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ब्रिटिश सांसद वीरेंद्र शर्माः बस ड्राइवर से ब्रिटिश पार्लियामेंट तक

वीरेंद्र शर्मा
Twitter@VirendraSharma
वीरेंद्र शर्मा

लेबर पार्टी के भारतीय मूल के नेता वीरेंद्र शर्मा 1968 में जब ब्रिटेन आए थे तो वो लंदन में एक बस ड्राइवर की नौकरी किया करते थे.

73 वर्षीय वीरेंद्र शर्मा 12 दिसंबर का चुनाव जीत कर भारतीय मूल के सबसे वरिष्ठ सांसद बन गए.

वो जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के लिए ब्रिटिश सरकार से सालों से माफ़ी की माँग कर रहे हैं.

वो कहते हैं, "मैंने ही इस मुहिम की यहाँ शुरुआत की थी. हम प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन से भी माँग करेंगे कि ब्रिटिश सरकार 1919 में हुए इस हत्याकांड के लिए औपचारिक तौर से माफ़ी माँगे."

इस बार वीरेंद्र शर्मा को पूरी उम्मीद है कि "बोरिस इसके लिए तैयार हो जाएंगे. ये मेरी पार्टी के चुनावी घोषणापत्र के अहम वादों में एक था. हम बोरिस से कहेंगे कि इसे पूरा वो करें."

पाँचवीं बार लगातार संसद का चुनाव जीतने वाले शर्मा इस बार चुनाव जीतने वाले भारतीय मूल के 15 सांसदों में से एक हैं.

वीरेंद्र शर्मा
Twitter@VirendraSharma
वीरेंद्र शर्मा

बस ड्राइवर की नौकरी

इन्हें उम्मीद है कि ये 15 सांसद ब्रिटेन और भारत के बीच संबंध को मज़बूत बनाने में हमेशा की तरह एक अहम भूमिका निभाते रहेंगे.

वे कहते हैं, "यूरोप से अलग होने के बाद ब्रिटेन को भारत से संबंध और भी घनिष्ठ करने होंगे. हमारी इसमें भूमिका अहम होगी."

शर्मा ट्रेड यूनियन से शुरू से ही जुड़े रहे हैं. ट्रेड यूनियन वाली सारी खूबियाँ अब भी उनके अंदर मौजूद हैं.

वो आत्मविश्वास और साहस के लिए जाने जाते हैं जिनकी झलक उनकी बातों में मिलती है. वो कहते हैं कि मज़दूरों के लिए उनका दिल अब भी धड़कता है.

"मैंने बस ड्राइवर की नौकरी के बाद ट्रेड यूनियन से जुड़े रहने के अलावा और कुछ नहीं किया."

पंजाब और दिल्ली में इनके रिश्तेदार और दोस्त काफ़ी हैं. वो भारत अक्सर जाया करते हैं.

ट्रेड यूनियन की राजनीति

भारतीय मूल के लोक प्रिय सांसद प्यारा सिंह खाबड़ा के देहांत पर 'ईलिंग साऊथहॉल' की ख़ाली सीट से वो 2007 में चुनाव जीत कर पहली बार सांसद बने.

सूट-बूट और टाई पहने वीरेंद्र शर्मा किसी यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर से कम नहीं लग रहे थे.

लेकिन लगातार पाँचवीं बार चुनाव जीतने और कई अहम समितियों का हिस्सा होने के बावजूद उनकी शख़्सियत सादगी भरी है.

हम लंदन के पंजाबी आबादी वाले इलाक़े साउथहॉल में भारतीय मज़दूरों की यूरोप में सबसे पुरानी संस्था इंडियन वर्कर्स एसोसिएशन के दफ़्तर में बैठे उनका इंतज़ार कर रहे थे.

वो इस दफ़्तर से एक किलोमीटर दूर एक लोकल मीडिया को इंटरव्यू दे रहे थे.

सिख, पाकिस्तानी और हिंदू

इंटरव्यू ख़त्म करके वो पैदल ही वहाँ से हमारे पास मिलने आ गए. उनके साथ कोई सुरक्षा कर्मी नहीं था. उनका कोई सहयोगी भी नहीं था.

इतने वरिष्ठ सांसद को पैदल अकेले चलते देख कर हैरानी हुई.

वो जब अंदर आए तो इमारत में कोई खलबली नहीं मची. उन्हें कोई रिसीव करने नहीं आया. वो और वहाँ मौजूद लोग पंजाबी भाषा में बातें करने लगे.

उनका ये अपना चुनावी क्षेत्र है. 'ईलिंग साउथहॉल' चुनावी क्षेत्र में 18 प्रतिशत सिख और 11-11 प्रतिशत पाकिस्तानी और हिंदू भी रहते हैं.

शायद इसी कारण भारत की सियासत पर सीधा जवाब देने से वो कतराते हैं. मैंने जब भारत में मौजूदा सियासी बेचैनी पर सवाल किया तो वो इसका गोल-मोल जवाब दे गए.

ख़ालिस्तान की चर्चा

वीरेंद्र शर्मा के चुनावी क्षेत्र के कई गुरुद्वारों में ख़ालिस्तान की चर्चा एक बार फिर से ज़ोर पकड़ रही है. ऐसा पूरे ब्रिटेन में हो रहा है.

वीरेंद्र शर्मा के विचार में ये पूरी तरह से सही नहीं है.

भारत सरकार से अच्छे संबंध बनाकर रखना, अपने चुनावी क्षेत्र में सिख, हिंदू और पाकिस्तानी मतदाताओं की भावनाओं के बीच ये याद रखना कि वो ब्रिटिश पार्लियामेंट के सांसद हैं, काफ़ी मुश्किल काम लगता है.

सालों से इस संतुलन को बनाकर रखना वीरेंद्र शर्मा की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक होगी.

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