61 साल के यासिर अराफात ने 27 साल की सुहा से की थी शादी, कब्र से लाश निकाल हुई थी जांच

नई दिल्ली, मई 22: यासिर अराफत को फलस्तीन का सबसे बड़ा नेता माना जाता है। उन्होंने इजरायल-फलस्तीन समस्या के शांतिपूर्ण समाधान की पहल की थी। लेकिन दोनों देशों के कट्टरपंथियों ने इसे सफल नहीं होने दिया। अराफात फलस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) के अध्यक्ष थे। वे शुरू में फलस्तीन को इजरायल से मुक्त कराने के लिए सश्स्त्र क्रांति के हिमायती थे। उन्होंने बम और बंदूक से लड़ाई की भी। लेकिन 1988 के बाद उन्होंने अपना रास्ता शांति की तरफ मोड़ लिया। 1993 में यासिर अराफात ने इजरायल को मान्यता दे दी थी। इजरायल के प्रधानमंत्री इत्जाक राबिन ने भी पीएलओ को फलस्तीन का आधिकारिक प्रतिनिधि मान लिया। अमेरिका इसका गवाह बना। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के सामने ह्वाइट हाउस में इत्जाक राबिन और यासिर अराफात ने 13 सितबर 1993 को एक शांति समझौते पर दस्तखत किये थे। दोनों देश शांतिपूर्ण समाधन के लिए राजी हो गये थे।

नोबेल शांति पुरस्कार विजेता थे अराफात

नोबेल शांति पुरस्कार विजेता थे अराफात

इन्हीं कारणों से 1994 का नोबेल शांति पुरस्कार इत्जाक राबिन, शिमोन परेज (इजरायल के विदेश मंत्री) और यासिर अराफात को संयुक्त रूप से दिया गया था। लेकिन इस समझौते का इजरायल और फलस्तीन में घनघोर विरोध हुआ। शांति समझौते से नाराज एक यहूदी ने 1995 में प्रधानमंत्री इत्जाकर राबिन की हत्या कर दी। फलस्तीन में भी अराफात का विरोध होने लगा। फलस्तीन की आजादी के लिए लड़ रहे दूसरे आतंकी सगठनों ने समझौते को नामंजूर कर दिया। वे इजरायल पर रॉकेट से हमले करने लगे। शांति बहाली की सारी कोशिशें बेकार हो गयीं। हिंसा जारी रही। फलस्तीन में कट्टरपंथी आतंकी मजबूत होते गये। अराफत कमजोर होते गये। 2001 में स्थिति फिर बिगड़ गयी। इजरायल के तत्कालीन प्रधानमंत्री एरियल शिरोन ने यासिर अराफात को निष्प्रभावी और अप्रासंगिक कह कर खारिज कर दिया। उस समय पीएलओ का मुख्यालय रामाल्ला में था। अराफात वहीं थे। इजायरली सेना ने अचानक अराफात के मुख्यालय को घेर कर उन्हें वहीं नजरबंद कर दिया। वे कई साल तक नजरबंद रहे। जब वे गंभीर रूप से बीमार हो गये तो इजरायल ने उन्हें इलाज के लिए पेरिस ले जाने की इजाजत दे दी। 11 नवम्बर 2004 को उनकी पेरिस के अस्पताल में मौत हो गयी।

27 की सुहा से 61 के अराफात की शादी

27 की सुहा से 61 के अराफात की शादी

कहा जाता है कि अराफात के जीवन में उनकी पत्नी सुहा अराफात का बहुत अधिक दखल था। तब यह आरोप लगा था कि जब अराफात पेरिस के अस्पताल में भर्ती थे तब सुहा किसी को उनसे मिलने नहीं देती थीं। सुहा ईसाई थीं और उम्र में अराफात से बहुत छोटी थीं। यासिर अराफात की मौत के कुछ दिनों के बाद ही इस अफवाह ने जोर पकड़ लिया कि इजरायल ने उन्हें जहर देकर मार दिया था। सुहा पहले यासिर अराफात की सलाहकार थीं। तब उनकी उम्र 27 साल थी और अराफात 61 साल के थे। अराफात ने तब तक इसलिए शादी नहीं की थी क्योंकि वे फलस्तीनी क्रांति को ही अपनी पत्नी मानते थे। लेकिन 1990 में अराफत ने सोहा से गुपचुप शादी रचा ली। सोहा ने शादी के लिए ईसाई से इस्लाम धर्म कबूल कर लिया। कुछ दिनों के बाद जब ये बात सार्वजनिक हुई तो कटटर फलस्तीनी मुसलमन नाखुश हो गये। कुछ लोगों ने उन पर कर्तव्य पथ से भटकने का आरोप लगाया। सुहा कोट, पतलून और स्कर्ट पहनने वाली आधुनिक महिला थीं। फलस्तीनी क्रांतिकारियों को ये बात पसंद नहीं आती थी। वे तो सुहा के इस्लाम अपनाने को भी ढोंग मानते थे।

सुहा पर पैसा हड़पने का आरोप

सुहा पर पैसा हड़पने का आरोप

सुहा पर आरोप लगा था कि उन्होंने अराफात के बैंक काउंट ले लाखों डॉलर की रकम एक अपने एक गुप्त खाते में ट्रांसफर की थी। बाद में सोहा ने कहा था, मैं जानती थी कि फलस्तीन के इतने बड़े नेता से शादी करने का क्या नतीजा हो सकता है । 2013 में सुहा ने एक अखबार को दिये इंटव्यू में कहा था, मैंने कई बार यासिर अराफात को छोड़ने की कोशिश की लेकिन कर न सकी। मैं यासिर अराफात से बेपनाह मोहब्बत करती थी लेकिन शादी का फैसला गलत था। इसका मुझे हमेशा अफसोस रहा।

कब्र से निकाल कर अराफात के शव की हुई थी जांच

कब्र से निकाल कर अराफात के शव की हुई थी जांच

2004 में यासिर अराफात की मौत के बाद यह बात जोर पकड़ने लगी कि इजरायल के जासूसों ने उन्हें जहर देकर मारा है। इसके बाद यह मांग होने लगी कि उनके शव को कब्र से निकाल कर फिर से जांच करायी जाय। रामाल्लाह में जब इजरायल ने उन्हें नजरबंद बनाया था तभी एक दिन खाने के बाद वे बीमार पड़ गये थे। मौत के बाद उन्हें पश्चिमी तट की राजधानी रामाल्ला में दफनाया गया था। उनकी मौत के आठ साल बाद 2012 में उनकी कब्र को फिर खोदा गया ताकि जहर के अवशेष का पता लगाया जा सके। स्विट्जरलैंड, फ्रांस और रूस के विशेषज्ञों ने इसकी जांच शुरू की। रूस के फोरिंसिक वैज्ञानिकों का कहना था कि अराफात की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई थी। फ्रांसीसी विशेषज्ञों ने भी अपनी जांच में जहर दिये जाने की पुष्टि नहीं की थी। लेकिन स्विट्जरलैंड के जांचकर्ताओं ने कहा था कि उनके शव पर रेडियोधर्मी पदार्थ पोलोनियम-210 पाया गया था। लेकिन इसकी वजह से ही उनकी जान गयी, यह प्रमाणित नहीं हो पाया। कहा जाता है कि अगर यासिर अराफात कुछ दिन और जिंदा रहते तो फलस्तीन समस्या इतनी भयावह नहीं होती।

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