चीन को दुश्मन देश घोषित करेगा ब्रिटेन, जानिए कैसे एक तीर से कई शिकार करेंगी लिज ट्रस
ब्रिटेन की नवनियुक्त प्रधानमंत्री, लिज ट्रस जल्द से जल्द अधिक कठोर रुख अपनाना चाहती हैं, ताकि वह लड़खड़ाती सत्ता को मजबूत आधार दे सकें।
चीन (China) की मौजूदा वैश्विक स्थिति ऑस्ट्रेलिया समेत कई पश्चिमी देशों के लिए चिंता का सबब बना हुआ है। विश्व के विकसित देश चीन को न केवल अर्थव्यवस्था के लिहाज से बल्कि सामरिक दृष्टि से भी भारी चुनौती मान रहे हैं। इसी बीच ब्रिटेन में लिज ट्रस (Liz Truss) की सरकार ने चीन को औपचारिक रूप से 'खतरा' घोषित करने पर काम करना शुरू कर दिया है। ब्रिटेन की नवनियुक्त प्रधानमंत्री, लिज ट्रस जल्द से जल्द अधिक कठोर रुख अपनाना चाहती हैं, ताकि वह लड़खड़ाती सत्ता को मजबूत आधार दे सकें।

ब्रिटेन के कदम से चीन हो सकता है नाराज
लिज ट्रस का यह नया फैसला चीन के प्रति ब्रिटेन की आधिकारिक स्थिति को रूस पर उसके रुख के करीब लाएगा। रूस को ब्रिटेन के सामने सबसे तीव्र खतरा घोषित किया जा चुका है। हालांकि इस प्रक्रिया के बाद बीजिंग की ओर से नाराजगी तय मानी जा रही है। जानकारी के मुताबिक चीन को 'खतरा' देश घोषित करना सरकार के एजेंडे में पहले से ही शामिल था लेकिन यह इस साल के अंत में किया जाना था। लेकिन द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक अब इस पर फैसला कुछ ही दिनों की भीतर किया जा सकता है। लिज ट्रस के इस कदम से पार्टी में उनकी स्थिति मजबूत हो सकती है। इसके साथ ही उनका लक्ष्य अर्थव्यवस्था से लोगों का ध्यान हटाकर चीन की तरफ शिफ्ट करना है।

कंजरवेटिव पार्टी के सांसदों ने किया स्वागत
मंगलवार की रात सत्ताधारी पार्टी के सांसदों ने इस कदम का स्वागत किया है। इयान डंकन स्मिथ, जो विदेश मामलों की चयन समिति के अध्यक्ष बनने के लिए प्रचार कर रहे हैं, ने कहा कि ब्रिटेन की चीन नीति का सख्त होना लंबे समय से अपेक्षित था। पार्टी के पूर्व नेता ने कहा कि अब समय आ गया है कि हम अनदेखी करना बंद कर दें और यह स्वीकार करें कि चीन हमारे जीवन जीने के तरीके के लिए खतरा है, और अब समय आ गया है कि हम रूस के साथ जैसा व्यवहार कर रहे हैं, चीन के साथ भी उसी तरह का व्यवहार करें।

ऋषि सुनक ने भी चीन पर जताया था कड़ा रुख
चीन के प्रति ब्रिटेन का रुख तभी स्पष्ट हो गया था जब ब्रिटेन में अगस्त महीने में कंजरवेटिव पार्टी के नेता चुनाव प्रचार में लगे हुए थे। लिज ट्रस और ऋषि सुनक दोनों ने ही चीन का खतरा बताते हुए इस देश के खिलाफ बयानबाजी की थी। लिज ट्रस ने चीन की टेक कंपनियों जैसे कि टिक-टॉक के मालिक और अन्य शॉर्ट-वीडियो प्लेटफॉर्म पर भी नकेल कसने की बात कही थी। ट्रस के साथ चुनावी मुकाबला कर रहे ब्रिटेन के पूर्व वित्त मंत्री और भारतीय मूल के राजनेता सुनक ने तो अपने चुनावी अभियान में बार-बार कहा कि वे ब्रिटेन में चल रहे चीनी-वित्त पोषित कन्फ्यूशियस संस्थानों को बंद करेंगे, जो यूके के विश्वविद्यालयों में चीनी संस्कृति और भाषा को बढ़ावा देने के नाम पर चीनी जासूसी का काम कर रहे हैं।

कैसे दूसरे देश में दखल देता है चीन?
बतादें कि चीन ने कई देशों में कन्फ्यूशियस संस्थान खोल रखे हैं। इन्हें चीन की सरकार से सीधे फंडिंग मिलता है। इस फंडिंग के आधार पर ये दूसरे देशों के कॉलेज या यूनिवर्सिटीज से संपर्क करते हैं और वहां पर चीनी भाषा सिखाने या चीनी संस्कृति सिखाने की बात करते हैं। चीन से आए इन संस्थानों का इरादा केवल भाषा और संस्कृति के बारे में बोलना-बताना नहीं, बल्कि युवाओं को अपने प्रभाव में लाना भी है। वैसे तो ये सांस्कृतिक लेनदेन की बात करते हैं लेकिन धीरे-धीरे ये होस्ट यूनिवर्सिटी की पढ़ाई-लिखाई में सीधा दखल देने लगते हैं। चूंकि ये काफी पैसे देते हैं इसलिए संस्थान इन्हें अलग भी नहीं कर पाते हैं। हालांकि बीते कई सालों से ये अपनी पॉलिसी और तौर-तरीकों को लेकर विवादों में रहे हैं।

8 साल में चीन-ब्रिटेन के संबंध हुए खराब
चीन के प्रति ब्रिटेन का रुख एक दशक से भी कम समय में नाटकीय रूप से बदल गया है। 2015 में डेविड कैमरन की सरकार में चीन का ब्रिटेन संग संबंध बेहद मधुर रहा था। 2015 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ब्रिटेन की यात्रा भी की थी। बीजिंग ने संकेत दिया कि वह ब्रिटेन में परमाणु ऊर्जा जैसे सामरिक उद्योगों में निवेश करने का इच्छुक है। लेकिन जैसे-जैसे शी ने चीन में अपने विरोधियों को ठिकाने लगाया, ब्रिटेन में कंजरवेटिव पार्टी के नेताओं के बीच चिंता बढ़ती गई। इससे पहले मंगलवार को जासूसी एजेंसी जीसीएचक्यू के प्रमुख जेरेमी फ्लेमिंग ने कहा था कि उपग्रह स्थान प्रणाली और डिजिटल मुद्राओं जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों में नियंत्रण और निगरानी क्षमताओं का फायदा उठाने के बीजिंग के प्रयास "हम सभी के लिए खतरा" का प्रतिनिधित्व करते हैं।












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