अफ्रीकी देश जिम्बॉब्वे पर कब्जे की तैयारी में जुटा चीन, संसद बनाने में खर्च कर दिए 14 करोड़ डॉलर
जिम्बॉब्वे के माउंट हैंपडन चीन ने नया संसद भवन बनाया है और ये संसद भवन अगले कुछ दिनों में जिम्बॉब्वे की सरकार को सौंप दिया जाएगा। लेकिन, चीन ने जिम्बॉब्वे में संसद भवन के निर्माण में 140 मिलियन डॉलर खर्च कर दिए हैं।
हरारे, जुलाई 06: चीन से कर्ज लेने का मतलब होता है, अपने देश की संप्रभुता को खत्म कर देना और देश को चीनी ड्रैगन के हाथों बेच देना और श्रीलंका से बड़ा इसका सबसे बड़ा उदाहरण फिलहाल और कौन हो सकता है। श्रीलंका दिवालिया हो गया है और श्रीलंकन प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघ ने देश की संसद में कहा है, कि श्रीलंका अब दिवालिया हो गया है। लेकिन, फिर भी कई ऐसे देश हैं, जो ड्रैगन को गले लगाने से बाज नहीं आ रहे हैं और अफ्रीकी देश जिम्बॉब्वे भी ऐसा लग रहा है, कि बहुत जल्द ही चीनी ड्रैगन का गुलाम बनने वाला है।

जिम्बॉब्वे में संसद भवन का निर्माण
जिम्बॉब्वे के माउंट हैंपडन चीन ने नया संसद भवन बनाया है और ये संसद भवन अगले कुछ दिनों में जिम्बॉब्वे की सरकार को सौंप दिया जाएगा। लेकिन, आपको ये जानकार हैरानी होगी, कि चीन ने जिम्बॉब्वे में संसद भवन के निर्माण में 140 मिलियन डॉलर यानि 14 करोड़ डॉलर खर्च कर दिए हैं और जिम्बॉब्वे सरकार ने चीन से कर्ज लेकर इस संसद का निर्माण करवाया है। बेहद खराब आर्थिक हालत से गुजर रहा जिम्बॉब्वे इस विशालकाय कर्ज को कैसे चुकाएगा, ये बात किसी को समझ नहीं आ रही है। जबकि, चीन अपने तय प्लानिंग के तहत अफ्रीकी देशों में आगे बढ़ रहा है और नये नये देशों को कर्ज के दलदल में फंसा रहा है। चीन ने पूरे अफ्रीका महाद्वीप में विशालकाय परियोजनाओं की एक श्रृंखला की शुरूआत कर रखी है और अफ्रीकी देशों के लिए चीन सबसे बड़ा कर्जदाता देश बन चुका है। जिम्बॉब्वे की राजधानी हरारे के उत्तर-पश्चिम में लगभग 18 किमी की दूरी पर माउंट हैम्पडेन नाम के एक जगह पर चीन ने इस संसद भवन का निर्माण किया है।

कैसा है जिम्बॉब्वे का संसद भवन?
जिम्बॉब्वे में संसद का निर्माण करने वाले चीन का कहना है कि, इस संसद के निर्माण के बाद जिम्बॉब्वे औपनिवेशिक युग से बाहर निकल जाएगा, क्योंकि पुराने संसद को हटा दिया गया है। वहीं, जिम्बॉब्वे के इस नये संसद में 650 लोगों के एक साथ बैठके की व्यवस्था की गई है, जबकि पुराने संसद में 100 लोगों के ही बैठने की व्यवस्था थी और जिम्बॉब्वे में सांसदों की संख्या 350 होती है, लिहाजा ये संसद भवन छोटा पड़ रहा था। एक पहाड़ी की चोटी पर इस संसद भवन का निर्माण किया गया है और इसका निर्माण शंघाई कंस्ट्रक्शन ग्रुप ने किया है और संसद भवन को भव्य गोलाकार परिसर में डिजाइन किया गया है और इस निर्माण का पूरा का पूरा खर्च चीन ने ही उठाया है।

दोस्ती की दिशा में मील का पत्थर- चीन
चीनी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिम्बॉब्वे में इस नये संसद को बनाने में चीन के 500 टेक्नीशियन ने काम किया है और 1200 स्थानीय कर्मचारियों क भी संसद के निर्माण में काम करने का मौका मिला। चीनी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन को इस संसद को बनाने में करीब साढ़े तीन सालों का वक्त लगा है और शंघाई कंस्ट्रक्शन ग्रुप के मैनेजर लिबो कै ने बुधवार को कहा कि, "इसमें कोई संदेह नहीं है कि नई संसद जिम्बाब्वे और यहां तक कि पूरे दक्षिणी अफ्रीका में एक ऐतिहासिक इमारत बन जाएगी।" चीनी कंपनी ने संसद भवन का निर्माण करने के बाद कहा कि, "यह चीन-जिम्बाब्वे दोस्ती के लिए एक और मील का पत्थर होगा, जो साल-दर-साल मजबूत होता जा रहा है।" साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबित, इमारत का कुल क्षेत्रफल 33,000 वर्ग मीटर (355,200 वर्ग फुट) है और इसमें दो मुख्य भवन हैं - एक छह मंजिला कार्यालय भवन और एक चार मंजिला संसद भवन। चीनी कंपनी ने कहा है कि, संसद भवन के निर्माण का सारा खर्च बीजिंग ने उठाया है।

युगांडा को फंसा चुका है चीनी ड्रैगन
अफ्रीकी मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक युगांडा की सरकार अपने एकमात्र अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट कर्ज ना चुका पाने की वजह से चीन के हाथों गंवाने की कगार पर पहुंच गई है। रिपोर्ट के मुताबिक चीन के ऋणदाता ने जो लोन के लिए शर्तें लगा रखी हैं, उसमें कर्ज वापसी नहीं कर पाने की स्थिति में एयरपोर्ट पर कब्जे की शर्त भी लगाई गई है। पिछले साल नवंबर में युगांडा के राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी ने इस शर्त को बदलने की कोशिश के तहत एक प्रतिनिधिमंडल को बीजिंग भी भेजा था, लेकिन चीन ने सौदे के मूल मसौदे में किसी भी तरह के बदलाव से साफ मना कर दिया है। युगांडा की सरकार ने अपने वित्त मंत्रालय और सिविल एविएशन अथॉरिटी के जरिए 17 नवंबर, 2015 को चीन के एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक (एग्जिम बैंक) से 2% पर 20 करोड़ 70 लाख अमेरिकी डॉलर का कर्ज लिया था। इसकी मैच्युरिटी की अवधि सात साल ग्रेस पीरियड मिलाकर 20 साल है। रिपोर्ट के मुताबिक डील की शर्तों के अनुसार युगांडा एक तरह से अपना प्रमुख एयरपोर्ट चीन के हाथों गंवा चुका है।(पहली तस्वीर सौजन्य: एंटेबे एयरपोर्ट डॉट कॉम)

कैरेबियन देशों को फंसाता चीन
अफ्रीका महाद्वीप के ज्यादातर देश काफी गरीब हैं, लिहाजा चीन के लिए इन देशों को अपनी जाल में फंसाना काफी आसान रहा है। वहीं, अफ्रीका के अलावा कैरेबियन देश भी चीन के टारगेट पर हैं। पिछले साल नवंबर में आई रिपोर्ट के मुताबिक, बारबाडोस और जमैका जैसे गरीब देशों में भारी मात्रा में डॉलर्स की निवेश कर रहा है। इतना ही नहीं, चीन इन छोटे-छोटे देशों को भारी-भरकम कर्ज देकर उन्हें परेशान कर रहा है और उन्हें अपने जाल में बुरी तरह से फंसा रहा है। चीन के कर्ज के बोझ में दबे कैरेबियाई देश अपनी संपत्ति और अपना रणनीतिक क्षेत्र चीन को सौंपने के लिए मजबूर हो जाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने दुनिया के महत्वपूर्ण जलमार्गों और बंदरगाहों पर भी अपना प्रभुत्व हासिल कर लिया है और चीन के निशाने पर सीधे तौर पर अमेरिका, ब्रिटेन और भारत जैसे प्रतिद्वंदी देश शामिल हैं।

कैरेबियाई देशों में 500 मिलियन पाउंड निवेश
अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट द्वारा एकत्र किए गये आंकड़ों के मुताबिक, चीन ने कैरेबियाई द्वीप बारबाडोस में सड़कों, घरों, सीवरों और होटलों के निर्माण में करीब 500 मिलियन पाउंड का निवेश किया है, और कैरेबियाई देशों को ब्रिटेन के प्रभाव से मुक्त कर अपने चंगुल में जकड़ रहा है, जो ब्रिटिश प्रभाव से खुद को दूर कर मंगलवार को एक गणतंत्र बन गया है। इसके साथ ही बारबाडोस के पास स्थिति जमैका में बीजिंग ने 2.6 अरब पाउंड का निवेश किया है, जबकि इस देश की कुल जीडीपी ही सिर्फ 16.4 अरब पाउंड है और जमैका अब पूरी तरह से चीन के प्रभुत्व में आ चुका है।

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में करेगा इस्तेमाल
चीन इन गरीब देशों को पूरी तरह से अपने प्रभुत्व में लेकर उन्हें अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में अपने प्रतिद्वंदियों के खिलाफ इस्तेमाल करता है। पिछले साल हांगकांग में जब चीन ने नेशनल सिक्योरिटी कानून लागू किया था, तो उस वक्त पापुआ न्यू गिनी, एंटीगुआ और बारबुडा से उसे यूनाइटेड नेशंस समर्थन मिला था। पापुआ न्यू गिनी को चीन ने 5.3 अरब पाउंड का कर्ज दिया हुआ है, जो उसकी जीडीपी का करीब 21 प्रतिशत है, वहीं एंटीगुआ और बारबुडा को चीन ने 1 अरब पाउंड का कर्ज दिया है, जो उसकी जीडीपी का करीब 60 प्रतिशत है। ऐसे में समझना काफी आसान है, कि चीन कैरेबियाई देशों को किस तरह से अपने जाल में फंसा चुका है। वहीं, दूसरे राष्ट्रमंडल देशों में सिएरा और लियोन ने भी हांगकांग के मुद्दे पर चीन को समर्थन दिया था। जहां 2005 से चीनी निवेश उसके सकल घरेलू उत्पाद का 145 प्रतिशत है।












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