमें उन्होंने कहा है, कि "दूसरा चीन-भारत युद्ध संभवतः 2025 और 2030 के बीच भारत के सुदूर उत्तर पश्चिम क्षेत्र में पूर्वी लद्दाख में लड़ा जाएगा।"
समीर टाटा का तर्क है, कि बीजिंग भारत के हिस्से पूर्वी लद्दाख को एनर्जी सिक्योरिटी के चश्मे से देखता है, जो चीन और भारत को युद्ध की तरफ धकेल देगा।
उन्होंने लिखा है, कि "चीन डरता है, कि उसके सुदूर पश्चिमी प्रांत शिनजियांग में स्थिति काशगर एनर्जी प्लांट पर आक्रमण करने का एकमात्र रास्ता पूर्वी लद्दाख है, और अगर दुश्मन शक्ति काशगार प्लांट पर कब्जा करती है, तो चीन की एनर्जी व्यवस्था ही ठप हो जाएगी, क्योंकि काशगर प्लांट, ईरान के महत्वपूर्ण तेल और गैस पाइपलाइन से जुड़ा हुआ है और ये पाइपलाइन चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) प्रोजेक्ट के तहत पाकिस्तान से होकर गुजरती है।"
यानि, CPEC भारत और चीन के बीच लड़ाई की एक वजह बन सकता है, क्योंकि चीन पूर्वी लद्दाख पर कब्जा कर अपने काशगर एनर्जी प्लांट को सुरक्षित करना चाहता है।
भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल एमएम नरवणे (रिटायर्ड) भी इस तर्क से सहमत हैं। वह मानते हैं, कि पूर्वी लद्दाख और काराकोरम दर्रा चीन की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा हैं, क्योंकि वे उनके सीपीईसी परियोजना के लिए महत्वपूर्ण हैं।

यूरेशियन टाइम्स की एक रिपोर्ट में नरवणे ने कहा, कि "लिहजा, अगर चीनियों को लगता है, कि भारत उस स्थिति में पहुंच रहा है, जहां से CPEC रास्ते को काट सकता है और उसे अपाहिज बना सकता है, तो फिर 1962 जैसा बदलाव हो सकता है।"
आपको बता दें, कि 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया था, जिसमें भारत ने अपने क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा गंवा दिया था। हालांकि, 1962 और आज के भारत में बहुत अंतर आ गया है।
जनरल नरवणे 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' नाम से एक किताब लिखी है, जिसकी रिलीज रोक दी गई है। जिसमें उन्होंने दावा किया है, कि गलवान संघर्ष, दोनों देशों के बीच एक ऐतिहासिक घटना साबित हुई, जिनके बीच सीमा निर्धारण न होने के कारण लंबे समय से संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया है, कि गलवान झड़पों के साथ, भारत ने अपना संदेह दूर कर दिया है, और पहले जहां चीन का इशारों में नाम लिया जाता था, वहीं अब भारत के नीति निर्माताओं ने खुलकर चीन का नाम लेना शुरू कर दिया है।
पूर्वी लद्दाख में भारी आक्रामक भारत
भारत ने पूर्वी लद्दाख में भारी संख्या में सैनिकों को तैनात कर रखा है और भारत ने पूर्वी लद्दाख में चीन के किसी भी पैंतरे को भारी जवाब देने के लिए भारी संख्या में हथियारों को भी तैनात किया है।
2020 में चीनियों ने अपनी चीनी सीमा पर 80 से ज्यादा तंबू लगाए थे। और भारतीय सशस्त्र बलों ने भी कोई समय नहीं गंवाया और कार्रवाई में जुट गए। सी-130 और सी-17 ट्रांसपोर्ट प्लेन से लगातार भारी हथियार पूर्वी लद्दाख की ऊंची पहाड़ियों पर पहुंचाए गये। भारतीय सेना के 68 हजार सैनिक, 330 पैदल सेना वाहन, 90 से ज्यादा टैंक, तोपखाने और दूसरे हथियारों को पूर्वी लद्दाख में तैनात किया गया है।

चीन की भविष्य की प्लानिंग क्या है?
चीन की सैन्य रणनीतियों को समझने के लिए उसके भविष्य के लक्ष्यों को समझना काफी महत्वपूर्ण है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने 2049 तक "चीनी राष्ट्र का महान कायाकल्प" हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इसमें अपनी राष्ट्रीय शक्ति का विस्तार करना, अपनी शासन प्रणालियों में सुधार करना और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को संशोधित करना शामिल है।
लिहाजा, विशेषज्ञों का मानना है, कि 2049 तक राष्ट्रीय कायाकल्प की चीन की योजनाएं शांतिपूर्वक पूरा करना संभव नहीं है। कम्युनिस्ट चीन को इस दौरान ताइवान, हांगकांग और मकाऊ पर भी पूरी तरह से कब्जा करना है। वहीं, भारत, नेपाल और भूटान के रणनीतिक क्षेत्रों पर भी कब्जा करना है और दक्षिण चीन सागर से भी अपने विरोधियों का नामो निशान मिटाना है। जाहिर तौर पर, ये रास्ता युद्ध का है और पूरा भारत-चीन प्रायद्वीप भी चीन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका सिरा महत्वपूर्ण मलक्का जलडमरूमध्य और संभावित थाई नहर की तरफ भी जाता है, जहां से भारत, किसी भी वक्त चीनी व्यापार को ठप कर सकता है, लिहाजा चीन भारत की उस नाकाबंदी के खिलाफ भी विकल्प तलाश रहा है, लिहाजा एक्सपर्ट्स का कहना है, कि चीन की ये महत्वकांक्षा, निश्चित तौर पर युद्ध का दरवाजा खोलती है।
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