खतरे से खाली नहीं है चीन में निवेश, भारतीय बाजार चांदी ही चांदी.. अमेरिकी कंपनियों के बीच हुए सर्वे में खुलासा
India vs China Investment: अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध के बीच अमेरिकी कंपनियों के बीच कराए गये सर्वे से पता चला है, कि बड़ी अमेरिकन कंपनियों को अब चीन में निवेश करने से डर लगने लगा है और भारतीय बाजार में उनके लिए चांदी ही चांदी है।
सर्वे में पता चला है, कि अमेरिकी कंपनियां अपनी आपूर्ति शृंखला के लिए चीन को एक जोखिम भरे दांव के रूप में देख रही हैं, जबकि कंपनियों को मानना है, कि चीन के पड़ोसी भारत में निवेश करने से लाभ होना तय है, लिहाजा ज्यादातर कंपनियां अब चीन के बजाए भारतीय बाजार में निवेश करने की तरफ बढ़ रही हैं।

अमेरिका की बड़ी कंपनियों के बीच सर्वे
यूके मार्केट रिसर्च फर्म वनपोल ने अमेरिका की 500 कंपनियों के मैनेजर्स के बीच ये सर्वे करवाया है, जिनमें से 61 प्रतिशत मैनेजर्स ने कहा है, कि अगर चीन और भारत, दोनों ही देश एक जैसे सामानों की आपूर्ति करते हैं, तो वो चीन के बजाए भारत की तरफ रूख करना चाहेंगे।
वहीं, सर्वे में 56 प्रतिशत मैनेजर्स ने सप्लाई चेन की जरूरतों को पूरा करने के लिए चीन की जगह भारत को प्राथमिकता देने की बात कही है।
सर्वेक्षण से पता चला है, कि 59% मैनेजर्स का मानना है, कि चीन से किसी तरह की सामग्री प्राप्त करना अब जोखिम भरा या काफी ज्यादा जोखिम भरा हो गया है, जबकि 39 प्रतिशत मैनेजर्स ने भारत से सामग्री प्राप्त करना जोखिम भरा बताया है।
वहीं, दिसंबर में मार्केटप्लेस इंडिया इंडेक्स द्वारा कराए गए स्वतंत्र और थर्ड पार्टी सर्वेक्षण में भाग लेने वाले मैनेजर्स में से कम से कम एक चौथाई अधिकारी ऐसे हैं, जो वर्तमान में चीन या भारत से आयात नहीं करते हैं।
इंडिया इंडेक्स के सीईओ और वोगेल ग्रुप के मैनेजिंग प्रिंसिपल समीर कपाड़िया ने सीएनबीसी की एक रिपोर्ट में कहा है, कि "कंपनियां भारत को टैरिफ से बचने के लिए अल्पकालिक धुरी के बजाय दीर्घकालिक निवेश रणनीति के रूप में देख रही हैं।"
राष्ट्रपति जो बाइडेन और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अमेरिका और भारत के बीच मजबूत होते संबंधों ने, अमेरिकी कंपनियों को चीन से दूर जाने के लिए प्रोत्साहित किया है और अमेरिकी कंपनियां इस बात से डरी हैं, कि भविष्य में चीन और अमेरिका के बीच संबंध और खराब ही होने वाले हैं, लिहाजा उनके लिए भारत में निवेश करना ही फायदेमंद रहेगा। लिहाजा, अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत एक आकर्षक विकल्प बन गया है।
पिछले साल जून में प्रधानमंत्री मोदी की व्हाइट हाउस की राजकीय यात्रा के साथ दोनों देशों के बीच संबंध एक नए अध्याय में प्रवेश कर गए हैं, जहां रक्षा, प्रौद्योगिकी और आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण में बड़े सहयोग पर कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए थे।
लिहाजा, भारत में हाल के दिनों में निवेश के बारे में घोषणाओं की झड़ी लग गई है।
इस महीने की शुरुआत में, मारुति सुजुकी ने घोषणा की थी, कि वह देश में दूसरी फैक्ट्री बनाने के लिए 4.2 अरब डॉलर का निवेश करेगी। वहीं, वियतनामी इलेक्ट्रिक ऑटो निर्माता विनफ़ास्ट ने भी जनवरी में घोषणा की है, कि उसका लक्ष्य भारत में फैक्ट्री स्थापित करने के लिए लगभग 2 अरब डॉलर निवेश करने का है।
हालांकि, इतनी आशाओं के बाद भी अमेरिकी कंपनियां अभी भी भारत की आपूर्ति श्रृंखला क्षमताओं को लेकर सतर्क हैं।
सर्वेक्षण से पता चला है, कि 55% मैनेजर्स ने पाया है, कि क्वालिटी को लेकर भारत अभी भी "मध्यम जोखिम" वाला देश है, जिसका सामना उन्हें भारत में कारखाना बनाने पर हो सकता है।
पिछले साल सितंबर में, ऐप्पल कंपनी के लिए सामानों की आपूर्ति करने वाले पेगाट्रॉन की फैक्ट्री में चेन्नई के पास चेंगलपट्टू इलाके में आग लगा दी गई थी, जिसकी वजह से प्रोडक्शन अस्थाई तौर पर बंद करना पड़ा था।
कंपनियों का मानना है, कि भारत में कंपनी खोलने पर डिलवरी रिस्क 48 प्रतिशत और आईपी चोरी का रिस्क भी 48 प्रतिशत है, जो भारत की तरफ आने से अभी भी अमेरिकन कंपनियों को रोक रही हैं।
इसके अलावा, कंपनियों का मानना है, कि भारत में कारखाना खोलने के बाद पारिस्थितिक तंत्र यानि, वातावरण बनाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। कंपिनियों का मानना है, कि एप्पल जैसी क्षमता उनके पास नहीं है, कि कंपनी खोलने के साथ ही वो उस तरह के पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण कर ले। लिहाजा, एक्सपर्ट्स का कहना है, कि भारत सरकार को कंपनियों के लिए ऐसे पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण फौरन करना चाहिए, ताकि हाथ से ये मौका ना निकले।
अगर हाथ से मौका निकला तो...
अगर भारत इस मौके का फायदा नहीं उठा पाया, तो कुछ देश, जिन्हें इसका फायदा मिल सकता है, उनमें सबसे ऊपर नाम वियतनाम का है।
भारत की तरह, वियतनाम भी "चीन प्लस वन" रणनीति अपनाते समय निवेशकों के दिमाग में एक विकल्प रहा है। वियतनामी बाजार में आशावाद के कारण 2022 की तुलना में पिछले साल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में 14% से ज्यादा बढ़ा है।
एलएसईजी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल जनवरी से नवंबर तक वियतनाम में 29 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने का वादा किया गया है।
लेकिन, "वियतनाम वह हासिल नहीं कर पाएगा, जो भारत कर सकता है, क्योंकि दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश के पास "एक बहुत बड़े ग्राहक आधार तक पहुंच है, जो वियतनाम प्रदान नहीं करता है।" क्योंकि, भारत में निर्माण करने पर बाजार खोजने के लिए कहीं और जाने की जरूरत नहीं होगी, लेकिन वियतनाम किसी भी कंपनी को भारत जैसा विशालकाय बाजार नहीं दे सकता है।












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