तालिबान ने भेजा न्योता तो जिनपिंग ने बनाया प्लान, अफगानिस्तान के 1 ट्रिलियन डॉलर पर ड्रैगन ने मारी कुंडली
अमेरिकी अधिकारियों ने 2010 में अनुमान लगाया था कि अफगानिस्तान में 1 ट्रिलियन डॉलर का खनिज भंडार धरती के अंदर मौजूद है। और चीन की कोशिश है कि उस दुर्लभ खनिज पर किसी तरह से कब्जा किया जाए।
बीजिंग/काबुल, अगस्त 25: अमेरिका ने जब 2001 में अफगानिस्तान पर आक्रमण किया था, उस वक्त वैश्विक अर्थव्यवस्था मौजूदा वक्त से काफी अलगा था। उस वक्त टेस्ला इलेक्ट्रिक कार कंपनी नहीं थी तो आई-फोन भी नहीं था और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस तो सिर्फ स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्मों में ही दिखाई दिया करता था। लेकिन, आज 2021 में ये तीनों चीजें मौजूद हैं। आज ये तीनों आधुनिक अर्थव्यवस्था के अत्याधुनिक होती टेक्नोलॉजी का नमूना हैं और इन तीनों मशीनों को चलाने में जिस बैट्री का इस्तेमाल होता है, वो अफगानिस्तान में बनने वाली नई राजनीति के केन्द्र में है। जी हां...आपने सही पढ़ा है। आपके मोबाइल फोन में लगा एक बैट्री ही अफगानिस्तान की नई राजनीति की भूमिका को खींच रहा है।

दुनिया का सबसे बड़ा लिथियम भंडार
आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था के केन्द्र में धरती के अंदर रखा हुआ वो दुर्लभ खनिजों का खजाना है, जिसप अत्याधुनिक अर्थव्यवस्था टिकी हुई है और अफगानिस्तान के अंदर तो एक ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की दुर्लभ संपत्ति छिपी हुई है। यानि भारतीय अर्थव्यवस्था का 40 प्रतिशत से ज्यादा। अफगानिस्तान के अंदर दुनिया का सबसे बड़ा लिथियम भंडार भी छिपा हुआ है, बस जरूरत है उसे धरती के गर्भ से निकालने और अब उस दुर्लभ लिथियम के भंडार को कौन बाहर निकालेगा, इसी पर दुनिया का पूरा खेल खेला जा रहा है।

लड़ाई में सबकुछ होता रहा बर्बाद
पिछले 40 सालों पर नजर डाले तों अफगानिस्तान में लड़ाई में सबकुछ गंवाया ही है। पहले सोवियत संघ के साथ लंबी लड़ाई और अफगानिस्तान के अंदर मौजूद कबिलों की आपसी लड़ाई और फिर अमेरिका का आक्रमण... और अब एक बार फिर से तालिबान का शासन....अफगानिस्तान को कभी भी स्थिर होने का मौका नहीं मिला। इन सबके बीच तालिबान ने फिर से साफ कर दिया है कि अफगानिस्तान में ना तो महिलाओं को आजादी दी जाएगी और ना ही नागरिकों को सामान्य अधिकार, यानि तालिबान राज में अफगानी नागरिक अपनी बुनियादी सुविधाओं और हुकूक से दूर ही रहेंगे। लेकिन, इन सबके बीच एक मौका चीन बनाता हुआ दिख रहा है। लेकिन, वो इस बात पर निर्भर करता है कि तालिबान किस तरह का राज अफगानिस्तान में कायम करता है। क्या तालिबान एक समावेशी सरकार बना पाएगा? क्या महिलाओं और अल्पसंख्यकों को बुनियादी अधिकार मिल पाएंगे? और क्या उन आतंकी संगठनों को रोकने में तालिबान कामयाब हो पाएगा, जो भारत, चीन या रूस में आतंक फैलाना चाहते हैं?

काबुल को कर्ज देगा बीजिंग
2003 से 2020 तक चीन की सेना, जिसे पीपुल्स लिबरेशन आर्मी कहा जाता है, उसके एक वरिष्ठ कर्नल रहे झोउ बो ने न्यूयॉर्क टाइम्स में एक ऑप-एड में लिखा, "अमेरिका की वापसी के साथ बीजिंग, काबुल को वह पेशकश कर सकता है जिसकी उसे सबसे ज्यादा जरूरत है, राजनीतिक निष्पक्षता और आर्थिक निवेश।" उन्होंने लिखा है कि, "अफगानिस्तान में बदले हालात के बीच चीन के लिए आर्थिक विकास को खोजना एक प्राइज की तरह ही होगा, और अफगानिस्तान के लिए एक वरदान की तरफ चीन साबिक होगा, क्योंकि चीन काफी तेजी से अफगानिस्तान में इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास कर सकता है और अफगानिस्तान की जमीन के अंदर छिपे एक ट्रिलियन डॉलर के खनिज तक पहुंच सकता है।

अफगानिस्तान पर चीन की नजर
चीनी विशेषज्ञ ने कहा कि चीन अभी अफगानिस्तान की नई परिस्थितियों को काफी करीब से मॉनिटर कर रहा है और अगले कुछ हफ्तों में ही साफ हो पाएगा कि अफगानिस्तान किस दिशा में आगे बढ़ रहा है। चीन का मानना है कि भले ही अमेरिका ने 20 सालों की लड़ाई अचानक खत्म कर दी हो और अमेरिका अपने सैनिकों को और अफगान शरणार्थियों को तेजी से अफगानिस्तान से निकालने में लगा हुआ है, लेकिन अमेरिका के पास अभी भी इतनी शक्ति है कि वो तालिबान को घुटनों के बल बैठने पर मजबूर कर सकता है। चीन का मानना है कि अमेरिका जब चाहेगा, उसी वक्त तालिबान को अलग-थलग कर सकता है और तमाम वैश्विक कंपनियों को अफगानिस्तान में निवेश करने से रोक सकता है, लिहाजा चीन अभी किसी भी तरह की कदम आगे बढ़ाने से पहले हर स्थिति को भांप लेना चाहता है। जी-7 की बैठक में भी सभी देशों ने एक स्वर में यही कहा कि तालिबान को मान्यता मिलेगी या नहीं, ये इस बात पर निर्भर करता है कि अफगानिस्तान में महिलाओं को आजादी मिलती है या नहीं या फिर अफगानिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति कैसी है।

तालिबान पर अमेरिकी प्रतिबंध
इसके साथ ही तालिबान पर अमेरिकी प्रतिबंध जारी है और यूनाइटेड नेशंस की लिस्ट में तालिबान अभी भी एक मोस्ट वांटेड आतंकी संगठन है और अगर चीन या फिर रूस ने यूनाइटेड नेशंस में तालिबान का साथ देने की कोशिश की तो अमेरिका वीटो का इस्तेमाल कर प्रस्ताव को गिरा सकता है। अमेरिका पहले ही अफगानिस्तान की करीब 9.5 बिलियन डॉलर की संपत्ति को फ्रीज कर दिया है और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अफगानिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक मदद में 500 मिलियन डॉलर की कमी कर दी है, लिहाजा चीन का मानना है कि तालिबान के लिए अफगानिस्तान की सरकार को चला पाना डेढ़ी खीर साबित हो सकता है। लिहाजा, इस वक्त चीन सिर्फ अफगानिस्तान की स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुआ है।

तालिबान के लिए रास्ता काफी मुश्किल
चीनी सेना के रिटायर्ट कर्नल और विश्लेषक झोउ ने कहा कि ''तालिबान के लिए प्रतिबंधित फंड तक पहुंचना इस बात पर निर्भर करता है कि वो आगे कैसे पेश आता है। वो अफगानिस्तान से शरणार्थियों को बाहर निकालने को लेकर कैसा व्यवहार करता है, महिलाओं के साथ कैसा सलूक करता है, अफगानिस्तान सरकार का साथ देने वाले लोगों के साथ का सलूक करता है और मानवाधिकार पर तालिबान का क्या रूख रहने वाला है? सैनिकों को वापस लेने के लिए 31 अगस्त की समय सीमा पर पहले से ही तालिबान तनाव बढ़ा चुका है। तालिबान ने अमेरिका को चेतावनी दी है कि वह "रेड लाइन" को पार न करे। फिर भी, तालिबान के पास संयम बरतने के कई कारण हैं। चीनी विश्लेषक ने कहा कि, काबुल भारी आर्थिक संकट की तरफ बढ़ रहा है और आने वाले वक्त में चावल, आटा, तेल से लेकर दवाईयों की कीमत में काफी ज्यादा इजाफा होने वाली है। हालांकि, तालिबान ने अफगानिस्तान रिजर्व बैंक का गवर्नर नियुक्त किया है, लेकिन वो एक मुर्ख उग्रवादी है, जिससे कमजोर मुद्रास्फीति और पूंजी नियंत्रण को कंट्रोल करना आसान नहीं होगा।

चीन को तालिबान से काफी उम्मीदें
चीनी विश्लेषक ने कहा कि तालिबान भी चाहता है कि उसके ऊपर से वैश्विक प्रतिबंध हटे। और उसने पिछले हफ्ते तालिबान के प्रवक्ता शाहीन सुहैल ने चीन की सरकारी न्यूज चैनल सीजीटीएन से बात करते हुए कहा कि ''अफगानिस्तान पर लगा आर्थिक प्रतिबंध अफगानिस्तान में पुननिर्माण की प्रक्रिया को काफी कमजोर कर देगा और प्रमुख आर्थिक प्रतिबंध का फैसला एकतरफा है जो अफगानिस्तान के लोगों के खिलाफ है।'' आतंकवादी समूह के नेताओं ने कहा है कि वे अच्छे अंतरराष्ट्रीय संबंध चाहते हैं, खासकर चीन के साथ। कम्युनिस्ट पार्टी समर्थित ग्लोबल टाइम्स ने रिपोर्ट किया है किस अफगानिस्तान में चीनी निवेशों को "व्यापक रूप से स्वीकार" किए जाने की संभावना है। एक अन्य रिपोर्ट में तर्क दिया गया कि "अमेरिका अब अफगानिस्तान के अंदर मौजूद दुर्लभ धातुओं और चीन के बीच दीवार बनने की स्थिति में नहीं है।'' इसके साथ ही चीनी मीडिया ने कहा कि 'अफगानिस्तान की स्थिति में चीन किसी भी तरह का कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा'

कुछ भी स्थायी नहीं रहता है-चीन
चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने पिछले हफ्ते कहा कि, "कुछ लोग अफगान तालिबान के प्रति अपने अविश्वास पर जोर देते हैं, लेकिन हम कहना चाहते हैं कि कुछ भी हमेशा के लिए स्थायी नहीं होता है''। उन्होंने कहा कि "हमें अतीत और वर्तमान को देखने की जरूरत है। हमें उनकी बातों को सुनने की जरूरत है और देखने की जरूरत है कि क्या उनका एक्शन उनकी बातों से मेल खाता है।'' आपको बता दें कि चीन ने करीब 20 बिलियन डॉलर का निवेश पाकिस्तान में कर रखा है और वो निवेश (बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव) अफगानिस्तान तक भी जाता है। ऐसे में चीन की कोशिश अफगानिस्तान के अंदर दुर्लभ खनिज संपदा तक पहुंचने की है, ताकि एकतरफा फायदा चीन को मिले।

अफगानिस्तान में दुर्लभ खजाना
आपको बता दें कि, अमेरिकी अधिकारियों ने 2010 में अनुमान लगाया था कि अफगानिस्तान में 1 ट्रिलियन डॉलर का खनिज भंडार धरती के अंदर मौजूद है। वहीं, अफगान सरकार ने दावा किया था कि अमेरिकी अनुमान से तीन गुना ज्यादा खनिज सामग्री मौजूद है, जिसमें लिथियन और तांबे का विशालकाय भंडार शामिल है और जो भी इस खनिज को निकालने का काम करेगा, उस देश की अर्थव्यवस्था रॉकेट की गति से ऊपर जाएगी, क्योंकि पूरा दुर्लभ खनिज उस देश के हाथों में होगी, जिसके बाद ना मोबाइल बन सकते हैं और ना ही इलेक्ट्रिक कार।












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