अफगानिस्तान पर फंस गये जो बाइडेन, आतंकियों से ‘शांति समझौते’ पर फिर बात करेगा अमेरिका, SRAR का गठन
अफगानिस्तान में आतंकियों से समझौते की राह पर अमेरिका फिर बढ़ चला है। अमेरिका ने कहा है कि अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया के लिए बातचीत फिर से शुरू होगी।
वाशिंगटन/काबुल: अफगानिस्तान में आतंकियों से समझौते की राह पर एक बार फिर से अमेरिका बढ़ चला है। अमेरिका ने कहा है कि अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया के लिए बातचीत फिर से शुरू होगी। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के मुताबिक तालिबानी नेताओं, इस्लामिक रिपब्लिक, अफगानिस्तान सरकार और अफगानिस्तान की शांति में भूमिका निभाने वाले देशों से फिर से बातचीत की जाएगी।

आतंकियों से शांति की बात
मई से पहले अमेरिका को अफगानिस्तान से अमेरिकन आर्मी को निकालना है मगर अमेरिका का नया जो बाइडेन प्रशासन अभी तक तय नहीं कर पाया है कि अमेरिकन सरकार को पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समय किए गये शांति समझौते के मुताबिक आगे बढ़ना चाहिए या फिर अफगानिस्तान को लेकर अमेरिका को नये सिरे से समझौता करना चाहिए। इसी बीच अब अमेरिका ने एक बार फिर से कहा है कि शांति वार्ता को फिर से शुरू किया जाएगा। स्पेशल रिप्रजेंटेटिव ऑफ अफगानिस्तान रिकॉन्सिलेशन (SRAR) के एंबेसडर जल्मय खलीलजाद को अमेरिका ने अफगानिस्तान में शांति वार्ता आगे बढ़ाने के लिए चुना है। जल्मय खलीलजाद और उनकी टीम अफगानिस्तान सरकार, तालिबान, इस्लामिक रिपब्लिक के नेताओं से बात करेंगे ताकि अफगानिस्तान में शांति के आखिरी नतीजों पर पहुंचा जाए।
अमेरिकी विदेश मंत्रालय के बयान के मुताबिक एसआरएआर काबुल और दोहा का दौरा कर अफगानिस्तान की शांति व्यवस्था में शामिल हर पक्ष के लोगों से बात करेगी ताकि शांति के आखिरी अंजाम तक पहुंचा जा सके। वहीं, अफगानिस्तान में शांति के लिए राजनीतिक समाधान खोजने का काम भी ये टीम करेगी।

अफगानिस्तान में फिर आतंक
अमेरिका एक तरफ अफगानिस्तान में मौजूद आतंकी संगठनों से फिर से बात शुरू कर रहा है वहीं तालिबान ने आतंक मचाना फिर से शुरू कर दिया है। अफगानिस्तान में पिछले दो महीने में कई बम ब्लास्ट हो चुके हैं और तालिबान फिर से अफगानिस्तान की चुनी हुई सरकार को सत्ता से हटाने की कोशिश में जुट गया है। एक मई तक अमेरिकी फौज को अफगानिस्तान से बाहर निकलना है लेकिन आशंका इस बात की जताई जा रही है कि अगर अमेरिका की सेना अफगानिस्तान से निकल गई तो क्या अफगानिस्तान में आतंक की आग फिर से नहीं धधक जाएगी। क्या आतंकी संगठन तालिबान सिर्फ बातचीत से मान जाएगा? और दूसरा बड़ा सवाल ये है कि फिर से बातचीत शुरू करने वाला अमेरिका क्या अफगानिस्तान पर फंसा हुआ है।

अफगानिस्तान पर कनफ्यूज अमेरिका
पिछले महीने अमेरिका के नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल में अफगानिस्तान के मुद्दे पर बात हुई। जिसमें तय किया जाना था कि अफगानिस्तान को लेकर क्या फैसला लिया जाना है। सिक्योरिटी काउंसिल की बैठक के दौरान दो मुख्य उद्येश्य थे। पहला मकसद था अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की शांतिपूर्ण वापसी के साथ अफगानिस्तान में शांति स्थापित करना और दूसरा मकसद था अमेरिका सुरक्षा के साथ-साथ ये सुनिश्चित करना कि कहीं अमेरिकी फौज की वापसी के साथ अफगानिस्तान में ISIS स्टाइल में आतंकवादी मॉड्यूल तैयार ना हो जाए जो अमेरिका के लिए ही आगे चलकर खतरनाक हो जाए। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने अपने बयान में कहा था कि अफगानिस्तान में हिंसा काफी ज्यादा है जो अभी सबसे नीचले स्तर पर है।
दरअसल, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में अमेरिका- अफगानिस्तान और तालिबान के बीच शांति समझौता कतर में हुआ था। जिसके तहत अमेरिका अपनी फौज को अफगानिस्तान से निकाल रहा है। 13000 अमेरिकी फौज में अब अफगानिस्तान में सिर्फ 2500 सैनिक बचे हैं, जिन्हें वापस बुलाने पर अमेरिका में माथापच्ची जारी है। दरअसल, अमेरिकी फौज के कम होते ही तालिबान ने फिर से अफगानिस्तान में दहशत फैलाना शुरू कर दिया। पिछले एक महीने के दौरान अफगानिस्तान में कई बम ब्लास्ट हो चुके हैं, लिहाजा अमेरिका का सेना बुलाने का दांव उल्टा पड़ता जा रहा है। अब अमेरिका के सामने सबसे बड़ा डर ये है कि अगर अफगानिस्तान में फिर से आतंकी संगठन फलते-फूलते हैं तो उनका पहला टार्गेट अमेरिका ही होगा। अफगानिस्तान-पाकिस्तान स्टडीज के मिडिल इस्ट इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर मार्विन वीनबम का मानना है कि 'अफगानिस्तान-तालिबान-अमेरिका शांति समझौता में तालिबान सिर्फ इतना मान रहा है कि उसने अमेरिकी फौज को निशाना बनाना बंद कर दिया है, इससे ज्यादा तालिबान कुछ नहीं मान रहा है'।
दरअसल, अमेरिका ने अब मानना शुरू कर दिया है कि ताबिलान से एग्रीमेंट कर वो फंस गया है और जैसे जैसे अमेरिकी फौज को वापस बुलाने की तारीख नजदीक आ जा रही है अमेरिका के लिए स्थिति और खराब होती जा रही है, ऐसे में सवाल बस यही बचता है, कि आखिर अब जो बाइडेन प्रशासन अपनी सेना को क्या ऑर्डर देगा?
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