ब्रिटेन-अमरीका संबंध: क्या ईरान के मुद्दे पर दोनों देशों की दोस्ती टूट सकती है?

ब्रिटेन और अमरीका के 'ख़ास रिश्तों' के बारे में सालों तक कई तरह की अनाप-शनाप बातें की जाती रहीं. इतिहास, भाषा और साझा मूल्यों को लेकर दोनों देशों की लंबी साझेदारी रही है. आज़ादी की लड़ाई के दोनों देशों ने साथ ख़ून बहाया है और इसकी क़ीमत चुकाई है. नॉर्मैंडी का सागर तट इसका गवाह रहा है. लेकिन दोनों ही देशों के रिश्तों में वक़्त बेवक़्त उतार-चढ़ाव आते रहे हैं. स्वेज़ नहर पर आक्रमण और वियतनाम की लड़ाई, इतिहास की वो घटनाएं हैं जब दोनों मुल्कों के रिश्ते बेहद खट्टे हो गए थे. अमरीका में स्कूली बच्चों को आज भी याद दिलाया जाता है कि वो ब्रितानी लोग ही थे जिन्होंने साल 1814 में व्हाइट हाउस को जला दिया था. इसलिए ब्रिटेन और अमरीका के ख़ास रिश्तों या फिर दोस्ती में अलगाव के बारे में जब बात की जाती है तो इसके संदर्भ का हवाला ज़रूर दिया जाना चाहिए.

शरलॉट चार्ल्स, हैरी डन की मां
BBC
शरलॉट चार्ल्स, हैरी डन की मां

मतभेद के मुद्दे

ब्रिटेन और अमरीका के बीच जारी मौजूदा तनाव को लेकर भी ये बात लागू होती है. इसमें शक नहीं कि दोनों देशों के बीच कई मुद्दों को लेकर बहुत सारे मतभेद हैं.

हैरी डन की हत्या का मामला ताज़ा है और अब दुनिया के सामने है. पिछले साल अगस्त में हैरी की कार दुर्घटना में मौत हो गई थी. कार दुर्घटना के लिए जिम्मेदार महिला एनी सैकूलस एक अमरीकी खुफिया अधिकारी की पत्नी हैं. अमरीका ने इस मामले में एनी सैकूलस के प्रत्यर्पण से इनकार कर दिया है.

ब्रिटेन का कहना है कि इंसाफ़ के लिए एनी सैकूलस की कूटनीतिक छूट को ख़त्म कर दिया जाना चाहिए जबकि अमरीका की दलील है कि ऐसा करने से दुनिया भर में अमरीकी कूटनयिकों को मिली सुरक्षा कमज़ोर पड़ जाएगी. ये एक ऐसा मामला है जिसे सुलझने में लंबा वक़्त लग सकता है.

बड़ी टेक्नॉलॉजी कंपनियों पर यूरोप दो फीसदी की दर से डिजिटल सर्विस टैक्स लगाना चाहता है. ब्रिटेन और अमरीका के बीच इसे लेकर मतभेद हैं क्योंकि ज़्यादातर बड़ी टेक्नॉलॉजी कंपनियां अमरीकी हैं. ब्रिटेन का मानना है कि गूगल और फ़ेसबुक को उनके देश में जो फायदा हो रहा है, उस पर टैक्स लगना चाहिए.

लेकिन अमरीका का कहना है कि ऐसा कोई टैक्स एकतरफ़ा होगा और ऐसा हुआ तो ब्रितानी कारों की बिक्री पर भी जवाबी टैक्स लगाया जा सकता है. ब्रिटेन के लिए ये एक धमकी की तरह ही है. अमरीका ने ये भी चेताया है कि डिजिटल सर्विस टैक्स लगाए जाने की सूरत में ब्रेग़्जिट के बाद ब्रिटेन से कारोबारी समझौता मुश्किल होगा.

चीनी कंपनी ख़्वावे
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चीनी कंपनी ख़्वावे

चीनी कंपनी ख़्वावे का मामला

हमें चीनी कंपनी ख़्वावे (Huawei) का मामला भी नहीं भूलना चाहिए. माना जा रहा है कि आने वाले हफ़्तों में ब्रिटेन में 5G इंफ़्रास्ट्रक्चर में चीनी कंपनी ख़्वावे को इजाजत देने का फ़ैसला ले सकती है.

ब्रिटेन का कहना है कि ख़्वावे की मदद के बिना उनके देश में सुपरफास्ट ब्रॉडबैंड टेक्नॉलॉजी की लॉन्चिंग में देरी हो सकती है और इससे ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को नुक़सान होगा. अमरीका का कहना है कि ख़्वावे का संबंध चीन की सरकार से है और इस कंपनी से सुरक्षा को ख़तरा हो सकता है.

इसके बाद अमरीका ने ब्रिटेन को एक और धमकी दी, इस बार ये कहा गया कि खुफिया जानकारी ब्रिटेन के साथ साझा नहीं की जाएगी.

फिर बारी आई ईरान की. ब्रिटेन अपने यूरोपीय सहयोगियों के साथ ईरान परमाणु करार को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है. उसका मानना है कि ये समझौता भले ही कितना ही कमज़ोर क्यों न पड़ जाए, वो बचाने लायक है और उसे बचाया जाना चाहिए.

अमरीकी झंडा
AFP
अमरीकी झंडा

क़ासिम सुलेमानी की हत्या के बाद

संयुक्त राष्ट्र के निरीक्षकों को इस बात की अभी जांच करनी है कि ईरान के पास किस तरह की परमाणु क्षमता है. इस समझौते में ईरान के साथ बातचीत की अभी गुंजाइश बची हुई है. अमरीका को ये लगता है कि परमाणु करार से ईरान की आमदनी बढ़ी और जिसका इस्तेमाल उसने मध्य पूर्व में चरमपंथ बढ़ाने के लिए किया.

क़ासिम सुलेमानी की हत्या के मामले में भी अमरीका ब्रिटेन को पहले से जानकारी देने में नाकाम रहा. इतना काफी नहीं था तो ब्रिटेन के रक्षा सचिव बेन वैलेस ने हाल ही में संडे टाइम्स को एक इंटरव्यू में ये सुझाव दिया कि ब्रिटेन को बिनी अमरीकी मदद के ही लड़ाई की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए.

उन्होंने कहा, "हम अमरीकी गठबंधन का हमेशा हिस्सा बने रहेंगे. ये मान्यता साल 2010 की थी. हम जिस दिशा में बढ़ रहे हैं, उससे अब ऐसा नहीं लगता है." किसी भी लिहाज से एक ब्रितानी मंत्री के मुंह ये बात सुनना सामान्य नहीं लगता.

ब्रिटेन और अमरीका के संबंधों की मौजूदा स्थिति में एक गरमाया हुआ कूटनीतिक विवाद है, ट्रेड वार की संभावना है, खुफिया जानकारी साझा करने को लेकर असहमति है और विदेश नीति के मोर्चे पर दुनिया जिस मुद्दे का सामना करना है, उसे लेकर बुनियादी मतभेद हैं.

ब्रिटेन अमरीका संबंध
PA
ब्रिटेन अमरीका संबंध

अचानक ऐसा क्या हुआ?

ब्रिटेन और अमरीका के बीच कई मुद्दों को लेकर असहमति है. ऐसा क्या हुआ कि दोनों देशों के रिश्तों में समझदारी कम पड़ने लगी? इसकी वजहों पर हम आगे बात करेंगे.

  1. ब्रिटेन विदेश नीति के मोर्चे पर स्वतंत्र रुख अपना रहा है. ऐसा केवल अमरीका के साथ नहीं है. नई कंजर्वेटिव सरकार के पास संसद में स्पष्ट बहुमत है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसका रुख आत्मविश्वास से भरा है.
  2. ब्रिटेन ब्रेग़्टिज को लेकर दुनिया के सामने अपनी अलग छवि पेश करना चाहता है. व्हाइटहॉल में ग्लोबल ब्रिटेन शब्द फिर से सुना जाने लगा है. यूरोपीय संघ से निकलना, दुनिया से कटना है, सरकार इस विचार का मुकाबला करना चाहती है, और इस सिलसिले में वो अपनी भूमिका नए सिरे से तलाश रहा है.
  3. ब्रेग़्जिट के बाद ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अपने रिश्ते सुधारना चाहता है, ख़ासकर विदेश नीति के मोर्चे पर. ब्रितानी कूटनयिक ईरान के मुद्दे पर फ्रांस और जर्मनी के साथ लगातार सहयोग कर रहे हैं.
  4. एक गणित ये भी है कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप उस नेता का आदर करेंगे जो अपने राष्ट्रीय हितों के लिए खड़ा है. दुनिया भर के नीति निर्माता इस बात को समझने लगे हैं कि अमरीकी राष्ट्रपतियों की हर धमकी अमल में नहीं लाई जाती है.

मुमकिन है कि दोनों देशों के मतभेदों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा हो. अधिकारी इस बात पर जोर देते हैं कि इन मुद्दों पर ब्रिटेन अमरीका से उलझने की कोई जानबूझकर कोशिश नहीं कर रहा है. बात सिर्फ़ इतनी सी है कि ब्रिटेन कई नीतिगत मुद्दों पर ज़्यादा व्यावहारिक नज़रिया अपना रहा है और स्वतंत्र राष्ट्र स्वतंत्र फ़ैसले लेते हैं.

अब सवाल सिर्फ़ इतना ही है कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप कैसे जवाब देंगे.

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