चीन ने भारत को सीमा पर कैसे फंसाया? क्या ड्रैगन के बनाए 'भ्रम जाल' को काटना संभव है?
चीन ने दो पोस्ट पर पीछे हटने से इनकार कर दिया है और इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास भी तेजी से जारी है, तो सवाल ये है, कि क्या चीन पीछे हटना भी चाहता है?

China-India Dispute: इंडोनेशिया के बाली में पिछले महीने जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से हाथ मिलाने के लिए भोजन के मेज से उठे और फिर दोनों नेताओं में हंसते-मुस्कुराते हुए थोड़ी देर की बातचीत हुई। तीन सालों में ये पहला मौका था, जब सार्वजनिक मंच पर दोनों नेताओं को बात करते हुए देखा गया था। हालांकि, इस दौरान दोनों नेताओं के बीच क्या बातचीत हुई, इसका ब्यौरा दोनों ही तरफ से नहीं दिया गया। लेकिन, फिर भी ये बातचीत पूर्वी लद्दाख में दोनों देशों के सेनाओं के बीच हुई झड़प के बाद पहली बातचीत है। लेकन, सवाल उठता है, कि डोकलाम से बाली के वक्त में क्या कुछ बदला है? और क्या मोदी सरकार भी ड्रैगन के बनाए 'भ्रमजाल' में फंस रही है।

चीन ने भारत को सीमा पर फंसाया
डोकलाम में इंडियन आर्मी और पीएलए के सैनिकों के बीच हुई भिड़ंत के बाद ये तीसरी सर्दी है और उसके बाद से लगातार 50 हजार से ज्यादा भारतीय जवान नसें जमाने वाली सर्दी में देश की सुरक्षा को संभाले हुए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन ने भी 50 हजार से ज्यादा सैनिकों को सीमा पर तैनात कर रखा है। दोनों सेनाओं के बीच रुक-रुक कर हो रही बातचीत, और तनाव वाले कई क्षेत्रों से दोनों ही देशों की सेनाओं के पीछे हटने के बावजूद, भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनोज पांडे ने हाल ही में पुष्टि की है, कि चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर अपनी सेना को कम नहीं किया है। उन्होंने कहा कि, सीमा पर चीनी बुनियादी ढांचे का निर्माण अभी भी "बेरोकटोक चल रहा है" और स्वतंत्र सैटेलाइट तस्वीरें इस बात की पुष्टि करती हैं कि, चीन का निर्माण कार्य काफी तेजी से चल रहा है। पांडे ने कहा कि, स्थिति "स्थिर लेकिन अप्रत्याशित है।" और ये अप्रत्याशित स्थिति अब लगातार के लिए बन गई है।

बातचीत से क्या हासिल हुआ?
सेंटर फॉर पॉलिसी एंड रिसर्च के सीनियर फेलो सुशांत सिंह के एक लेख के मुताबिक, भारत और चीन ने अब तक वरिष्ठ सैन्य कमांडर स्तर पर कई राजनयिक और राजनीतिक व्यस्तताओं के बीच 16 दौर की सीमा वार्ता की है, लेकिन लद्दाख में तनाव को कम करने के लिए अभी तक बात नहीं बन पाई है। लद्दाख के सात क्षेत्रों में से, जहां भारतीय और चीनी सैनिकों ने 2020 के बाद से एक-दूसरे का सामना किया है, दो में कोई बदलाव नहीं देखा है, जबकि बाकी जगहों पर धीरे धीरे दोनों ही देशों के सैनिकों ने अपने कदम पीछे खींचे हैं। लेकिन, भारत के लिए चुनौती सिर्फ लद्दाख नहीं है, बल्कि भारत के लिए चुनौती एलएसी के पूर्वी भाग यानि, अरुणाचल प्रदेश और तिब्बत राज्य के बीच और ज्यादा होती जा रही है, जो चिंताजनक है। इन क्षेत्रों में चीन ने जिस तरह से इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास किया है और उसके जरिए सैन्य बढ़त हासिल की है, उसने नई दिल्ली को रक्षात्मक कर दिया है। वहीं, भारत और चीन के बीच टेक्नोलॉजी, डिफेंस, अर्थव्यवस्था और विज्ञान के क्षेत्र में लगातार बढ़ता फासला, नई दिल्ली के विकल्पों को और कम करता है। लिहाजा, नजदीकी भविष्य में सीमा विवाद को लेकर भारत का क्या फैसला होता है, और क्या कदम होगा, निश्चित तौर पर सरकार के लिए इसका फैसला करना आसान नहीं होगा।

शी जिनपिंग का तीसरा कार्यकाल
अक्टूबर महीने में कम्युनिस्ट पार्टी कांग्रेस में अनुमानों के मुताबिक ही शी जिनपिंग को लगातार तीसरी बार देश का राष्ट्रपति चुना गया। । शी जिनपिंग के मंच पर चढ़ने से कुछ मिनट पहले ग्रेट हॉल ऑफ द पीपुल में प्रसारित तस्वीरों में लद्दाख की गलवान घाटी का एक वीडियो चलाया गया। वीडियो में पीएलए रेजिमेंट को दिखाया गया था। वीडियो में दिखाया गया, कि चीनी कमांडर क्यू फबाओ, भारतीय सैनिकों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए अपनी बाहें फैलाकर खड़े हैं। क्यूई को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने हीरो बनाकर पेश किया और फिर उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी का प्रतिनिधि बनाया गया। यानि, शी जिनपिंग राष्ट्रवाद का इस्तेमाम करते हुए, पार्टी यह संदेश देना चाहती है, कि वह हर कीमत पर चीनी क्षेत्र की रक्षा करेगी।

तो फिर भारत की क्या है तैयारी?
भारत के सैन्य और राजनीतिक नेता को अब सीमा पर एक नई वास्तविकता का सामना करना पड़ रहा है, जिसने उन्हें गंभीर कार्रवाई करने के लिए मजबूर कर दिया है और भारत नीति निर्धारक इस बात को जानते हैं, कि चीन को भारत पर एक बढ़त हासिल है। खासकर पीएलए लगातार जिस तरह से बढ़ रहा है, उससे साफ जाहिर हो रहा है, कि उसका इरादा पीछे हटने का नहीं है। नई सैन्य चौकियों का निर्माण, सड़कें और पुलों का निर्माण साफ जाहिर करता है, कि बीजिंग असल में पीछे हटने पर विचार ही नहीं कर रहा है। भारतीय सेना ने चीन के साथ अपनी विवादित सीमा पर शक्ति बढ़ाने के लिए पाकिस्तान की सीमा पर मौजूद अपनी शक्ति को कुछ कम किया है। इसने लद्दाख में पीएलए के और प्रवेश को रोकने के लिए अतिरिक्त जमीनी बलों को तैनात किया गया है और भारत ने भी बुनियादी ढांचे का निर्माण किया है।

सीमा पर वास्तविक स्थिति क्या है?
सुशांत सिंह के मुताबिक, बीजिंग ने लद्दाख के दो क्षेत्रों पर चर्चा करने से इनकार कर दिया है, जहां उसकी सेना ने 2020 से भारतीय गश्त को रोक दिया है। पांच अन्य क्षेत्रों से चीनी सैनिक कुछ मील पीछे हट गए हैं, लेकिन भारत से ऐसा ही करने और नो-गश्त क्षेत्र बनाने के लिए कहा था। लेकिन, भारत का ये कदम भी भारत के गश्ती क्षेत्रों के अपने अधिकार से वंचित करता है, जैसा कि सीमा संकट शुरू होने से पहले योजना बनाई गई थी। पीएलए ने डी-एस्केलेशन पर चर्चा करने से साफ इनकार कर दिया है, जिसमें दोनों सेनाएं पर्याप्त दूरी से पीछे हटेंगी। वहीं, सैनिकों की संख्या में कमी करना और सीमा से सैनिकों को पीछे बुलाने का एजेंडा भी पीएलए की लिस्ट में शामिल नहीं है। वहीं, चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने एलएसी पर मई 2020 से पहले की स्थिति को बहाल करने की किसी भी मांग को खारिज कर दिया। पीएलए भारत के साथ अपने संबंधों में स्थिरता पर जोर देने के बजाय स्थिति की गंभीरता को कम करके आंकना जारी रखे हुए है। ऐसे में सवाल ये उठ रहे हैं, कि आखिर भारत की नीति चीन को लेकर क्या होनी चाहिए और क्या चीन ने भारत को सीमा पर फंसा दिया है, जिसके भ्रमजाल में भारत फंसा हुआ है और वही प्रतिक्रिया कर रहा है, जो असल में चीन चाहता है।












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