अमेरिका को किसने दिया टारगेट किलिंग का लाइसेंस? भारत पर भड़कने वाले पश्चिम का पाखंड देखिए...
India-Canada Row: विदेशी धरती पर राजनीतिक हत्याएं या "टारगेट किलिंग" हमेशा से बहस का विषय रही हैं। अतीत में ऐसे सैकड़ों मामले सामने आ चुके हैं, जब किसी देश की सत्ता को अस्थिर करने के लिए, किसी देश की सत्ता को पलटने के लिए या फिर विदेशी धरती पर दुश्मन को ढेर करने के लिए टारगेट किलिंग किए गये हैं और अमेरिका इसके लिए कुख्यात रहा है।
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने जून महीने में खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के पीछे भारतीय एजेंट्स के शामिल होने की संभावना जताई है। हालांकि, भारत आधिकारिक तौर पर इन आरोपों को खारिज कर चुका है, लेकिन एक मिनट के लिए अगर मान लिया जाए, कि कनाडा के आरोप सही हैं, तो फिर हकीकत ये है, कि संयुक्त राज्य अमेरिका और उसका करीबी सहयोगी इजराइल, वास्तव में ऐसी गैर-न्यायिक हत्याओं के मामले में ज्यादा शामिल रहे हैं।

टारगेट किलिंस से क्या हासिल होता है?
किसी देश या उसके शासन द्वारा अवांछित व्यक्तियों, अधिकारियों या समूहों की हत्या की कहानी, जो उन्हें खतरा मानता है, उसका एक लंबा इतिहास रहा है।
ऐसा कहा जाता है, कि लक्षित हत्याएं एक आतंकवादी समूह को काफी हद तक बाधित कर सकती हैं, क्योंकि मारे गए नेताओं की कमी को समान रूप से अनुभवी और सक्षम सहयोगियों से भरना मुश्किल है। इसके अलावा, टारगेट किलिंग से वो ग्रुप कमजोर भी हो जाता है।
इसके अलावा, दूसरी बात ये होती है, कि अकसर मारे गये नेता का जगह भरने के लिए उस संगठन में झगड़े शुरू हो जाते हैं।
तीसरा बात ये, कि हत्या के बाद, समूह अक्सर आक्रामक होने के बजाय रक्षात्मक हो जाता है। अब यह इस बात पर अधिक समय देता है कि लक्ष्य बनने से कैसे बचा जाए। परिणामस्वरूप, समूह के नेता कम्युनिकेशन को कम कर देते हैं, अपना स्थान बदलते रहते हैं और इस क्रम में उनकी शक्ति लगातार कमजोर होती चली जाती है।
लिहाजा, निज्जर की मौत से निश्चित तौर पर खालिस्तान कमजोर हुआ है, जो भारत का विभाजन करना चाहता है। निज्जर, भारत के पंजाब में कमोबेश ख़त्म हो चुके अलगाववादी आंदोलन को पुनर्जीवित कर रहा था। वह दुनिया भर में खालिस्तान समर्थकों का प्रमुख कॉर्डिनेटर था।
पाकिस्तान की जासूसी इकाई इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस के साथ घनिष्ठ संबंध होने के कारण, उसने पैसे और ड्रग्स का लालच देकर भारत में हिंसा में शामिल होने के लिए कैडरों की भर्ती की। भारत सरकार ने उसे आतंकवादी घोषित कर दिया था और इंटरपोल से उसे पकड़ने को कहा था।
भारत ने कनाड को निज्जर को लेकर कई डोजियर सौंपे थे और दर्जनों सबूत सौंपे थे, लेकिन कनाडा इस आतंकी को पालता रहा।
हालांकि, भारत इस बात से साफ़ इनकार करता है, कि निज्जर की हत्या में उसकी ख़ुफ़िया एजेंसियों की कोई भूमिका थी। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ज़ोर देकर कहा कि लक्षित हत्याएँ भारत की राज्य नीति नहीं हैं। वह इस राष्ट्रीय सहमति को दर्शाते हैं, कि कनाडाई प्रधान मंत्री जस्टिन ट्रूडो बिना किसी विश्वसनीय सबूत के "संभावित संलिप्तता" के "विश्वसनीय आरोपों" के आधार पर भारत को दोषी घोषित नहीं कर सकते।

पश्चिमी देशों का दोगलापन
दूसरी तरफ, आतंकियों को पनाह देने वाले कनाडा के कई विशेषज्ञ मांग कर रहे हैं, कि "भारत पर कार्रवाई की जानी चाहिए और अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी लोकतंत्रों को नई दिल्ली के साथ अपने संबंधों को कम करना चाहिए, और देश को शोक संतप्त परिवार को हर्जाना (मौद्रिक मुआवजा) देना चाहिए।"
कार्लटन यूनिवर्सिटी के नॉर्मन पैटर्सन स्कूल ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स में अंतरराष्ट्रीय मामलों की एसोसिएट प्रोफेसर लीह वेस्ट कहती हैं, ''इसमें कोई सवाल नहीं है, कि भारतीय आचरण गैरकानूनी है। यह संप्रभुता का गैरकानूनी उल्लंघन है और कनाडा के अंदर राज्य की शक्ति का गैरकानूनी प्रयोग है।''
लेकिन संप्रभुता की बात करने वाले पश्चिम अपने डबल गेम को भूल जाते हैं, या फिर ऐसा जताने की कोशिश करते हैं, कि उन्हें ऐसा करने का हक था।
जैसे रूस पर जब साल 2006 में ब्रिटेन में केजीबी के पूर्व एजेंट अलेक्जेंडर लिट्विनेंको को मार डालने का आरोप लगा, तो फौरन पश्चिम ने रूस पर प्रतिबंध लगा दिए थे।
इसके अलावा, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान पर साल 2018 में तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में अमेरिका में रहने वाले सऊदी पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या के आरोप लगे। इसके साथ ही, पश्चिमी देश, उत्तर कोरिया के तानाशाह के सौतेले भाई किम जोंग नाम की हत्या का हवाला देते हैं। किम जोंग उन पर आरोप हैं, कि उनके कहने पर साल 2017 में कुआलालंपुर के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर नर्व एजेंट वीएक्स लगाकर उन्होंने अपने सौतेले भाई की हत्या कर दी थी।
लेकिन, ये पश्चिमी देश अपने टारगेटेड किलिंग को भूल जाते हैं।

पश्चिम देशों के टारगेटेड किलिंग
पश्चिमी विशेषज्ञ और राजनीतिक अभिजात वर्ग भारत पर आरोप लगाने से पहले ये भूल जाते हैं, कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने 2011 में पाकिस्तान में एक सुरक्षित घर में अल कायदा सुप्रीमो ओसामा बिन लादेन को मार डाला था।
वे यह भी भूल जाते हैं, कि 2022 में काबुल में एक अमेरिकी ड्रोन हमले में लादेन के उत्तराधिकारी अयमान अल-जवाहिरी को अमेरिका ने ही मारा था।
वे इस बात का जिक्र करने से भी बचते हैं, कि कैसे एक अन्य अमेरिकी ड्रोन ने 2020 में बगदाद के हवाई अड्डे पर ईरान के विदेशी संचालन संगठन कुद्स फोर्स डायरेक्टर कासिम सुलेमानी की हत्या कर दी थी।
ऐसा लगता है, कि अमेरिका ने अपने करीबी सहयोगी इज़राइल से सीखा है, कि विदेशी धरती पर अवांछित विदेशी दुश्मनों को निशाना बनाने के लिए ड्रोन का उपयोग कैसे किया जाता है।
इज़राइल ने मुख्य रूप से ड्रोन या हवाई हमलों के माध्यम से फिलिस्तीनी आतंकवादियों को लगातार निशाना बनाया है। विडंबना यह है, कि अमेरिका ने पहले हेलीकॉप्टरों, एफ-16 लड़ाकू विमानों और सशस्त्र ड्रोनों द्वारा इजरायल की लक्षित हत्याओं की आलोचना की थी, क्योंकि उसकी राय में, ये अंतरराष्ट्रीय और मानवीय कानून का उल्लंघन थे।
लेकिन 11 सितंबर 2001 को ओसामा बिन लादेन ने जब ट्विन टावर्स पर हमला किया था और फिर तत्कालीन जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया। बराक ओबामा लगातार दो टर्म में अफगानिस्तान में युद्ध लड़ते रहे, इसके अलावा सीरिया, इराक जैसे देशों में बमबारी करते रहे।
लेकिन, ये देश अब भारत को नसीहत और ज्ञान देने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, भारत ने भी कड़ा रूख अख्तियार किया हुआ है और कनाडा को भारत सरकार, मुंह तोड़ जवाब दे रही है।












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