तबाही का खतरा: अंटार्कटिका से आई डरावनी रिपोर्ट, रिकॉर्ड किया गया अब तक का अधिकतम तापमान
नई दिल्ली, 2 जुलाई: इंसान विकास के पथ पर आगे बढ़ता जा रहा है, लेकिन उसकी कीमत प्रकृति को चुकानी पड़ रही। जिस वजह से आने वाले दिनों में दुनिया के सामने नई मुसीबतें आ सकती हैं। इसको लेकर संयुक्त राष्ट्र ने भी रिपोर्ट जारी की, जिसके मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग की वजह से अंटार्कटिका के तापमान में तेजी से इजाफा हो रहा है। अगर सभी ने वक्त रहते कड़ा कदम नहीं उठाया, तो कई जगहों पर भीषण तबाही मच सकती है।

18 डिग्री के पार तापमान
अंटार्कटिका में इस साल अधिकतम 18.3 डिग्री सेल्सियस (64.9 डिग्री फारेनहाइट) तापमान रिकॉर्ड किया गया। संयुक्त राष्ट्र विश्व मौसम विज्ञान संगठन (यूएन डब्लूएमओ) ने इसकी पुष्टि की है। इसके अलावा पिछले 50 सालों में वहां के तापमान में 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। यूएन डब्लूएमओ के महासचिव पेटेरी तालास के मुताबिक अंटार्कटिका के लिए ये अधिकतम तापमान था, जो एस्पेरांजा अनुसंधान केंद्र ने रिकॉर्ड किया। इससे पहले 2015 में तापमान 17.5 डिग्री सेल्सियस तक गया था।

20 डिग्री वाली रिपोर्ट खारिज
उन्होंने आगे कहा कि अंटार्कटिक प्रायद्वीप पृथ्वी पर तेजी से गर्म होने वाली जगहों में से एक है। इसका पूरा कारण ग्लोबल वार्मिंग है, जिस पर सभी देशों को मिलकर काम करना चाहिए। वहीं सीमोर द्वीप पर स्थित ब्राजीलियाई स्वचालित पर्माफ्रॉस्ट मॉनिटरिंग स्टेशन ने उच्चतम रीडिंग 20.75 डिग्री सेल्सियस बताई थी, लेकिन यूएन डब्लूएमओ ने इसे खारिज कर दिया। उनके मुताबिक 18.5 ही अब तक का अधिकतम तापमान है।
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तबाही से तापमान का क्या लेना-देना?
दरअसल अंटार्कटिका पृथ्वी का दक्षिणतम महाद्वीप है, जो पूरी तरह से बर्फ से ढका है। इसके अलावा ये एशिया, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका के बाद पृथ्वी का पांचवां सबसे बड़ा महाद्वीप है, जो 140 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला है। अगर वहां का तापमान बढ़ता है, तो जाहिर सी बात है कि बर्फ तेजी से पिघलेगी, ऐसे में समुद्र का जलस्तर बढ़ जाएगा। जिससे कई देशों के तटीय इलाके डूब सकते हैं या फिर उससे बड़ी तबाही भी आ सकती है। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक 1979 के मुकाबले 2017 में अंटार्कटिका में बर्फ पिघलने की रफ्तार 6 गुना बढ़ गई थी।












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