बांग्लादेश में कब-कब घोंटा गया लोकतंत्र का गला? पूरी टाइमलाइन

Bangladesh Crisis: बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफा देकर देश छोड़ने के बाद वहां की सेना ने जिस तरह से सत्ता को अपने नियंत्रण में लिया है, वह पहली बार नहीं हुआ है। बांग्लादेश का जन्म लोकतंत्र के लिए चले लंबे मुक्ति संग्राम के बाद हुआ है, लेकिन यहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था बार-बार खतरे में पड़ी है।

बांग्लादेश को अपने निर्माण के समय भी पाकिस्तानी हिंसा और दमन का सामना करना पड़ा और बीच-बीच में सेना की ओर से हुए तख्तापलट की वजह से भी वहां का लोकतंत्र घायल हुआ है। कुछ राष्ट्र-विरोध कट्टरपंथी ताकतों की वजह से इस मुल्क के लोकतंत्र को एक बार फिर से सिसकने को मजबूर किया गया है।

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बांग्लादेश में कब-कब घोंटा गया लोकतंत्र का गला?
1947: जब भारत का विभाजन हुआ तो मुस्लिम-बहुल इलाके वाला दो हिस्सा पाकिस्तान बना, जिसे पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान कहा गया। 1971 में आजाद बांग्लादेश बनने तक यह पूर्वी पाकिस्तान कहलाया।

1970: शेख मुजीबुर्रहमान की अगुवाई वाली आवामी लीग पूर्वी पाकिस्तान में हुए चुनाव में जबर्दस्त तरीके से जीती। लेकिन, पश्चिमी पाकिस्तान ने इस चुनाव परिणाम को मानने से इनकार कर दिया। इसके खिलाफ शेख हसीना के पिता मुजीबुर्रहमान रहमान ने स्वतंत्रता संघर्ष शुरू कर दिया, जो 'मुक्ति संग्राम' कहलाया।

1971: भारत के सहयोग से पश्चिमी पाकिस्तानी सेना की बुरी तरह हार हुई और आवामी लीग की अगुवाई में बांग्लादेश के रूप में एक स्वतंत्र देश की स्थापना हुई। बांग्लादेश में इसी समय लोकतंत्र की नींव पड़ी। इस समय पाकिस्तान ने शेख मुजीबुर्रहमान को अपने मुल्क में कैद कर रखा था।

1972: आवामी लीग के नेता शेख मुजीबुर्रहमान पाकिस्तान से बांग्लादेश लौटे और देश के पहले प्रधानमंत्री बने। उन्होंने देश को आगे बढ़ाने की तमाम कोशिशें कीं, लेकिन पूरी सफलता नहीं मिल पाई।

1974: बांग्लादेश में बहुत ही भयानक बाढ़ आई, जिससे फसलें तो तबाह हो ही गईं, एक अनुमान के मुताबिक 28,000 लोगों की मौत हो गई। सरकार ने आपातकाल घोषित किया और राजनीतिक विरोध शुरू हो गया।

1975: उन्हीं हालातों में मुजीबुर्रहमान बांग्लादेश के राष्ट्रपति बन गए। राजनीतिक हालात बद से बदतर होती चली गई। उस साल भी अगस्त में ही सैन्य तख्तापलट में उनकी हत्या कर दी गई और मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। मतलब, पाकिस्तान से आजादी मिलने पर जो लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम हुई थी, उसे सेना ने रौंद दिया।

1977: जब बांग्लादेश सैन्य शासन के अधीन था तो वहां के संविधान ने इस्लाम को अपना लिया।

1979: सेना के चहेते जियाउर रहमान के राष्ट्रपति रहते हुए चुनाव करवाए गए और उन्हीं की बांग्लादेश नेशनल पार्टी को जीत मिली। इसके बाद फिर से लोकतंत्र स्थापित हुआ और मार्शल लॉ समाप्त किया गया।

1981: एक बार फिर संक्षिप्त सैन्य तख्तापलट हुआ और उसी दौरान जियाउर रहमान की भी हत्या हो गई। उनकी जगह अब्दुस सत्तार राष्ट्रपति बने।

1982: एक बार फिर से सेना ने तख्तापलट कर दिया और जनरल हुसैन मोहम्मद इरशाद ने सत्ता अपने कब्जे में ले ली। उन्होंने संविधान भी निलंबित कर दिया और राजनीतिक पार्टियों पर भी रोक लगा दी।

1986: संसदीय और राष्ट्रपति के चुनाव करवाए गए। इरशाद पांच साल के लिए चुने गए। उन्होंने मार्शल लॉ हटा लिया और फिर से संविधान बहाल किया।

1987: विपक्ष के विरोध प्रदर्शनों और हड़ताल के बाद एक बार फिर से आपातकाल घोषित किया गया।

1988: इरशाद के कार्यकाल में ही बांग्लादेश को मुस्लिम राष्ट्र घोषित कर दिया गया। लेकिन, 1990 में भारी विरोध प्रदर्शनों के बाद उन्हें एक बार फिर गद्दी छोड़नी पड़ गई।

1991: पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान की विधवा बेगम खालिदा जिया प्रधानमंत्री बनीं। इसके बाद संविधान में बदलाव करके यहां राष्ट्रपति का पद नाम मात्र का कर दिया गया और सारे अधिकार प्रधानमंत्री के पास आ गए।

1996: एक बार फिर से अवामी लीग सत्ता में लौटी और शेख मुजीबुर्रहमान की बेटी शेख हसीना वाजेद पहली बार प्रधानमंत्री बनीं।

1998: शेख हसीना के कार्यकाल में ही 1975 में उनके पिता की हत्या के मामले में 15 पूर्व सैन्य अधिकारियों को मौत की सजा सुनाई गई।

2001: शेख हसीना बांग्लादेश के इतिहास में पहली प्रधानमंत्री बनीं, जिन्होंने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया था। इसी साल अक्टूबर में वो बेगम खालिदा जिया की नेशनलिस्ट पार्टी और उसकी सहयोगियों से चुनावों में हार गई थीं।

2004: इस साल बांग्लादेश के लोकतंत्र का सम्मान तब और बढ़ा जब संविधान में संशोधन करके 45 सीटें महिला सांसदों के लिए आरक्षित कर दी गई।

2007: चुनावों के दौरान हिंसा की वजह से आपातकाल घोषित किया गया। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अहमद ने चुनाव रद्द कर दिया और केयरटेकर सरकार का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया।

उसी साल शेख हसीना पर हत्या का आरोप लगा और जेल में डाल दी गईं। बेगम खालिदा जिया को एक तरह से घर में ही नजरबंद कर दिया गया। भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान में कई राजनेताओं को जेल में डाल दिया गया। उसी साल अगस्त में आपातकाल का विरोध कर रहे छात्रों के साथ पुलिस के हिंसक संघर्ष शुरू हो गए।

2008: स्थानीय चुनाव करवाए गए तो लगा कि लोकतंत्र की बहाली हो रही है। अवामी लीग समर्थित उम्मीदवारों का प्रदर्शन शानदार रहा। दिसंबर में आम चुनाव हुए और आवामी लीग संसद की 300 में से 250 सीटें जीत गई।

2009: जनवरी में शेख हसीना फिर से प्रधानमंत्री बनीं।

2014: विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने संसदीय चुनावों का बहिष्कार कर दिया। प्रधानमंत्री के तौर पर शेख हसीना का तीसरा कार्यकाल शुरू हुआ।

2018: विपक्ष की नेता खालिदा जिया को भ्रष्टाचार के मामले में पांच साल कैद की सजा सुनाई गई।

2019: बांग्लादेश में फिर चुनाव हुए और आवामी लीग 300 में से 288 सीटें जीत गई और शेख हसीना लगातार तीसरी बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं।

2024: इस साल जनवरी में हुए संसदीय चुनाव में आवामी लीग 300 में से 224 सीटें जीती और शेख हसीना लगातार चौथी बार पीएम बनीं।

5 अगस्त, 2024: बांग्लादेश की पांच बार की प्रधानमंत्री शेख हसीना को राज्य में युवाओं और पुलिस के हिंसक संघर्ष के बाद इस्तीफा देना पड़ा और देश छोड़कर निकलने को मजबूर हो गईं।

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