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ब्रिटेन के 72 फीसदी पानी पर विदेशी कंपनियों का कब्जा, अंधाधुंध निजीकरण के चक्कर में पिस रही जनता

ब्रिटेन के लोग इस वक्त पानी की कमी, सीवेज बहाव और पाइप लीक की समस्या का सामना कर रहे हैं। ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि ये पानी के कारोबारी पानी बेचकर फायदा तो कमा रहे हैं मगर इससे जुड़े आधारभूत ढ़ाचों पर काम नहीं कर रहे।
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water industry in britain

ब्रिटेन में 72 फीसदी पानी के श्रोतों पर निजी कंपनियों के कब्जे के खुलासे के बाद एक बार फिर से देश में 'निजीकरण' सार्वजनिक बहस में लौट आया है। दरअसल ब्रिटेन के समाचार पत्र द गार्जियन ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है, जिसके मुताबिक ब्रिटेन में लगभग तीन चौथाई पानी के हिस्से पर आज निवेश फर्म, निजी इक्विटी फर्म, पेंशन फंड और टैक्स हैवेन का कारोबार करने वाले बिजनेस घरानों का अधिकार हो गया है।

कतर और चीनी कंपनियों का भी है हिस्सा

कतर और चीनी कंपनियों का भी है हिस्सा

इस रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन में अधिकांश जल कंपनियां अब निजी कंपनियों के हाथों में चली जा चुकी हैं। ब्रिटेन में तीन बड़ी जल कपंनियों में विदेशी कंपनियों का निवेश है। जैसे कि सेवर्न ट्रेंट नाम की कंपनी में कतर इन्वेस्टमेंट ऑथरिटी का 4.6 शेयर है। इसी कंपनी में अमेरिकी इन्वेस्टमेंट कंपनी ब्लैकरॉक का भी बड़ा हिस्सा है। है। इसी तरह थेम्स वॉटर में अबू धाबी ऑथरिटी का 9.9 फीसदी शेयर है। जबकि इसी कंपनी में 8.7 प्रतिशत हिस्सा एक चीनी कंपनी का है। रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन के जल स्रोतों पर 17 देशों की कंपनियों का कब्जा है।

तीन दशक पहले हुआ था पानी का निजीकरण

तीन दशक पहले हुआ था पानी का निजीकरण

बतादें कि ब्रिटेन में लगभग तीन दशक पहले पानी का निजीकरण कर दिया गया था। तब यह दलील दी गई थी कि नई व्यवस्था में आम लोग जल प्रबंधन में भागीदार होंगे। लेकिन अब इसका दुष्परिणाम देखा जाने लगा है और असल में यह एक मुनाफे का उद्योग बन गया। ब्रिटेन के आम लोगों इसका हिस्सा बन नहीं पाए उल्टे इसमें विदेशी निवेश फर्मों, सुपर-रिच, कंपनियों का नियंत्रण बढ़ता जा रहा है। ऐसे में अब ब्रिटेन में जल स्रोतों पर निजी कंपनियों के कब्जे का विरोध होने लगा है।

अंधाधुंध निजीकरण का खामियाजा भुगत रही जनता

अंधाधुंध निजीकरण का खामियाजा भुगत रही जनता

दरअसल ब्रिटेन के लोग इस वक्त पानी की कमी, सीवेज बहाव और पाइप लीक की समस्या का सामना कर रहे हैं। ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि ये पानी के कारोबारी पानी बेचकर फायदा तो कमा रहे हैं मगर इससे जुड़े आधारभूत ढ़ाचों पर काम नहीं कर रहे हैं। ये आरोप है कि पानी के कारोबारी कारगर सेवा देने के लिए पर्याप्त निवेश नहीं कर रहे हैं। इसका खामियाजा लोगों को उठाना पड़ रहा है। साथ ही पर्यावरण भी प्रभावित हो रहा है। कुछ समय पहले अदालत ने एक कंपनी को नदी में अपशिष्ट बहाने को लेकर करोड़ों रुपये का जुर्माना भी ठोका था।

वॉटर इंडस्ट्री की जवाबदेही तय करने की मांग

वॉटर इंडस्ट्री की जवाबदेही तय करने की मांग

डॉ. केट बायलिस ने जल उद्योग के स्वामित्व ढांचे पर अकादमिक रिसर्च किया है। उन्होंने द गार्जियन से कहा कि कुछ कंपनियों का स्वामित्व ढांचा इतना जटिल और अस्पष्ट है कि यह मालूम करना मुश्किल हो जाता है कि उनका मालिक कौन है। उन्होंने कहा- 'मैंने कुछ फंड मैनेजरों से बात की तो उन्होंने कहा कि मालिक कौन है यह आप कभी नहीं जान पाएंगी। यह सिर्फ कंपनी के अंदरूनी अधिकारी ही जान सकते हैं।' विश्लेषकों के मुताबिक इस स्थिति में वॉटर इंडस्ट्री की जवाबदेही तय करने की मांग कहीं पहुंचेगी, इसकी कोई संभावना नहीं है। उनके मुताबिक ब्रिटेन अंधाधुंध निजीकरण की अब भारी कीमत चुका रहा है।

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English summary
72 percent of british water industry is in foreign ownership
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