भारत का साथ खोकर 'अनाथ' बना अफगानिस्तान, तालिबान राज में भारतीय मदद को याद कर रोते अफगान

तालिबान शासन भारत को अलग-थलग करके बहुत बड़ी गलती कर रहा है, क्योंकि भारत ने बगैर किसी लाभ के अफगानिस्तान की जितनी मदद की है, उतनी मदद आज तक किसी ने भी नहीं की है।

काबुल, दिसंबर 04: अफगानिस्तान इस वक्त गंभीर मानवीय संकट का सामना कर रहा है और तालिबान देश की शासन व्यवस्था संभालने में बुरी तरह से नाकाम साबित हो रहा है। यूनाइटेड नेशंस की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि, कि अगर जल्द से जल्द अफगानिस्तान में मानवीय मदद नहीं पहुंचाई गई, तो देश में लाखों लोग भूख से मर सकते हैं। इन सबके बीच अब अफगानिस्तान को भारत की याद आ रही है, जिसे तालिबान ने अलग कर रखा है।

भारतीय मदद की याद

भारतीय मदद की याद

एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि, तालिबान शासन भारत को अलग-थलग करके बहुत बड़ी गलती कर रहा है, जो पिछले 20 सालों से अफगानिस्तान में मानवीय मदद के साथ साथ, नागरिक उड्डयन, दूरसंचार सहित देश की प्रगति में सहायता कर रहा था। मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि, भारत ने अफगानिस्तान के परिवहन और शिक्षा क्षेत्र में विकास के लिए अभूतपूर्व काम किया है, जो अब पूरी तरह से बंद है, लिहाजा आम अफगानों को भारत की याद आ रही है। एशियन लाइट अखबार के अनुसार, भारत ने 2015 में अफगान वायु सेना को सैन्य हार्डवेयर, चार एमआई-25 अटैक हेलीकॉप्टर और अफगान नेशनल आर्मी को 285 सैन्य वाहनों की आपूर्ति की थी।

अफगानिस्तान में भारतीय मदद

अफगानिस्तान में भारतीय मदद

एशियन लाइट अखबार की रिपोर्ट में कहा गया है कि, जनवरी 2009 में भारत ने अफगानिस्तान को खाद्य संकट से निपटने में मदद करने के लिए 250,000 मीट्रिक टन गेहूं प्रदान किया और मानवीय सहायता के तहत काबुल में इंदिरा गांधी बाल स्वास्थ्य संस्थान का पुनर्निर्माण करवाया था। इसके अलावा, भारत ने अफगानिस्तान के नागरिक उड्डयन क्षेत्र को विकसित करने के लिए आवश्यक पुर्जों के साथ तीन एयरबस विमान दिए थे, और एयरलाइन अधिकारियों को फिर से ट्रेनिंग दी थी।

अफगानिस्तान में डिजिटल विकास

अफगानिस्तान में डिजिटल विकास

एशियन लाइट ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि, भारत ने 2005 में अफगानिस्तान के 11 प्रांतों में डिजिटल टेलीफोन एक्सचेंजों सहित उपकरणों की स्थापना के साथ, टावरों और बिजली आपूर्ति प्रणालियों सहित बुनियादी सुविधाओं की स्थापना के साथ दूरसंचार इन्फ्रास्ट्रक्चर का आपातकालीन निर्माण किया था।

परिवहन का विकास

परिवहन का विकास

इसके अलावा साल 2001 के अंत में भारत ने अफगानिस्तान को 400 बसें दी थीं, ताकि अफगानिस्तान में परिवहन का विकास हो सके। भारत द्वारा भेजे गये 400 बसों में से 205 बसें राजधानी काबुल में तैनात की गई थी और बाकी बसों को अलग अलग प्रांतों में भेज दिया गया था। भारतीय बसों की मदद से अफगानिस्तान में शरणार्थियों की काफी ज्यादा मदद की गई थी। इनके अलावा शिक्षा के क्षेत्र में, भारत ने अफगानिस्तान में हबीबिया स्कूल का निर्माण करवाया। वहीं, राजधानी काबुल के पुनर्निर्माण में भी भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एशियन लाइट अखबार के मुताबिक, इनके अलावा भारत ने अफगानिस्तान के विश्वविद्यालयों की आर्थिक स्थिति सही करने के लिए छात्रवृति में भी मदद की।

भूख संकट से गुजर रहा अफगानिस्तान

भूख संकट से गुजर रहा अफगानिस्तान

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के प्रवक्ता बाबर बलूच ने शुक्रवार को कहा कि, करीब 2 करोड़ 30 साथ अफगानी, यानि करीब 55 प्रतिशत अफगान आबादी भूख के अत्यधिक स्तर का सामना कर रही है। जिनमें से लगभग 90 लाख लोग अकाल की वजह से खतरे में हैं। यूएनएचसीआर ने 2021 में देश भर में लगभग 7 लाख विस्थापित लोगों की सहायता की है, जिनमें से ज्यादातर मदद अगस्त में तालिबान के कब्जे के बाद की गई है। बयान के मुताबिक, एजेंसी हर हफ्ते करीब 60,000 लोगों की मदद कर रही है।

3 अरब डॉलर से से ज्यादा की मदद

3 अरब डॉलर से से ज्यादा की मदद

2011 में भारत-अफगानिस्तान ने रणनीतिक साझेदारी समझौता किया था, जिसके तहते भारत, अफगानिस्तान को उसके इंफ्रास्ट्रक्चर और संस्थाओं के पुननिर्माण में मदद कर रहा था। शिक्षा से लेकर तकीनीक सहायता तक में भारत उसके साथ खड़ा था। भारत ने वहां महत्वपूर्ण सड़कें बनवाई हैं, डैम बनवाए हैं, बिजली लाइनें बिछाईं, स्कूल और अस्पताल बनाए हैं। कुल मिलाकर इस सहायता को अगर आंकड़ों में अनुमान लगाएं तो यह 3 अरब डॉलर से ज्यादा बैठता है। सच कहें तो अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत का काम धरातल पर दिखता है।

1 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार

1 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार

इतना ही नहीं दोनों देशों की मित्रता के चलते इन वर्षों में द्वपक्षीय व्यापार भी 1 अरब डॉलर का हो चुका था। सच ये है कि भारत ने अफगानिस्तान के फिर से अपने पैरों पर खड़े करने के लिए क्या किया है, उसके बारे में खुद भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पिछले साल नवंबर में जिनेवा में अफगानिस्तान कॉन्फ्रेंस में बताा था। उन्होंने कहा था, 'आज अफगानिस्तान का कोई भी हिस्सा नहीं है, जहां भारत के 400 से ज्यादा प्रोजेक्ट ना हों, ये अफगानिस्तान के सभी 34 प्रांतों में हैं। '

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