Explainer: भारत के पड़ोसी देश में चीन समर्थक सरकार का पतन, मालदीव विवाद के बीच मिली बड़ी खुशखबरी
Bhutan's elections: भारत से करीबी रिश्ता रखने वाले देश भूटान में 9 जनवरी को हुए चुनाव में शेरिंग टोबगे और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने भूटान में पूर्व नौकरशाह पेमा चेवांग और अपेक्षाकृत नई, भूटान टेंड्रेल पार्टी (बीटीपी) को हराकर चुनाव में जीत हासिल की है।
पीडीपी ने राष्ट्रीय संसद में 47 में से 30 सीटें जीतीं हैं, जिसमें 3.2 लाख भूटानी मतदाताओं (पंजीकृत 5 लाख में से) ने मतदान किया। यह नवंबर 2023 के प्राथमिक चुनाव के बाद हुआ था, जिससे लोटे शेरिंग की सत्तारूढ़ केंद्र-वाम ड्रुक न्यामरूप त्शोग्पा पार्टी सहित तीन पार्टियां हारकर बाहर हो गईं थीं।

58 साल के शेरिंग टोबगे एक संरक्षणवादी और पूर्व सिविल सेवक हैं, जिनके पास हार्वर्ड विश्वविद्यालय से सार्वजनिक प्रशासन में मास्टर डिग्री है। उन्होंने 2007 में उदारवादी पीडीपी की स्थापना की थी और 2013 से 2018 तक भूटान के प्रधान मंत्री के तौर पर काम किया था।
लिहाजा, यहां आपको भूटान में लोकतंत्र, हाल ही में संपन्न चुनावों और भारत के लिए उनके क्या मायने हैं, इसके बारे में जानने की जरूरत है।
भूटान का आशाजनक युवा लोकतंत्र
पाकिस्तान और बांग्लादेश के विपरीत, जहां चुनावों की निष्पक्षता हमेशा सवालों के घेरे में रहती है, भूटान के चुनाव अपेक्षाकृत काफी सीधे और सरल रहे हैं और चुनाव के बाद विपक्ष की तरफ से ना तो चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए गये हैं और ना ही छेड़छाड़ की शिकायत की जाती है।
पिछले साल नवंबर में सत्ताधारी पार्टी को मिली हार के बाद भी, सरकार की तरफ से कोई कार्रवाई या हिंसा नहीं की गई और राजनीति से प्रेरित आरोपों पर किसी भी विपक्षी नेता को जेल में नहीं डाला गया।
यह एक बड़ी उपलब्धि है, विशेषकर तब से, जब भूटान हाल ही में 2008 में राजशाही से संसदीय लोकतंत्र में परिवर्तित हुआ है। भूटान में अभी भी राजा के नाम पर शासन किया जाता है, हालांकि, आकर्षक राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक के पास वास्तविक राजनीतिक अधिकार बहुत कम है।
15 साल पहले, पहला चुनाव होने के बाद से, भूटान की लोकतांत्रिक प्रणाली काफी विकसित हुई है। जबकि राजशाही खत्म होने के बाद पहले चुनाव में सिर्फ दो पार्टियां प्रतिस्पर्धा करने के योग्य थीं, लेकिन इस बार के चुनाव में पांच पार्टियां शामिल थीं। इसके अलावा, इस बार के चुनाव में सभी पार्टियों के पास अपने चुनावी वादे थे और मतदादाओं को फैसला करवा था, कि वो किस पार्टी को पसंद करते हैं।
हालांक, अभी भी ऐसा कहा जा रहा है कि, भूटान का लोकतंत्र, असली लोकतंत्र से कोसों दूर है। वॉशिंगटन आधारित राजनीतिक वकालत समूह फ्रीडम हाउस मीडिया सेंसरशिप और धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव का हवाला देते हुए देश को "आंशिक रूप से स्वतंत्र" बताता है। भूटानी राजनीतिक वर्ग के बीच जवाबदेही की कमी को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।

भूटान की प्रमुख आर्थिक चिंताएं
इस वर्ष का चुनाव, भूटान में निराशाजनक आर्थिक बैकग्राउंड के बीच हुआ है। भूटान का पर्यटन उद्योग अभी भी कोविड-19 महामारी के प्रभाव से जूझ रहा है, और देश में युवा बेरोजगारी दर 29 प्रतिशत के करीब है। वहीं, भूटान की आधी से ज्यादा आबादी 30 वर्ष से कम उम्र की है और उन्हें 'युवा' के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
इसके अलावा, डेटा से पता चलता है, कि भूटान में आठ में से एक व्यक्ति "भोजन और अन्य आवश्यकताओं के लिए अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा है"। पिछले पांच वर्षों में, भूटान की जीडीपी औसतन लगभग 1.7 प्रतिशत की कछुआ गति से बढ़ी है। इससे बेहतर अवसरों की तलाश में रिकॉर्ड संख्या में युवा भूटान से ऑस्ट्रेलिया जैसी जगहों पर पलायन कर रहे हैं।
ये आर्थिक चिंताएं जीते हुए नेता टोबगे के सफल अभियान के केंद्र में थीं। उन्होंने 3 अरब डॉलर की भूटान अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए आवश्यक निवेश को प्रोत्साहित करने और बेरोजगारी से निपटने का वादा किया है, जिसके बारे में उनका कहना है कि भूटान से "बड़े पैमाने पर पलायन" के पीछे वह कारण है।
भारत के लिए भूटान चुनाव का महत्व
भारत भूटान का सबसे बड़ा दाता और सहयोगी बना हुआ है, और इसकी आर्थिक सुधार में मदद करने में महत्वपूर्ण रहा है। भारत, देश में कई बुनियादी ढांचा पहलों को वित्त पोषित कर रहा है, जिसमें एक नई घोषित रेलवे परियोजना भी शामिल है। भूटान में भी नेपाल की तरफ हाईड्रोपावर प्रोजेक्ट है और माना जा रहा है, बिजली खरीदकर भारत भूटान की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में एक अहम योगदान देने जा रहा है।
लेकिन हाल के वर्षों में, भूटान भी भारत और चीन के बीच भी शत्रुता का अखाड़ा रहा है। डोकलाम, एक सीमावर्ती क्षेत्र है जिस पर चीन और भूटान दोनों दावा करते हैं, 2017 में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प हुई थी। इस सप्ताह एनडीटीवी की एक रिपोर्ट में सैटेलाइट तस्वीरों के जरिए दावा किया गया है, कि भूटान के काफी जमीन पर चीन ने कब्जा कर लिया है और वहां पर गांवों का निर्माण शुरू कर चुका है।
हालांकि, अभी भी भूटान, चीन के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं रखता है। लेकिन, पिछले प्रधान मंत्री, लोटे शेरिंग ने अक्टूबर 2023 में बीजिंग के साथ एक संयुक्त सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें दोनों के बीच सीमा को निर्धारित करने के लिए एक संयुक्त तकनीकी टीम के निर्माण की बात कही गई थी।
लोटे शेरिंग को चीन समर्थक माना जाता है, और उन्होंने चीन के साथ बातचीत को आगे बढ़ाने में काफी दिलचस्पी दिखाई थी। कई रिपोर्ट्स में कहा गया है, कि चीन ने प्रधानमंत्री लोटे शेरिंग को डोकलाम के बदले एक पैकेज का ऑफर किया था, जिसके तहत भूटान को डोकलाम के ऊपर से दावा छोड़ना था और बदले में चीन, भूटान के बाकी हिस्सों से दावा छोड़ देता। लेकिन, अब लोटे शेरिंग की सरकार गिर चुकी है और नई सरकार भारत समर्थक है, लिहाजा अगले पांच सालों तक भूटान की तरफ से किसी निगेटिव खबरों के आने की संभवना खत्म मानी जा रही है।












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