जाने कैसे AUKUS ने बजा दी चीन की बुरी तरह से बैंड, क्या भारत को होना चाहिए गठबंधन में शामिल?
क्वाड को लेकर पहले से ही चीन बौखलाया हुआ है और अब ऑकस के आने से चीन बिदक गया है और उसने कहा है कि चीन अब सीधे तौर पर परमाणु हथियार के निशाने पर आ गया है।
नई दिल्ली, सितंबर 20: ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका के संबंधित नेताओं द्वारा त्रिपक्षीय AUKUS रणनीतिक गठबंधन के निर्माण की घोषणा के बाद चीन से जिस तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद थी, चीन ने उससे भी ज्यादा अपनी नाराजगी का इजहार कर इस बात पर मुहर लगा दी, कि उसके सबसे कमजोर नस को दबा दिया गया है। चीन की सरकार और भोंपू सरकारी मीडिया ने जिस तरह से गुस्से का इजहार किया है, उससे जाहिर हो गया कि 'ऑकस' का निर्माण जिस मकसद से किया गया है, वो मकसद कामयाब होने वाला है।

'ऑकस' से बुरी तरह बौखलाया चीन
हालांकि, 'ऑकस' गठबंधन का कहना है कि चीन को इस गठबंधन को लेकर नाराज नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये गठबंधन चीन को लेकर नहीं है। लेकिन, चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियन ने 16 सितंबर को एक नियमित रूप से निर्धारित प्रेस कॉन्फ्रेंस में 'ऑकस' और ऑस्ट्रेलिया के परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों की खरीद के फैसले पर चर्चा की। चीन की विदेश मंत्रालय की ओर से जिस नाराजगी का इजहार किया गया, वो बीजिंग के आधिकारिक रुख को दर्शाती हैं। उन्होंने कहा कि परमाणु पनडुब्बी सहयोग "क्षेत्रीय शांति और स्थिरता' को कमजोर करता है, हथियारों की दौड़ तेज करता है और अंतरराष्ट्रीय अप्रसार प्रयासों को कमजोर करता है"। ऑस्ट्रेलिया ने छह पुरानी रॉयल ऑस्ट्रेलियाई नौसेना (आरएएन) कोलिन्स-श्रेणी की डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को बदलने के लिए कम से कम आठ परमाणु-संचालित हमला पनडुब्बियों (नौसेना की भाषा में, एक एसएसएन) के निर्माण के लिए अमेरिका से करार किया है, जिसे वो साउथ चायना सी में चीन के खिलाफ तैनात करेगा।

परमाणु हथियार पर चीन का 'ज्ञान'
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ का दावा, कि चीन के अपने ही परमाणु अभियान की अनदेखी करता है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (पीएलएएन) के पास पहले से ही छह प्रकार की परमाणु-शक्ति वाली 94 पनडुब्बियां हैं, जो परमाणु-टिप वाली बैलिस्टिक मिसाइलों (एसएसबीएन के रूप में जानी जाती हैं) से लैस हैं। जिनमें एक को इस साल और दो को पिछले साल तैनात किया गया है। पीएलएएन में छह प्रकार के 93 एसएसएन के साथ-साथ दर्जनों पारंपरिक पनडुब्बियां भी हैं। 2030 तक, अमेरिकी रक्षा जानकारों ने भविष्यवाणी की है, कि पीएलए-एन में आठ एसएसबीएन और 14 एसएसएन होंगे, जिनमें बेहतर पनडुब्बी शामिल हैं।

ऑस्ट्रेलिया के पास नहीं है परमाणु हथियार
दूसरी तरफ, ऑस्ट्रेलिया के पास कोई एसएसबीएन और कोई परमाणु हथियार नहीं होगा। इसकी पनडुब्बियों में सिर्फ परमाणु प्रपल्शन होगा, जिसका परमाणु हथियारों से कोई लेना-देना नहीं है। यानि, रूसी पनडुब्बी में परमाणु हथियार नहीं, बल्कि परमाणु ऊर्जा से पनडुब्बी की चलाने वाला संयंत्र होगा। परमाणु शक्ति से चलने वाली पनडुब्बी का सबसे बड़ा लाभ रेंज, गति और सहनशक्ति के साथ-साथ ऑनबोर्ड सेंसर के लिए बिजली की आपूर्ति है। बैटरी से चलने वाली पनडुब्बी उतनी देर तक पानी के अंदर नहीं रह सकती हैं, जितनी देर परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियां। उदाहरण के लिए, दक्षिण चीन सागर जैसी जगहों पर एक आरएएन परमाणु-संचालित पनडुब्बी स्टेशन पर काफी ज्यादा समय तक पानी के अंदर रह सकती हैं।

दोस्तों के बीच भारी तकरार
परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों को चुनने की प्रक्रिया में, ऑस्ट्रेलिया ने 2016 में फ्रांस में नेवल ग्रुप के साथ 12 अटैक-क्लास डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों के लिए करार किया, उसे नाराज कर दिया है।। एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया को पता था कि उसने फ्रांस के साथ जो करार किया है, उससे चीन को रोकना मुमकिन नहीं होगा, लिहाजा ऑस्ट्रेलिया इस करार से निकलना चाहता था। लेकिन, ऑस्ट्रेलिया बिना फ्रांस की सरकार या फ्रांस की कंपनी को जानकारी दिए ही करार से बाहर आ गया, जिसने फ्रांस को काफी गुस्से में डाल दिया है।

ऑस्ट्रेलिया-अमेरिका से फ्रांस नाराज
गुस्साए फ्रांस ने ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका से अपने राजदूतों को वापस बुला लिया है, तो ब्रिटेन के साथ अहम बैठक को रद्द कर चुका है। दुर्भाग्य से ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच हुए इस सौदे ने फ्रांस को अलग-थलग कर दिया है। चूंकि फ्रांस एशिया-प्रशांत क्षेत्र में स्थायी उपस्थिति वाला एकमात्र यूरोपीय देश है, और पेरिस दक्षिण चीन सागर में चीन की गतिविधियों की अवैधता के बारे में काफी मुखर रहा है, लिहाजा, AUKUS को फ्रांस के साथ संबंध को जल्दी से ठीक करने की आवश्यकता है। गठबंधन सक्षम समान विचारधारा वाले समर्थकों को दूर करने का जोखिम नहीं उठा सकता। जो बाइडेन ने फ्रांस की नाराजगी को दूर करने के लिए फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ मुलाकात करने की बात कही है और माना जा रहा है कि अगले हफ्ते दोनों नेताओं के बीच मुलाकात होगी।

चीन का दोहरा चरित्र
चीन ने कहा है कि ऑस्ट्रेलिया-अमेरिका और ब्रिटेन के बीच बना 'ऑकस' "क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा को कमजोर करता है", लेकिन सवाल उठता है कि कैसे? चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ हथियारों के होड़ की बात करते हैं, लेकिन चीन खुद हथियारों के होड़ में सबसे आगे है और चीन की वजह से भी कई देशों को हथियारों के रेस में शामिल होना पड़ा है। जैसे की भारत। मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल से भारत ने हथियारों की खरीदारी कम कर दी थी और मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में भारत सरकार ने हथियारों की खरीदारी काफी कर दी थी, लेकिन लद्दाख में भारत-चीन के बीच हिंसक झड़प के बाद मजबूरन भारत को फिर से हथियारों की खरीद में आगे आना पड़ा है और एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगले पांच साल में भारत एक बार फिर से दुनिया में सबसे ज्यादा हथियारों की खरीद करेगा।

चीन में भारी बौखलाहट
चीन ने अमेरिका और ब्रिटेन पर गैर-जिम्मेदार मुल्क होने का आरोप लगाते हुए कहा कि, "अमेरिका और यूके द्वारा ऑस्ट्रेलिया को अत्यधिक संवेदनशील परमाणु पनडुब्बी प्रौद्योगिकी का निर्यात एक बार फिर साबित करता है कि वे परमाणु निर्यात का उपयोग भू-राजनीतिक लाभ के लिए एक उपकरण के रूप में कर रहे हैं और दोहरे मानकों को अपना रहे हैं।" जबकि, हकीकत ये है कि, ऑस्ट्रेलिया परमाणु हथियारों के अप्रसार पर संधि के तहत एक गैर-परमाणु हथियार राज्य बना हुआ है, जैसा कि ऑस्ट्रेलियाई प्रधान मंत्री स्कॉट मॉरिसन ने पिछले सप्ताह दोहराया था। हालांकि, झाओ ने कहा कि, "ऑस्ट्रेलिया के 39 पड़ोसी देशों सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय के पास यह सवाल करने का पूरा कारण है कि क्या ऑस्ट्रेलिया अपनी परमाणु अप्रसार प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए गंभीर है।" चीन ने ऑस्ट्रेलिया पर रारोटोंगा की संधि के तहत अपनी प्रतिबद्धता का उल्लंघन करने का भी आरोप लगाया। इस संधि में परमाणु हथियारों के उत्पादन, कब्जे या परीक्षण पर प्रतिबंध शामिल है, कुछ ऐसा जो कैनबरा निश्चित रूप से विचार नहीं कर रहा है। यह स्पष्ट रूप से ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ चीनी स्मोकस्क्रीन का एक और प्रयास है।

''न्यूक्लियर टार्गेट बनेगा ऑस्ट्रेलिया''
चीन का भोंपू मीडिया ग्लोबल टाइम्स टैब्लॉयड ने 'ऑकस' घोषणा के लिए आक्रामक प्रतिक्रिया प्रकाशित की है, जिसमें उसने विशेषज्ञों का हवाला देते हुए कहा था कि, ऑस्ट्रेलिया अब परमाणु हथियारों के निशाने पर आ गया है। चीन ने एक तरह से ऑस्ट्रेलिया को धमकी देते हुए कहा है कि 'अमेरिका के साथ न्यूक्लियर पनडुब्बी का करार कर ऑस्ट्रेलिया ने खुद को परमाणु हथियारों के निशाने पर ला खड़ा किया है।' ग्लोबल टाइम्स ने कहा कि अब ऑस्ट्रेलिया को निशाना लगाकर चीन को अपना परमाणु बैलिस्टिक हथियारों की तैनाती कर देनी चाहिए। चीन ने गीदड़भभकी देते हुए ऑस्ट्रेलिया को कपटी भी कहा है। जबकि, चीन जिस क्षेत्रीय शांति की बात कर रहा है, उसे बहुत साधारण भाषा में इसी से समझा जा सकता है कि चीन का सभी देश, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, भारत, इंडोनेशिया, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, वियतनाम, यूके और यूएसए जैसे कई दलों के साथ सुरक्षा या व्यापार तनाव है।

'ऑकस' में शामिल होगा भारत?
ये निर्विवाद है कि 'ऑकस' का निर्माण चीन को लक्ष्य पर रखते हुए किया गया है और भारत पहले से ही क्वाड का सदस्य है, जिसमें तीन और देश अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल है। हालांकि, क्वाड को अभी भी ये चारों देश असैन्य संगठन कहते हैं, जबकि 'ऑकस' पूरी तरह से सैन्य गठबंधन है। लिहाजा कई एक्सपर्ट्स कह रहे हैं, कि भारत को भी 'ऑकस' का हिस्सा बनना होगा। एक्सपर्ट्स का कहना है ब्रिटेन और अमेरिका का एशियाई महाद्वीप में मिलिट्री पहंच कम है, लिहाजा चीन को तभी घेरा जा सकता है, जब उसमें भारत को शामिल किया जाए। क्योंकि, भारतीय नौ-सेना विश्व की टॉप-5 नौसेना में शामिल है और भारत सरकार ने नौसेना के विस्तार के लिए भारी बजट आवंटित किया हुआ है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि, कोई एक देश अकेले चीन के खिलाफ नहीं जा सकता, यहां तक कि अमेरिका भी नहीं। बहुपक्षवाद में ताकत पाई जाती है, और ऑकस बीजिंग के सबसे बुरे डर के फलित होने का प्रतीक है, जिसकी आधारशिला रख दी गई है और इसी के जरिए बीजिंग की जबरदस्ती को कम किया जा सकता है।












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