कोविड-19 पर नये रिसर्च में बड़ा दावा, इस तरह के बच्चों को बड़ा खतरा, ये लक्षण देखें, तो फौरन हों सतर्क

करोलिंस्का इंस्टिट्यूट के शोधकर्ताओं ने प्राथमिक इम्युनोडेफिशिएंसी रोगों के ऊपर गहरा रिसर्च किया है।

वॉशिंगटन, सितंबर 19: कोविड-19 पर किए गये नये रिसर्च में बच्चों को लेकर बड़े खतरे का पता चला है, लिहाजा पैरेंट्स को सावधान रहने की सलाह दी गई है। अमेरिका में किए गये नये रिसर्च में पता चला है, कि विशिष्ट इम्युनोडेफिशिएंसी बीमारियों वाले बच्चों में जीन में असामान्यताएं होती हैं जो वायरल संक्रमण के खिलाफ शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को नियंत्रित करती हैं, लिहाजा इस तरह की बीमारी से पीड़ित बच्चों में मौत की आशंका काफी ज्यादा होती है। ये अध्ययन जर्नल ऑफ एलर्जी एंड क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। इस रिसर्च में कहा गया है कि, SARS-CoV-2 कोरोनावायरस से संक्रमित ज्यादातर बचों में हल्की बीमारी ही विकसित करते हैं या फिर कोई और लक्षण नहीं दिखाते हैं, लेकिन एक छोटे प्रतिशत के लिए, गंभीर जटिलताएं विकसित हो सकती हैं।

मौत की आशंका सबसे ज्यादा

मौत की आशंका सबसे ज्यादा

अध्ययन का नेतृत्व करने वाले करोलिंस्का इंस्टिट्यूट के बायोसाइंसेज एंड न्यूट्रिशन विभाग के प्रोफेसर कियांग पैन-हैमरस्ट्रॉम ने कहा कि, "SARS-CoV-2 से संक्रमित प्राथमिक इम्युनोडेफिशिएंसी रोगों वाले बच्चों में मृत्यु दर बहुत अधिक है। हमारे परिणाम बताते हैं कि गंभीर COVID-19 या मल्टी-इनफ्लेमेट्री सिंड्रोम (MIS-C) वाले बच्चों में बुनियादी प्रतिरक्षाविज्ञानी परीक्षा और आनुवंशिक विश्लेषण किया जाना चाहिए।' उन्होंने कहा कि,'इस टेस्ट को करने के बाद ही डॉक्टर इस बीमारी से पीड़ित बच्चों को उनके अनुवांशिक परिवर्तनों के आधार पर अधिक सटीक उपचार करने में कामयाब होंगे।" हालांकि, ये संक्रमण प्राथमिक इम्युनोडेफिशिएंसी रोगों वाले रोगियों को कैसे प्रभावित करता है, यानि, प्रतिरक्षा प्रणाली के वंशानुगत और जन्मजात रोग वाले बच्चों पर कैसा प्रभाव डालता है, ये अभी भी विवादास्पद है, लेकिन इन रोगियों में भी, कुछ गंभीर COVID-19 से पीड़ित हैं, जो गंभीर लक्षणों का अनुभव करते हैं।

जेनेटिक्स पर कोविड वायरस का प्रभाव

जेनेटिक्स पर कोविड वायरस का प्रभाव

डीएनए पर कोविड वायरस का का प्रभाव पड़ता है, इस सवाल का जवाब जानने के लिए डॉक्टरों की टीम ने काफी बारीकी से रिसर्च किया है और करोलिंस्का इंस्टिट्यूट के शोधकर्ताओं ने प्राथमिक इम्युनोडेफिशिएंसी रोगों (जिन्हें प्रतिरक्षा की जन्मजात त्रुटियां भी कहा जाता है, IEI) के साथ युवा रोगियों का भी अध्ययन किया है, जो कोविड 19 से गंभीर तौर पर पीड़ित हैं। इस तरह के रोगियों के आनुवंशिक और प्रतिरक्षाविज्ञानी विश्लेषण भी किए गए हैं। कियांग पैन-हैमरस्ट्रॉम कहते हैं है कि, "हमारे परिणाम इन प्रतिरक्षा रोगों के आणविक तंत्र को स्पष्ट करते हैं, जिसके जरिए हमें एक ऐसा रास्ता मिला है, जिसके जरिए हम पूरी तरह से टारगेट बनाकर कोविड का इलाज कर सकते हैं। इस रिसर्च से हमें जो जानकारी मिली है, उससे हम गंभीर COVID-19 बीमारी के उपचार और रोकथाम के लिए बेहतर रणनीति विकसित कर सकते हैं।'

31 बच्चों पर किया गया रिसर्च

31 बच्चों पर किया गया रिसर्च

इस अध्ययन में पांच महीने से 19 साल की उम्र के 31 बच्चों को शामिल किया गया था। सभी बच्चों को आणविक निदान के बिना किसी न किसी प्रकार की प्राथमिक इम्यूनोडिफ़िशिएंसी बीमारी थी और वे गंभीर COVID-19 वायरस से पीड़ित थे। प्रतिभागियों को ईरान में अगस्त से सितंबर 2020 तक भर्ती किया गया था। किसी भी बच्चे को COVID-19 का टीका नहीं लगाया गया था। रिसर्च में पाया गया कि, एक तिहाई से अधिक बच्चों में से ग्यारह, संक्रमण से जटिलताओं के कारण मर गए। पांच बच्चों, 16 प्रतिशत, ने मल्टी-इनफ्लेमेट्री सिंड्रोम, एमआईएस-सी के मानदंडों को पूरा किया। कुछ बच्चों में कोरोनावायरस के प्रति एंटीबॉडी की कमी थी। करोलिंस्का इंस्टिट्यूट और अध्ययन के बायोसाइंसेज एंड न्यूट्रिशन विभाग के सहायक प्रोफेसर हसन अबोलहसानी ने कहा कि, "इससे पता चलता है कि इस प्रकार की प्रतिरक्षा बीमारी वाले कई बच्चे एंटीवायरल एंटीबॉडी का उत्पादन नहीं कर सकते हैं और इसलिए टीकाकरण का पूरा लाभ नहीं होगा।"

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