• search

BBC SPECIAL: आधुनिक विज्ञान में अरब जगत का कितना प्रभाव?

Subscribe to Oneindia Hindi
For Quick Alerts
ALLOW NOTIFICATIONS
For Daily Alerts
    Islam
    Getty Images
    Islam

    आधुनिक विज्ञान की अगर बात करें तो उसमें चीनी, यूनानी, मिस्री, बेबेलोयिन और भारतीय सभ्यता का काफ़ी प्रभाव रहा है लेकिन अरबों के प्रभाव की चर्चा कम ही होती है.

    आप चाहें अल-जबरा (बीज गणित) की बात करें या अल-कीमिया और अल-गोरिदम की. आप पाएंगे कि सभी की उत्पत्ति एक ही जगह से हुई है. अगर अल-जबरा नहीं होता तो आधुनिक गणित और भौतिकी (फ़िजिक्स) जैसे विषय भी नहीं होते. वहीं पैटर्न को समझने के विज्ञान अल-गोरिदम के बिना कंप्यूटर विज्ञान जैसे विषयों का होना भी संभव नहीं था.

    बग़दाद, दमिश्क, काहिरा और कार्डोबा में 9वीं से लेकर 12वीं शताब्दी के बीच विज्ञान के क्षेत्र में शानदार काम हुआ था.

    दुनिया की सभ्यताओ के बीच विज्ञान से जुड़ी जानकारियों का आदान-प्रदान का सिलसिला सदियों से चलता रहा है.

    वैज्ञानिक अपने व्यक्तिगत विचार (आइडिया) दूरदराज़ के देशों जैसे ग्रीस, भारत और चीन के वैज्ञानिकों के साथ साझा कर रहे थे.

    गेटी इमेज
    Getty Images
    गेटी इमेज

    इन वैज्ञानिकों ने एक-दूसरे के विचारों पर मंथन किया. उन्हें आपस में मिलाकर उन्होंने विज्ञान को विकसित किया.

    उस वक़्त दुनिया में विज्ञान के जितने भी बड़े केंद्र थे, उनमें बग़दाद का नाम सब जानते थे. बग़दाद में उस वक़्त सबसे मज़बूत वैज्ञानिकों और विचारों की एक विस्तृत श्रृंखला का जमघट था.

    यही वजह थी कि बग़दाद को उस दौर में विश्व का केंद्र कहा जाने लगा था.

    बग़दाद एक नया शहर था. इसे 762 ईस्वी में ख़लीफ़ा अल-मंसूर ने बनवाया था.

    वो चाहते थे कि बग़दाद इस्लाम द्वारा एकजुट हुए साम्राज्य की गौरवशाली राजधानी बने. ये वो दौर भी था जब इस्लाम बहुत तेज़ी से फैल रहा था.

    तभी ख़लीफ़ा अब्बासिद ने ये घोषणा कर दी कि शासन करने का अधिकार सिर्फ़ उनके पास है क्योंकि वो सीधे पैग़ंबर मोहम्मद से संबंधित थे जिन्होंनेइस घटना से क़रीब 100 साल पहले नए धर्म की स्थापना की थी.

    इसके बाद इस्लाम की सेनाओं ने बहुत ही कम समय में एक विशाल क्षेत्र पर विजय प्राप्त कर ली थी.

    इसकी शुरुआत मदीना के आसपास एक छोटे से इलाक़े से हुई थी, जो अब सऊदी अरब कहलाता है.

    लेकिन बहुत तेज़ी से ये लोग अरब प्रायद्वीप में फैल गए और कुछ दशकों में उन्होंने लेवेंट, उत्तरी अफ़्रीका, स्पेन और फ़ारस के एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया.

    गेटी इमेज
    Getty Images
    गेटी इमेज

    विज्ञान के कारण

    सीज़र और नेपोलियन जैसे सम्राटों को देखकर आठवीं शताब्दी की शुरुआत में ही इस्लाम के ख़लीफ़ा को ये बात समझ आ गई थी कि राजनीतिक शक्ति और वैज्ञानिक ज्ञान, दोनों साथ-साथ चलते हैं.

    इसके कई कारण थे जिनमें से कुछ बहुत ही व्यावहारिक थे.

    जैसे चिकित्सकीय ज्ञान जीवन बचा सकता है. सैन्य तकनीक की मदद से युद्ध जीते जा सकते हैं. गणित की मदद से राज्य की वित्त संबंधी जटिलताओं से निपटा जा सकता है.

    एक धर्म के रूप में इस्लाम ने भी एक मौलिक भूमिका निभाई. पैग़ंबर मोहम्मद ने भी उनपर विश्वास करने वालों से कहा था कि ज्ञान की तलाश में भले ही चीन क्यों न जाना पड़े, पर जब कुछ नया सीखने को मिले, तो उस मौक़े को खोना नहीं चाहिए.

    इसके अलावा भी कई कारण थे जिन्होंने स्थितियाँ बदलीं.

    मसलन, इस्लामिक साम्राज्य के अभिजात वर्ग के कुछ शासकों ने ये कहना शुरू किया कि ज्ञान एक 'स्वार्थी उद्देश्य' के लिए भी हासिल करना चाहिए. उन्होंने कहा कि इस्लाम जैसे एक नए साम्राज्य के लिए ये इसलिए भी ज़रूरी है ताकि वो बाकी दुनिया को ये प्रमाण दे सके कि उनका साम्राज्य औरों से श्रेष्ठ है.

    गेटी इमेज
    Getty Images
    गेटी इमेज

    बेबेल का टावर

    हालांकि, इसमें एक समस्या भी थी.

    वो समस्या ये थी कि ख़लीफ़ा को अब न सिर्फ़ सैन्य और राजनीतिक सफलता की चिंता करनी थी, बल्कि बड़ी बुद्धिमानी से एक विशाल विविध आबादी को भी नियंत्रित करना था.

    दरअसल, एक बड़े इलाक़े में लोगों ने इस्लाम कबूल तो कर लिया था और इस्लामिक साम्राज्य का विस्तार भी हो गया था. लेकिन साम्राज्य में पड़ने वाले इलाक़े बहुत दूर-दूर थे. वहाँ की परंपराएं और भाषा अलग-अलग थी.

    आठवी शताब्दी के मध्य में इस्लामिक साम्राज्य के नेता, ख़लीफ़ा अब्दुल मलिक को भाषाओं की इस समस्या का प्रबंधन करने का एक तरीक़ा ढूंढना पड़ा.

    उनका ये समाधान पैमाने पर तो भारी था, लेकिन उसने अनजाने में ही एक वैज्ञानिक पुनर्जागरण की नींव रखी.

    नौकरशाही की अराजकता को नियंत्रित करने के लिए, अब्दुल मलिक ने तय किया कि इस्लाम इतने बड़े साम्राज्य (भूमि) को सिर्फ़ बेबेल के टावर से नियंत्रित नहीं कर सकता.

    वो चाहते थे कि पूरे साम्राज्य की एक ही भाषा हो, जिसे वो भी समझ सकें. इसलिए एक नई भाषा के तौर पर उन्होंने 'अरबी' की माँग की.

    नया सीखने का जुनून

    वैज्ञानिक सोच का परिणाम तत्काल दिखने लगा.

    विभिन्न देशों के अकादमिक लोग, जिनके पास पहले संवाद करने का कोई तरीक़ा ही नहीं था, अब एक भाषा बोलने लगे थे.

    क़ुरान के ख़ुशनवीसों से कहा गया कि वो ये सुनिश्चित करें कि भाषा के कुछ अक्षर आसान हों, उसमें चिन्हों का इस्तेमाल हो और उन्हें जोड़कर लिखा जा सके.

    इसके पीछे एक मक़सद तो ये ही था कि भाषा इतनी सटीक और स्पष्ट हो कि उसका इस्तेमाल वैज्ञानिक और तकनीकी कार्यों में भी किया जा सके.

    साथ ही ख़लीफ़ा चाहते थे कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों के शिक्षाविदों के बीच चर्चा हो सके. जो उस समय तक एक-दूसरे को देखकर ही क्रोधित हो जाया करते थे.

    ये भी एक बड़ी सच्चाई रही है कि अकादमिक लोग सिर्फ़ ज्ञान अर्जित करने के लिए इतने प्रेरित नहीं हो सकते. इसलिए पैसा भी एक बड़ी वजह था.

    गेटी इमेज
    Getty Images
    गेटी इमेज

    पर वो कैसे?

    इस्लामिक साम्राज्य के शासकों ने एक बेहद महत्वाकांक्षी परियोजना तैयार की और उसमें भारी निवेश भी किया. हिन्दी में उस योजना को 'अनुवाद का आंदोलन' कहना ग़लत नहीं होगा.

    इस योजना के तहत होना ये था कि दुनिया भर के पुस्तकालयों को खंगालना था. फिर उनसे उनकी भाषा में लिखे गए वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के लेख इक्ट्ठा करने थे.

    इसके बाद उन्हें अपने साम्राज्य में लाकर उनका अनुवाद अरबी भाषा में किया जाना था.

    प्राचीन ग्रंथों को खोजने में विद्वानों ने उस वक़्त जो प्रयास किये, वो अद्भुत थे.

    अकादमिक लोगों की इसमें इसलिए भी दिलचस्पी थी कि किसी एक क़िताब को तैयार करके ख़लीफ़ा की लाइब्रेरी से जोड़ना एक बेहद आकर्षक सौदा माना जाता था.

    कहानी ये भी है कि एक ख़लीफ़ा अल-मामुन तो क़िताबों के इतने शौक़ीन थे कि वो अपने दूतों को सिर्फ़ एक क़िताब हासिल करने के लिए दूर से दूर भेजने को तैयार रहते थे.

    कई किस्से हैं जिनमें उल्लेख है कि ख़लीफ़ा को जिस दूत ने उनकी पसंदीदा क़िताब लाकर दी, उन्होंने उसे सोने से तोल दिया.

    ख़लीफ़ा अल-मामुन ने उस ज़माने में एक नामी विद्वान को ज़मीन का आकार मापने का काम भी सौंपा था.

    क़िताबों का संकलन करने में जो अकादमिक लोग उस वक़्त मदद करते थे उन्हें 500 सोने की मुद्राएं दी जाती थीं. आज की क़ीमत से तुलना करें तो क़रीब 25,000 अमरीकी डॉलर प्रति माह. अकादमिक लोगों के लिए ये एक बड़ी राशि थी.

    इसके अलावा अकादमिक लोगों का समाज में बहुत ज़्यादा सम्मान भी था.

    गेटी इमेज
    Getty Images
    गेटी इमेज

    बग़दाद जैसा कुछ नहीं

    बग़दाद, काहिरा और समरकंद में यही हो रहा था. वहाँ सामग्री का संग्रह किया जा रहा था, उसका अनुवाद हो रहा था, विश्लेषण, भंडारण और संरक्षण भी किया जा रहा था.

    बग़दाद एक बेहद सभ्य और जीवंत शहर बन गया था. उस समय के एक यात्री ने लिखा है, "मैं जिस विद्वान से बग़दाद में मिला, उसकी तुलना में कोई भी बुद्धिमान नहीं है. धर्मविदों की तुलना में कहीं ज़्यादा विश्वासयोग्य. सभी कवियों से बड़ा कवि. और इतना स्वतंत्र कि लापरवाही का अहसास होने लगे."

    शहर के बौद्धिक लोगों के लिए एक प्रणाली तैयार की गई थी जिसे 'मजलिस' का नाम दिया गया था. 'मजलिस' शब्द का अनुवाद 'असेंबली' या 'बड़ी सभा' के रूप में किया जा सकता है.

    बग़दाद में नौवीं शताब्दी आते-आते ये व्यवस्था इतनी विस्तृत हो गई कि ख़लीफ़ा, उनके दरबारी और सेनापति ऐसी नियमित बैठकें आयोजित करने लगे जिनमें शहर के प्रमुख बुद्धिजीवियों जैसे कि दार्शनिकों, धर्मविदों, खगोलविदों और कलाकारों को भी विचार रखने और चर्चा करने के लिए आमंत्रित किया जाने लगा.

    लेकिन इन मजलिसों की सबसे दिलचस्प बात ये थी कि इन बैठकों में किसी भी धर्म को मानने वाले लोग आ सकते थे. ये भी ज़रूरी नहीं था कि वो किसी विशेष विचार को मानते हों. ये एक खुला मंच था.

    इन सभाओं में बस एक ही चीज़ अनिवार्य थी. वो थी, अरबी भाषा में बोलना ताकि ख़लीफ़ा बोलने वाले की बात समझ सके. साथ ही ज़रूरी था कि बोलने वाले के पास अपनी बात कहने का एक मज़बूत तार्किक कारण हो.

    ख़लीफ़ाओं ने उल्लेख किया है कि मजलिसों के आयोजन का एक ही कारण था कि साम्राज्य के सबसे बुद्धिमान लोगों को सामने लाना, उनकी बात सुनना और विचारों पर ग़ौर करना. ताकि बुद्धि के साथ प्रभाव और ताक़त का एक मिश्रण बनाया जा सके.

    मजलिसों के 'बौद्धिक मंथन' से ही गणित की शाखाओं पर चर्चा आगे बढ़ी. मेडिसन के क्षेत्र में प्रगति हुई और रसायन शास्त्र के लिए भी मौलिक प्रगति का रास्ता खुला.

    ये उन शताब्दियों के दौरान इस्लाम की दुनिया में विज्ञान पर जो कार्य हुआ, उसकी कहानी है. ये इतिहास किसी एक खोज तक सीमित नहीं है. ये उससे कहीं अधिक है.

    कहा जाए कि ये विज्ञान के सार्वभौमिक सत्य के बारे में है, तो कुछ ग़लत नहीं होगा.

    मध्य-युगीन इस्लामिक वैज्ञानिकों की जो सबसे मुख्य उपलब्धि है वो ये है कि उन्होंने स्थापित किया कि विज्ञान का इस्लाम, हिंदू, यहूदी, बौद्ध या ईसाई धर्म से कोई लेना-देना नहीं है.

    इसपर कोई भी संस्कृति अपना विशेष दावा नहीं कर सकती.

    इससे पहले कि विज्ञान दुनिया भर में बिखरा रह जाता, इस्लाम के स्वर्ण युग के विद्वानों ने सीमाओं की परवाह किये बिना ज्ञान को एकत्र किया और एक 'विशाल वैज्ञानिक पहेली' का पुनर्निर्माण किया.

    इससे न सिर्फ़ नए विज्ञान तक पहुँचने में मदद मिली, बल्कि विज्ञान ने ये साफ़ कर दिया कि वो राजनीतिक सीमाओं को लांघकर और धार्मिक संबद्धताओं को तोड़कर मानवता को लाभ दे सकता है.

    यही एक विचार है जो आज भी प्रासंगिक है और लोगों को प्रेरणा देता है.

    ये भी पढ़ें-

    जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

    BBC Hindi
    देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
    English summary
    BBC SPECIAL How much of the Arab world is in modern science

    Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
    पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.

    X