शी जिनपिंग ही बनेंगे तीसरी बार चीन के राष्ट्रपति? अगले हफ्ते कम्युनिस्ट पार्टी की बैठक में हटाए जाएंगे 'कांटे'
अगले हफ्ते चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की बैठक होने वाली है, जिसमें शी जिनपिंग को तीसरी बार राष्ट्रपति बनाने के लिए पार्टी के अंदर से सभी 'कांटे' हटाए जाएंगे।
बीजिंग, नवंबर 06: दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश चीन के अगले राष्ट्रपति शी जिनपिंग ही होंगे, इस बात पर पूरी तरह से मुहर अगले हफ्ते चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की बैठक में लगाए जाने की उम्मीद है। इसके साथ ही तय हो जाएगा, कि माओ के बाद चीन का सबसे शक्तिशाली नेता अगर कोई होगा, तो वो शी जिनपिंग हो सकते हैं, जो मरते दम तक चीन के राष्ट्रपति, चीन की सेना पीएलए के प्रमुख और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष बने रह सकते हैं। अगले हफ्ते होने वाली कम्यूनिस्ट पार्टी कांग्रेस की बैठक में ये तय किया जाएगा, कि चीन के पास अब शी जिनपिंग के अलावा कोई और विकल्प नहीं है।

बीजिंग में कम्युनिस्ट पार्टी की बैठक
सोमवार से गुरुवार तक कम्युनिस्ट पार्टी की सर्वशक्तिमान केंद्रीय समिति के करीब 400 सदस्य बंद दरवाजों के पीछे बीजिंग में इकट्ठा होंगे। इस साल इस तरह की यह एकमात्र बैठक होने वाली है, जो कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं बैठक होगी और इस बैठक में शी जिनपिंग को आधिकारिक तौर पर लगातार तीसरी बार चीन के राष्ट्रपति पद का कार्यभार सौंपे जाने की उम्मीद है और इसके साथ ही उनकी माओत्से तुंग के बाद चीन के सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में उनकी स्थिति को मजबूत कर देगा। चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के मुताबिक, अगले सप्ताह के पूर्ण सत्र में, चीन की शीर्ष हस्तियां अपने 100 वर्षों के अस्तित्व में पार्टी की मुख्य उपलब्धियों का जश्न मनाते हुए एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर बहस करेंगी।

शी जिनपिंग की सत्ता और होगी मजबूत
विश्लेषकों का कहना है कि चीन के इतिहास में इस तरह की बैठक होने का सिर्फ तीसरी बार प्रस्ताव पास किया गया है और 2022 में चीन कम्यूनिस्ट पार्टी कांग्रेस की सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है और उससे पहले इस बैठक में शी जिनपिंग की स्थिति पार्टी और भी ज्यादा मजबूत हो जाएगी। बीजिंग में होने वीली शीर्ष नेतृत्व की सभी तरह की बैठकों का आयोजन बंद दरवाजे के पीछे होगा और ऐसा माना जा रहा है कि, ज्यादातर फैसले पहले ही कर लिए गये हैं और बैठक के दौरान पार्टी के बाकी शीर्ष सदस्यों को सिर्फ उन फैसलों की जानकारी दी जाएगी। विश्लेषकों का कहना है कि, चीन की सभी राजनीतिक बैठकें पहले से ही पूरी तरह से कोरियोग्राफ की जा चुकी होती हैं और किसी भी सदस्य के लिए, चाहे वो कितने भी महत्वपूर्ण पद पर क्यों ना हों, उन फैसलों के खिलाफ उनका जाना अत्यंत दुर्लभ होता है।

तानाशाह उत्तराधिकारी
हालांकि, इस बैठक का संकल्प क्या होने वाला है, इसकी सामग्री अभी तक प्रकाशित नहीं की गई है, जैसा कि इससे पहले दो बार और ऐसा हो चुका है, जब संकल्प प्रकाशित नहीं किया गया था। लिहाजा माना जा रहा है कि, पार्टी के पास राष्ट्रपति के खिलाफ जाने का विकल्प नहीं है। इससे पहले 1945 में माओ के अधीन ऐसा प्रस्ताव पारित हुआ था, जिसने माओ को सत्ता पर कब्जा करने से चार साल पहले ही कम्युनिस्ट पार्टी पर अपना अधिकार मजबूत करने में मदद की। उसके बाद दूसरी बार ऐसी घटना 1981 में हुई थी, जब देंग शियाओपिंग ने भी संकल्प प्रस्ताव प्रकाशित नहीं होने दिया था और उन्होंने चीन के अर्थव्यवस्था के लिहाज से माओ की 'गलतियों' को पहचाना था और पार्टी के ऊपर अपना पूर्ण प्रभुत्व हासिल कर लिया था।

तानाशाह नहीं दिखना चाहते शी जिनपिंग
समाचार एजेंसी एएफपी से बात करते हुए हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के विश्लेषक एंथनी सैच मानते हैं, पिछले दो बार जैसा हुआ है, शी जिनपिंग के प्रस्ताव में उसपर ब्रेक नहीं लगेगा। चीनी राजनीति के विशेषज्ञ सैच ने कहा कि, "बल्कि, यह दिखाने का इरादा है कि शी उस पार्टी की स्थापना के बाद से एक प्रक्रिया के स्वाभाविक उत्तराधिकारी हैं जो उन्हें 'नए युग' में नेतृत्व करने के योग्य बनाती है।" उन्होंने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का जिक्र करते हुए कहा कि, "इसका उद्देश्य शी जिनपिंग को चायनीज कम्युनिस्ट पार्टी के 'शानदार इतिहास' के स्वाभाविक उत्तराधिकारी के रूप में मजबूत करना है।" सैच ने यह भी कहा कि, ''यह प्रस्ताव देंग के उस प्रस्ताव के मुताबिक पीछे हटने की है और 1949 से 1976 तक माओ युग की तुलना में कम आलोचनात्मक होगा।'' चीन में माओ के शासनकाल में लाखों लोग भूख से मर गये थे और हजारों लोगों को माओ ने विरोध करने पर मरवा दिया था। अपनी मौत से पहले चीन पर अपनी पकड़ सख्त करने के लिए माओ ने एक सांस्कृतिक क्रांति की शुरूआत कि, जिसे हिंसा का युग माना जाता है, जिसने चीन के राष्ट्रीय मानस को झकझोर दिया था।

माओ बनाम शी जनिपिंग
सैच ने यह भी कहा कि, ''यह प्रस्ताव देंग के उस प्रस्ताव के मुताबिक पीछे हटने की है और 1949 से 1976 तक माओ युग की तुलना में कम आलोचनात्मक होगा।'' चीन में माओ के शासनकाल में लाखों लोग भूख से मर गये थे और हजारों लोगों को माओ ने विरोध करने पर मरवा दिया था। अपनी मौत से पहले चीन पर अपनी पकड़ सख्त करने के लिए माओ ने एक सांस्कृतिक क्रांति की शुरूआत कि, जिसे हिंसा का युग माना जाता है, जिसने चीन के राष्ट्रीय मानस को झकझोर दिया था।

निर्विवाद दिखने की कोशिश
चीन के असंतुष्ट राजनीतिक विद्वान वू कियांग, जिन्हें उनके शोध की वजह से बीजिंग में सिंघुआ यूनिवर्सिटी में लेक्चरर के पद से बर्खास्त कर दिया गया था, उन्होंने कहा कि, इस प्रस्ताव के अनुमोदन का अर्थ यह दिखाने की होगा कि "शी जिनपिंग का अधिकार निर्विरोध है"। इसके साथ ही इस बैठक में ताइवान को लेकर भी एजेंडा शामिल किया जा सकता है, जो खुद को एक अलग संप्रभु देश मानता है। वाशिंगटन स्थित काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस में चीन को लेकर अध्ययन करने वाले वरिष्ठ विश्लेषक कार्ल मिंजनर के अनुसार, अगले सप्ताह की बैठक के बावजूद शी के निर्विरोध अधिकार पर कोई सवाल नहीं है। उन्होंने समाचार एजेंसी एफएपी से बात करते हुए कहा कि, "मुख्य मुद्दा यह है, कि वह कितना ऊंचा जा सकते हैं?" उन्होंने कहा कि, "संकल्प के स्वर और सामग्री से कुछ सुझाव मिलने की संभावना है कि शी किस तरह से अपना चित्र बनाा चाहते हैं, माओ और देंग के बराबर के रूप में? या सिर्फ माओ के अकेले के रूप में?"












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